हरीश राणा मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति | 12 Mar 2026

चर्चा में क्यों?

एक ऐतिहासिक न्यायिक हस्तक्षेप में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार किसी व्यक्तिगत रोगी के लिये निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के व्यावहारिक क्रियान्वयन की अनुमति प्रदान की है।

मुख्य बिंदु:

  • मामला: न्यायमूर्ति जे.बी.पर्दीवाला तथा न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 32 वर्षीय हरीश राणा के लिये जीवन रक्षक उपचार वापस लेने की अनुमति प्रदान की, जो 13 वर्षों से अधिक समय से स्थायी अचेतन अवस्था (PVS) में थे।
  • याचिका: उनके माता-पिता ने न्यायालय में याचिका दायर करते हुए कहा कि उनके पुत्र की स्थिति “ठीक होने की संभावना से परे” है और उसे कोमा जैसी अवस्था में बनाए रखना उसकी मानवीय गरिमा के विपरीत है।
  • न्यायिक निर्णय: न्यायालय ने चिकित्सकीय सहायता प्राप्त पोषण एवं जलयोजन (CANH) को वापस लेने की अनुमति दी। साथ ही निर्देश दिया कि रोगी को मानवीय और गरिमापूर्ण अंत सुनिश्चित करने के लिये अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली के पैलियेटिव केयर सेंटर में स्थानांतरित किया जाए।
  • भारत में इच्छामृत्यु का विधिक विकास:गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार’ की अवधारणा समय के साथ कई महत्त्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है:
    • अरुणा शानबाग मामला (2011): अरुणा शानबाग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार सैद्धांतिक रूप में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मान्यता दी, यद्यपि संबंधित याचिका को अस्वीकार कर दिया गया था।
  • कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018): संविधान पीठ ने यह घोषित किया कि “गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार” भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है तथा इस निर्णय में ‘लिविंग विल’ (पूर्व चिकित्सा निर्देश) को भी वैधता प्रदान की गई।
  • 2023 का संशोधन: सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 के दिशा-निर्देशों को सरल बनाते हुए जीवन-रक्षक उपकरण हटाने की प्रक्रिया को सरल किया तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनिवार्य उपस्थिति की शर्त को समाप्त कर दिया।
  • 2026 का आदेश: यद्यपि यह विधिक व्यवस्था पहले से अस्तित्व में थी, किंतु यह पहला अवसर है जब न्यायालय ने किसी विशिष्ट व्यक्ति के संदर्भ में इन दिशानिर्देशों को सक्रिय रूप से लागू करते हुए मृत्यु की अनुमति प्रदान की है।
  • सर्वोत्तम हित का सिद्धांत: न्यायालय ने ‘सर्वोत्तम हित’ परीक्षण लागू करते हुए निष्कर्ष निकाला कि जब चिकित्सकीय उपचार निरर्थक हो जाए और स्वास्थ्य लाभ की कोई संभावना न हो, तब जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा खींचना देखभाल के स्थान पर ‘क्रूरता’ का रूप ले सकता है।
  • शारीरिक स्वायत्तता: यह निर्णय इस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि किसी व्यक्ति को (या अक्षम स्थिति में उसके वैध अभिभावकों को) ऐसे चिकित्सकीय हस्तक्षेप को अस्वीकार करने का अधिकार है जो केवल अनिवार्य मृत्यु को टालने का कार्य करता हो।

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