प्रिलिम्स फैक्ट्स: 13 नवंबर, 2020

आईएनएस वागीर

INS Vagir

हाल ही में प्रोजेक्ट -75 के तहत निर्मित पाँचवी स्कॉर्पीन पनडुब्बी ‘आईएनएस वागीर' (INS Vagir) को मुंबई के मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में लॉन्च किया गया।

प्रमुख बिंदु:

  • भारत के पनडुब्बी कार्यक्रम को बढ़ावा देते हुए पोत निर्माण इकाई MDL ने इन पनडुब्बियों का निर्माण पूरी तरह से 'मेक इन इंडिया' के तहत किया है।
  • इसे बेहतर स्टील्थ फीचर्स (जैसे कि उन्नत ध्वनिक अवशोषण तकनीक, कम विकिरण वाले शोर स्तर, हाइड्रो-डायनामिक रूप से अनुकूलित आकार आदि) और सटीक-निर्देशित हथियारों के साथ पुनः निर्मित किया गया है।
  • यह पानी के नीचे या सतह पर टारपीडो और ट्यूब-लॉन्च एंटी-शिप मिसाइलों के साथ हमला करने में सक्षम है।
  • वागीर-I, पूर्व में रूस से प्राप्त की गई सबमरीन, जिसका नाम सैंड फिश के नाम पर रखा गया है, हिंद महासागर का एक समुद्री शिकारी था, को 3 दिसंबर, 1973 को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था और 7 जून, 2001 को सेवामुक्त किया गया था।


स्ट्रिप्ड बबल-नेस्ट फ्रॉग

Striped Bubble-Nest Frog

हाल ही में वैज्ञानिकों के एक समूह ने स्ट्रिप्ड बबल-नेस्ट फ्रॉग (Striped Bubble-Nest Frog) नामक अंडमान द्वीप में ट्री फ्रॉग (Tree Frog) की एक नए जीनस की खोज की है।

प्रमुख बिंदु:

  • जैविक नाम- रोहनीक्सालस विट्टैटस (Rohanixalus vittatus)
    • नए जीनस ‘रोहनीक्सालस ’का नामकरण श्रीलंकाई करदाता रोहन पेठियागोड़ा के नाम पर रखा गया है।
  • स्ट्रिप्ड बबल-नेस्ट फ्रॉग अतीत में पाए जाने वाले ट्रीफ्रॉग परिवार ‘राकोफोराइडे’ (Rhacophoridae) के जीनस से संबंधित है।
  • यह पहली बार है जब अंडमान द्वीप में ट्री फ्रॉग की पहली प्रजाति की उपस्थिति दर्ज की गई है।
  • शारीरिक विशेषताएँ-
    • छोटा और पतला शरीर (2-3 सेमी लंबा)।
    • शरीर के दोनों ओर विषम रंगीन पार्श्व रेखाएँ हैं तथा पूरे शरीर पर भूरे रंग के धब्बे हैं।
    • ये वृक्षों पर बने (Arboreal) घोसलों में हल्के हरे रंग के अंडे देते हैं।
    • इन्हें एशियन ग्लास फ्रॉग के नाम से भी जाना जाता है

फ्लाई ऐश से जियो-पॉलिमर एग्रीगेट का निर्माण

(Geo-polymer aggregate from fly ash)

हाल ही में भारत के सबसे बड़े बिजली उत्पादक और बिजली मंत्रालय के अधीन सार्वजनिक उपक्रम एनटीपीसी लिमिटेड ने फ्लाई ऐश से जियो-पॉलिमर एग्रीगेट को सफलतापूर्वक विकसित किया है।

प्रमुख बिंदु:

  • फ्लाई ऐश से जियो-पॉलिमर एग्रीगेट के उत्पादन की एनटीपीसी की अनुसंधान परियोजना, भारतीय मानकों के वैधानिक मापदंडों के अनुरूप है और इसकी पुष्टि राष्ट्रीय सीमेंट और निर्माण सामग्री परिषद (NCCBM) ने भी की है।
  • एनटीपीसी ने प्राकृतिक एग्रीगेट के प्रतिस्थापन के रूप में जियो-पॉलिमर एग्रीगेट को विकसित किया है। कंक्रीट कार्यों में उपयोग की उपयुक्तता के लिये भारतीय मानकों के आधार पर NCCBM, हैदराबाद ने तकनीकी मानकों का परीक्षण किया और परिणाम स्वीकार्य सीमा में हैं।

एग्रीगेट

  • किसी भू-भाग या क्षेत्र को स्थिर करने के लिये सिविल इंजीनियरिंग परियोजनाओं में एग्रीगेट का उपयोग किया जाता है।
    • प्राकृतिक एग्रीगेट प्राप्त करने के लिये पत्थर के उत्खनन की आवश्यकता होती है।
    • जियो-पॉलिमर एग्रीगेट का निर्माण उद्योग में व्यापक उपयोग किया जाता है।

लाभ

  • प्राकृतिक एग्रीगेट के स्थान पर इसका उपयोग किया जाएगा, जिससे पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभाव को कम करने में मदद मिलेगी।
  • भारत में इन एग्रीगेट की कुल मांग लगभग 2000 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। फ्लाई ऐश, एनटीपीसी द्वारा विकसित एग्रीगेट की मांग को काफी हद तक पूरा करने में मदद करेगा और प्राकृतिक एग्रीगेट से होने वाले पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को भी कम करेगा।
  • भारत में कोयले से चलने वाले बिजली कारखानों द्वारा हर साल लगभग 258 मीट्रिक टन राख (फ्लाई ऐश) का उत्पादन किया जाता है। इसमें से लगभग 78 प्रतिशत राख का उपयोग किया जाता है और शेष राख डाइक में जमा रहती है। इस अनुसंधान परियोजना में 90 प्रतिशत से अधिक राख का उपयोग करके एग्रीगेट का उत्पादन किया जाता है।
  • फ्लाई ऐश पर्यावरण अनुकूल सामग्री है। ये एग्रीगेट पर्यावरण के अत्यंत अनुकूल हैं और इसमें कंक्रीट में मिश्रण के लिये किसी भी सीमेंट की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि फ्लाई ऐश आधारित जियो-पॉलिमर मोर्टार (बांधने वाली सामग्री) के रूप में कार्य करता है। जियो-पॉलिमर एग्रीगेट कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करेंगे और इनके उपयोग से पानी की खपत में भी कमी आएगी।