बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिये ‘प्रोजेक्ट अंब्रेला’

चर्चा में क्यों?
हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर ने छोटे बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिये ‘प्रोजेक्ट अंब्रेला’ के रूप में एक विशेष सेफ्टी किट विकसित किया है। ध्यातव्य है कि विभिन्न राज्यों के अलावा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी आईआईटी से इस किट के लिये संपर्क किया है।

प्रोजेक्ट अंब्रेला क्या है?

  • प्रोजेक्ट अंब्रेला नामक इस किट में ऑडियो विज़ुअल सामग्री के रूप में प्लेइंग कार्ड, कार्टून, फन गेम्स, वीडियो, ऑडियो, कहानियाँ, चित्र आदि को शामिल किया गया है। 
  • मनोवैज्ञानिक शोध पर आधारित किट की सामग्री के माध्यम से बच्चों को गुड-टच, बैड टच के बारे में बताया जाता है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य अबोध बच्चों को यौन उत्पीड़न को लेकर सावधान और सजग बनाया जाना है  ताकि समय रहते वे स्वयं को इससे बचा सकें।
  • इसके साथ ही बच्चे अपने अभिभावकों और शिक्षकों को तुरंत ऐसे मामलों को बता सकें और समुचित मदद हासिल कर सकें।
  • इस किट के माध्यम से शिक्षकों और अभिभावकों को भी प्रशिक्षित करने की योजना है ताकि वे सतर्क रहें और बच्चे की मनोदशा को तुरंत भाँप सकें तथा समय रहते उनकी समुचित मदद कर सकें।
  • इस किट के अभ्यास द्वारा बच्चों को यौन उत्पीड़न के विरुद्ध व्यावहारिक तौर पर सचेत किया जा सकता है अतः इसे देश भर के स्कूलों में लागू करने की तैयारी चल रही है।
  • यह किट मुख्यतः तीन अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों से संबंधित है:
    ♦ 8 साल से कम उम्र के बच्चों के लिये 
    ♦ 8 से 10 साल की उम्र के बच्चों के लिये 
    ♦ 11 से 13 साल की उम्र के बच्चों के लिये 
  • गौरतलब है कि कानपुर आइआइटी द्वारा किये गए इस शोध को मनोचिकित्सकों के एसोसिएशन ने भी प्रमाणित किया है

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) 

  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) एक वैधानिक आयोग है जिसकी स्थापना दिसंबर 2005 में संसद द्वारा पारित एक अधिनियम, बाल अधिकार संरक्षण के लिये आयोग द्वारा की गई थी।
  • आयोग महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तत्त्वावधान में कार्य करता है।
  • आयोग यह सुनिश्चित करता है कि सभी कानून, नीतियाँ, कार्यक्रम और प्रशासनिक तंत्र बाल अधिकारों के अनुरूप हों जो भारतीय संविधान और संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में उपलब्ध हैं।
  • आयोग द्वारा 18 साल से कम आयु वालों को बालक माना गया है।
  • आयोग अधिकारों पर आधारित संदर्श की परिकल्पना करता है, जो राष्ट्रीय नीतियों और कार्यक्रमों में परिलक्षित होता है।
  • इसके साथ राज्य, ज़िला और खण्ड स्तरों पर पारिभाषित प्रतिक्रियाएँ भी शामिल हैं, जिसमें प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्टता और मज़बूती को भी ध्यान में रखा जाता है।
  • प्रत्येक बालक तक पहुँच बनाने के उद्देश्य से इसमें समुदायों तथा कुटुंबों तक गहरी पैठ बनाने का आशय रखा गया है तथा अपेक्षा की गई है कि इस क्षेत्र में हासिल किये गए सामूहिक अनुभव के आधार पर उच्चतर स्तर पर सभी प्राधिकारियों द्वारा विचार किया जाएगा।
  • इस प्रकार, आयोग बालकों तथा उनकी कुशलता को सुनिश्चित करने के लिये राज्य हेतु एक अपरिहार्य भूमिका, सुदृढ़ संस्था-निर्माण प्रक्रियाओं, स्थानीय निकायों और समुदाय स्तर पर विकेंद्रीकरण के लिये सम्मान तथा इस दिशा में वृहद् सामाजिक चिंता की परिकल्पना करता है।

संरचना

  • केंद्र सरकार द्वारा आयोग में निम्नलिखित सदस्यों को तीन वर्ष की अवधि के लिये नियुक्त किया जाएगा  अध्यक्ष, जिसने बाल कल्याण को बढ़ावा देने के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किया हो।
  • छह अन्य सदस्य जिन्हें शिक्षा, बाल स्वास्थ्य, देखभाल, कल्याण, विकास, बाल न्याय, हाशिये पर पड़े उपेक्षित, अपंग व परित्यक्त बच्चों की देखभाल या बाल श्रम उन्मूलन, बाल मनोविज्ञान और कानून के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल हो।
  • सदस्य सचिव, जो संयुक्त सचिव स्तर के समकक्ष होगा या उसके नीचे स्तर का नहीं होगा।