ओज़ोन क्षरण के लिये ज़िम्मेदार गैस

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नेचर (Nature) नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार वैश्विक स्तर पर ओज़ोन क्षरण के लिये ज़िम्मेदार गैस(CFC-11) पूर्वी चीन की अवैध औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न होती है।

प्रमुख बिंदु

  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन-11 (Chloroflurocarbon-CFC-11) एक शक्तिशाली ओज़ोन क्षयकारी रसायन है जो अंटार्कटिक महाद्वीप पर उपस्थित ओज़ोन छिद्र को बढ़ने में सहायता करता है।
  • CFC-11 का उपयोग मुख्य रूप से एरोसोल उत्पादों में एक प्रणोदक और कई तरह के पॉलीमर्स एजेंट के रूप में प्रयोग किया जाता था। क्लोरोफ्लोरोकार्बन के उत्पादन और उपभोग को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol) के तहत नियंत्रित किया गया था । वर्ष 1996 के बाद विकसित देशों द्वारा एवं वर्ष 2010 में वैश्विक स्तर पर इसके उपभोग को प्रतिबंधित कर दिया गया।
  • इसके काफी सकारात्मक परिणाम भी सामने आए एवं पर्यावरण में CFC-11 के स्तर में गिरावट देखने को मिली। तस्मानिया के केप ग्रिम में स्थित केंद्र द्वारा प्रदत्त जानकारियों के अनुसार वर्ष 1994 में CFC-11 पर्यावरण में अपने चरम स्तर पर पहुँच गया था और वर्ष 2018 तक आते आते इसमें 14% तक कमी दर्ज़ की गई।
  • वर्ष 2015 में (Commonwealth Scientific and Industrial Research Organisation-CSIRO) के वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलियाई सरकार को उन्नत वैश्विक वायुमंडलीय गैसों के अनुप्रयोग (The Advanced Global Atmospheric Gases Experiment-AGAGE) द्वारा संकलित मापनों के आधार पर सलाह दी गई, जिसमें केपग्रिम के मापनों को भी शामिल किया गया, जिसमें वर्ष 2011 में CFC के उत्सर्जन में वृद्धि कि बात की गई।
  • साथ ही यह भी बताया गया कि यदि CFC-11 का उत्सर्जन  इसी प्रकार बढ़ता रहा तो ओज़ोन छिद्र को नियंत्रित करना मुश्किल होगा, जो मानव के लिये हानिकारक सिद्ध होगा।
  • हाल ही में कोरियाई और जापानी अध्ययनकर्त्ताओं के आँकड़ों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्तमान में CFC-11 के बढ़ते उत्सर्जन का मुख्य स्रोत पूर्वी चीन के दो प्रान्त शानदोंग एवं हेबेई हैं वर्ष 2013 के बाद से इन दोनों प्रान्तों ने संयुक्त रूप से  7,000 टन/प्रतिवर्ष उत्सर्जन में वृद्धि की।
  • इसके अलवा AGAGE नेटवर्क को वैश्विक स्तर पर विकसित देशों  जैसे- उत्तरी अमेरिका, यूरोप, जापान, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया में कही भी CFC-11 उत्सर्जन के साक्ष्य नहीं प्राप्त हुए हैं।
  • इस नए अध्ययन में वैश्विक स्तर के लगभग आधे हिस्से पर ही उत्सर्जन में वृद्धि के प्रभाव का पता लगाया गया तो यह भी संभावना होती है कि कुछ अन्य देशों में भी CFC-11 में थोड़ी वृद्धि हो गई हो जिसका पता न चल पाया हो।

निष्कर्ष

यह अध्ययन CFC-11 जैसी ट्रेस गैसों के दीर्घकालिक मापन के महत्त्व पर प्रकाश डालता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतर्राष्ट्रीय संधियों और प्रोटोकॉल के तहत कार्य हो रहे हैं अथवा नहीं। इस अध्ययन में क्षेत्रीय स्तर पर ओज़ोन क्षयकारी पदार्थों के उत्सर्जन का पता लगाने वाले वैश्विक नेटवर्क में खामियों की भी पहचान की गई है। इन महत्त्वपूर्ण माप नेटवर्क के विस्तार को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में होने वाले उत्सर्जन के संक्रमण की शीघ्रता से पहचान की जा सके।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol)

ओज़ोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले विभिन्न पदार्थों के उत्पादन तथा उपभोग पर नियंत्रण के उद्देश्य के साथ विश्व के कई देशों ने 16 सितंबर, 1987 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये थे। जिसे आज विश्व का सबसे सफल प्रोटोकॉल माना जाता है। गौरतलब है कि इस प्रोटोकॉल पर विश्व के 197 पक्षकारों ने हस्ताक्षर किये हैं। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत तीन पैनल आते हैं-

  1. वैज्ञानिक आकलन पैनल।
  2. प्रौद्योगिकी और आर्थिक आकलन पैनल।
  3. पर्यावरणीय प्रभाव आकलन पैनल।
  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन-11 (Chloroflurocarbon-11)CFC-11, जिसे ट्राइक्लोरोफ्लोरोमीथेन के रूप में भी जाना जाता है, कई क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) रसायनों में से एक है, जिन्हें 1930 के दशक के दौरान शुरू में शीतलक के रूप में विकसित किया गया था।
  • जब वायुमंडल में CFC के अणु टूट जाते हैं, तो वे क्लोरीन परमाणुओं को छोड़ते हैं जो ओज़ोन परत (जो हमें पराबैंगनी किरणों से बचाती है) को तेजी से नष्ट करने में सक्षम होते हैं।
  • एक टन CFC-11 लगभग 5,000 टन कार्बनडाइ ऑक्साइड के बराबर होता है, जिससे न केवल ओज़ोन परत का ह्रास हुआ है, बल्कि पृथ्वी के समग्र तापमान में भी वृद्धि हुई है।

स्रोत: न्यूयॉर्क टाइम्स