हेडलाइन मुद्रास्फीति बनाम कोर मुद्रास्फीति

भूमिका

अपनी छठी द्विमासिक मौद्रिक नीति से संबंधित वक्तव्य जारी करते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने रेपो रेट को 6.25% रखा है, यानी रेपो रेट में आरबीआई ने कोई परिवर्तन नहीं किया है और यह अपरिवर्तित है। रेपो रेट का अपरिवर्तित रहना इस बात का परिचायक है कि आरबीआई की मौद्रिक नीति का रुख अब बाज़ार हितैषी न होकर तटस्थ रहने की ओर अग्रसर है। हालाँकि, अहम सवाल यह है कि मौद्रिक नीतियों के तटस्थ होने का कारण क्या है? विदित हो कि आरबीआई ने मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए रेपो रेट में कोई परिवर्तन नहीं लाने का निर्णय लिया है, लेकिन मुद्रास्फीति तो कम हो रही है। ऐसे में आरबीआई को अपने दरों में कटौती करनी चाहिये थी, लेकिन आरबीआई ने रेपो रेट को ज्यों का त्यों रखा है। ऐसा इसलिये क्योंकि आरबीआई हेडलाइन मुद्रास्फीति के बजाय कोर मुद्रास्फीति पर ध्यान दे रही है।

इस भूमिका को पढ़ने के उपरान्त एक आम पाठक के मन में कुछ सवालों का उठना स्वभाविक है, जैसे- मुद्रास्फीति घट रही है तो रेपो रेट क्यों कम होना चाहिये? हेडलाइन और कोर मुद्रास्फीति क्या है, और ये दोनों एक-दूसरे से अलग कैसे हैं? क्यों कोर मुद्रास्फीति पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है? इस आलेख में हम इन सभी सवालों के उत्तर ढूँढने की कोशिश करेंगे।

रेपो रेट और मुद्रास्फीति में संबंध

जैसा कि हम जानते हैं कि बैंकों को अपने काम-काज़ के लिये अक्सर बड़ी रकम की ज़रूरत होती है। बैंक इसके लिये आरबीआई से अल्पकाल के लिये कर्ज़ मांगते हैं और इस कर्ज़ पर रिज़र्व बैंक को उन्हें जिस दर से ब्याज देना पड़ता है, उसे ही रेपो रेट कहते हैं। रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिये रिज़र्व बैंक से कर्ज़ लेना सस्ता हो जाता है और तभी बैंक ब्याज दरों में भी कटौती करते हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा रकम कर्ज़ के तौर पर दी जा सके।

मुद्रास्फीति बढ़ने का एक मतलब यह भी है कि वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में वृद्धि के कारण, बढ़ी हुई क्रय शक्ति के बावजूद लोग पहले की तुलना में वर्तमान में कम वस्तु एवं सेवाओं का उपभोग कर पा रहें हैं। ऐसी स्थिति में आरबीआई का कार्य यह है कि वह बढ़ती हुई मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखने के लिये बाज़ार से पैसे को अपनी तरफ खींच ले। अतः आरबीआई रेपो रेट में बढ़ोतरी कर देता है ताकि बैंको के लिये कर्ज़ लेना महँगा हो जाए और वे अपने बैंक दरों को बढ़ा दे ताकि लोग कर्ज़ न ले सकें।

ध्यातव्य है कि पिछले कुछ समय से मुद्रास्फीति में गिरावट देखी जा रही है फिर भी आरबीआई ने रेपो रेट को अपरिवर्तित रखा है, क्योंकि वह हेडलाइन मुद्रास्फीति के बजाय कोर मुद्रास्फीति को अधिक गंभीरता से ले रही है।

हेडलाइन और कोर मुद्रास्फीति में अंतर

हेडलाइन मुद्रास्फीति, मुद्रास्फीति का कच्चा आँकड़ा है जो कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के आधार पर तैयार की जाती है। हेडलाइन मुद्रास्फीति में खाद्य एवं ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को भी शामिल किया जाता है। कोर मुद्रास्फीति वह है जिसमें खाद्य एवं ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को शामिल नहीं किया जाता है।

दरअसल, कोर मुद्रास्फीति के आकलन में वैसे मदों पर ध्यान नहीं दिया जाता है जो किसी अर्थव्यवस्था में माँग और उत्पादन के पारंपरिक ढाँचे के बाहर हों, जैसे- पर्यावरणीय समस्यायों के कारण उत्पादन में देखी जानेवाली कमी। गौरतलब है कि औद्योगिक अर्थव्यवस्था वाले देशों के नीति-निर्माता अरसा पहले हेडलाइन मुद्रास्फीति पर ध्यान देना बंद कर चुके हैं। जैसा कि इन दिनों हमारे यहाँ हो रहा है।

क्यों उचित है कोर मुद्रास्फीति पर ध्यान केन्द्रित करना?

वस्तुतः कोर मुद्रास्फीति वह मुद्रास्फीति है जिसमें किसी अर्थव्यवस्था में अंतर्निहित प्रवृत्तियों का अध्ययन किया जाता है, क्योंकि इन्ही प्रवृत्तियों के आधार पर यह तय किया जाता है कि अमुक समय सीमा के दौरान माँग का रुख कैसा रहेगा और फिर इसके अनुरूप ही किसी तय समय के लिये मौद्रिक नीतियों का निर्माण किया जाता है।

कोर मुद्रास्फीति के आकलन में खाद्य वस्तुओं एवं ईंधन की कीमत को न शामिल करना उचित माना जाता है क्योंकि खाद्य वस्तुओं एवं ईंधन की कीमत में त्वरित परिवर्तन की आशंका लगातार बनी रहती है। यदि खाद्य वस्तुओं एवं ईंधन की कीमतों को सम्मिलित करते हुए तैयार किये गए मुद्रास्फीति के आँकड़ों के आधार पर मौद्रिक नीतियों का निर्माण किया जाए तो बदलती कीमतों के आधार पर नीतियों में भी बदलाव लाना होगा और मौद्रिक नीतियों में साप्ताहिक या अर्द्धमासिक बदलाव लाया जाना व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता।

निष्कर्ष

दरअसल, बात जब मुद्रास्फीति की होती है तो आम जनता यही समझती है कि आटा, दाल व चावल का भाव बढ़ गया है और इसमें कमी की लिये सरकार मौद्रिक नीतियाँ बना रही है, जबकि कोर मुद्रास्फीति को केंद्र में रखकर बनाई गई नीतियों में ये बातें शामिल नहीं की जाती हैं।

मान लिया जाए कि लगातार तीन साल से सूखे की स्थिति बनी हुई है और इसकी वज़ह से खाद्य वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हों तो यह अर्थव्यवस्था में माँग एवं उत्पादन चक्र को व्यापक समय के लिये बुरी तरह से प्रभावित करती हैं। विदित हो कि हेडलाइन मुद्रास्फीति जिन कारणों से बढ़ रही है यदि उन कारणों का प्रभाव लम्बे समय तक बना रहे तो कोर मुद्रास्फीति में भी वृद्धि देखने को मिलती है 

अतः हेडलाइन मुद्रास्फीति को एक सिरे से खारिज़ करना भी उचित नहीं कहा जा सकता। अतः आरबीआई से यही उम्मीद की जानी चाहिये कि मौद्रिक नीतियों के निर्धारण में कोर मुद्रास्फीति के साथ–साथ हेडलाइन मुद्रास्फीति को भी ध्यान में रखे।