महाराष्ट्र के उत्तरी पश्चिमी घाट से एक दुर्लभ सीसिलियन की खोज | 21 Jan 2026

चर्चा में क्यों?

वैज्ञानिकों ने महाराष्ट्र के उत्तरी पश्चिमी घाट से ब्लाइंड सीसिलियन की एक नई प्रजाति की खोज की घोषणा की है, जिसका नाम गेगेनोफिस वाल्मीकि (Gegeneophis valmiki) रखा गया है। यह खोज इस वंश (जीनस) के लिये एक दशक से अधिक समय बाद पहली खोज है।

मुख्य बिंदु:

  • स्थान: इस प्रजाति को पहली बार वर्ष 2017 में महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में स्थित वाल्मीकि पठार से एकत्रित किया गया था।
  • व्युत्पत्ति (Etymology): इसका नाम खोज स्थल के निकट स्थित ऐतिहासिक महर्षि वाल्मीकि मंदिर के नाम पर रखा गया है, जो प्रजातियों के नामकरण को भौगोलिक अथवा सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की परंपरा को दर्शाता है।
  • अनुसंधान दल: इस खोज का नेतृत्व भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) ने किया, जिसमें सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, बालासाहेब देसाई कॉलेज तथा म्हादेई रिसर्च सेंटर के शोधकर्त्ता शामिल थे।
  • आकृति: अन्य सीसिलियन प्रजातियों की तरह गेगेनोफिस वाल्मीकि भी बिना अंगों वाले, केंचुए के समान दिखने वाला उभयचर है।
  • भूमिगत स्वभाव: यह एक भूमिगत (भूमि के भीतर रहने वाला) जीव है, जिसकी आँखें हड्डी के नीचे छिपी रहती हैं, इसी कारण इसे सामान्यतः ‘ब्लाइंड सीसिलियन’ कहा जाता है।
  • पारिस्थितिक भूमिका: ये जीव कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के लिये लाभकारी हैं, क्योंकि इनकी सुरंग बनाने की गतिविधि मृदा में वायुसंचार बढ़ाती है और उसकी संरचना को सुदृढ़ बनाती है, साथ ही ये मृदा में पाए जाने वाले अकशेरुकी जीवों को भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं।
  • महत्त्व: पश्चिमी घाट, जो एक वैश्विक जैव-विविधता हॉटस्पॉट के रूप में मान्यता प्राप्त है, अनेक स्थानिक उभयचर प्रजातियों का आश्रय स्थल है। 
    • वैश्विक स्तर पर लगभग 41% उभयचर प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में हैं, ऐसे में नई प्रजातियों की पहचान संरक्षण प्रयासों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

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