केंद्र प्रायोजित योजनाएँ और राज्य

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में केंद्र प्रायोजित योजनाओं और केंद्रीय क्षेत्रक योजनाओं पर चर्चा की गई है, साथ ही केंद्र प्रायोजित योजनाओं के संबंध में चुनौतियों का भी उल्लेख किया गया है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत की विविधता और विशालता को देखते हुए भारत के लिये संघात्मक शासन व्यवस्था का चुनाव किया था एवं इस प्रकार की व्यवस्था का सार, संघ और राज्यों के मध्य कानूनी संप्रभुता (Legal Sovereignty) की साझेदारी में निहित होता है। संघ और राज्यों के मध्य संबंधों को सुगम बनाए रखने के लिये आवश्यक है कि उनके कानूनी क्षेत्राधिकार एवं कानून निर्माण की शक्तियों का निर्धारण किया जाए। भारतीय संविधान में भी संघ और राज्यों के मध्य संतुलन बनाए रखने हेतु इस प्रकार की व्यवस्था की गई है। संविधान की 7वीं अनुसूची इस बात का निर्धारण करती है कि संघ और राज्य के मध्य भिन्न-भिन्न विषयों पर कानून निर्माण हेतु शक्तियों का बँटवारा किस प्रकार किया जाएगा।

  • संविधान की 7वीं अनुसूची में तीन प्रकार की सूचियाँ दी गई हैं - (1) संघ सूची (2) राज्य सूची और (3) समवर्ती सूची। संघ सूची में ऐसे विषयों का समावेशन किया गया है जिन पर कानून निर्माण की शक्ति सिर्फ केंद्र के पास है और राज्य सूची में उन विषयों का समावेशन किया गया है जिन पर कानून निर्माण की शक्ति राज्य के पास है, वहीं समवर्ती सूची में समावेशित विषयों पर राज्य व केंद्र दोनों को कानून बनाने का अधिकार है।

चूँकि किसी भी राष्ट्र को अपने लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्राप्ति एवं अपने नागरिकों के विकास हेतु कुछ योजनाओं और नीतियों की आवश्यकता होती है, इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए नीति निर्माताओं ने भारत की संघीय व्यवस्था में संघ और राष्ट्र के मध्य भारत की विकास योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिये इसे दो भागों- केंद्रीय क्षेत्रक योजना (Central Sector Schemes) और केंद्र प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Schemes) में विभाजित किया है।

केंद्रीय क्षेत्रक योजनाएँ

(Central Sector Schemes)

  • केंद्रीय क्षेत्रक योजनाओं की मुख्य विशेषता यह है कि इनका 100 प्रतिशत वित्तपोषण केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है और साथ ही इनका कार्यान्वयन भी केंद्रीय तंत्र द्वारा ही किया जाता है।
  • केंद्रीय क्षेत्रक योजनाएँ मुख्य रूप से संघ सूची में उल्लेखित विषयों पर बनाई जाती हैं।
  • इसके अलावा केंद्रीय क्षेत्रक योजनाओं में कुछ अन्य कार्यक्रम भी शामिल हैं जो विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा सीधे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू किये जाते हैं।
  • नमामि गंगे-राष्ट्रीय गंगा योजना, गरीब घरों में LPG कनेक्शन, फसल बीमा योजना, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पुनर्पूंजीकरण, परिवार कल्याण योजनाएँ, श्रमिक कल्याण योजनाएँ, छात्रवृत्ति योजना, माध्यमिक शिक्षा के लिये बालिका प्रोत्साहन, किसानों को अल्पकालिक ऋण के लिये ब्याज अनुदान और प्रधानमंत्री मुद्रा योजना आदि केंद्रीय क्षेत्रक योजनाओं के कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।

केंद्र प्रायोजित योजनाएँ

(Centrally Sponsored Schemes-CSS)

  • केंद्र प्रायोजित योजनाओं का अर्थ कुछ ऐसी योजनाओं से होता है, जिनमें योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु वित्त की व्यवस्था केंद्र तथा राज्य द्वारा मिलकर की जाती है। ऐतिहासिक तौर पर इस प्रकार की योजनाओं को एक ऐसे माध्यम के रूप में देखा जाता है जिसमें केंद्र सरकार राज्यों को योजनाओं के कार्यान्वयन में वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
  • इस प्रकार की योजनाओं में राज्य द्वारा दी जाने वाली राशि का प्रतिशत राज्यों के साथ परिवर्तित होता रहता है। यह 50:50, 60:40, 70:30 या 75:25 में हो सकता है, वहीं कुछ विशेष राज्यों जैसे- पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों के लिये यह 90:10 (यहाँ 90 केंद्र का हिस्सा है और 10 राज्य का) भी रहता है।
  • CSS के तहत जो योजनाएँ तैयार की जाती हैं वे मुख्यतः राज्य सूची के तहत आने वाले विषयों से संबंधित होती हैं।
  • CSS के तहत आने वाली कुछ प्रमुख योजनाओं में MGNREGA, हरित क्रांति, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत मिशन और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन आदि शामिल हैं।

केंद्र प्रायोजित योजनाएँ और वर्तमान परिदृश्य

  • वर्तमान CSS समूह (CSS Basket) 31 मार्च, 2020 को 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के साथ ही समाप्त हो जाएगा और 1 अप्रैल, 2020 से पूर्व हमारे पास केंद्र प्रायोजित योजनाओं का एक नया समूह होगा।
  • 15वें वित्त आयोग के विचारार्थ विषयों (Terms of Reference-ToR) में भी केंद्र प्रायोजित योजनाओं अर्थात् CSS की पुनः समीक्षा भी शामिल है।

केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर गठित मुख्य समितियाँ

बी.के. चतुर्वेदी रिपोर्ट

योजना आयोग ने अप्रैल 2011 में बी.के. चतुर्वेदी की अध्यक्षता में CSS के पुनर्गठन हेतु आवश्यक उपायों की पहचान करने के लिये एक समिति का गठन किया था। सितंबर 2011 में प्रस्तुत इस समिति की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि:

  • 9 फ्लैगशिप योजनाओं (जैसे-MGNREGA, प्रधानमंत्री आवास योजना, सर्व शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन आदि) को CSS के रूप में बनाए रखना चाहिये, जबकि अन्य छह योजनाओं (जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन और RKVY आदि) को केंद्रीय क्षेत्रक योजनाओं का रूप दे देना चाहिये।
  • सार्वजानिक व्यय के लिये अधिकतम योजनाओं की संख्या 15 होनी चाहिये।

2015 में गठित मुख्यमंत्रियों के उप-समूह की रिपोर्ट

वर्ष 2015 में नीति आयोग ने केंद्र प्रायोजित योजनाओं के रेशनलाइज़ेशन (Rationalization) पर मुख्यमंत्रियों के एक उप-समूह का गठन किया था, जिसे वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने स्वीकृति प्रदान की। मुख्यमंत्रियों के उप-समूह द्वारा की गई मुख्य सिफारिशें:

  • केंद्र प्रायोजित योजनाओं की संख्या 30 से अधिक नहीं होनी चाहिये।
  • सभी केंद्र प्रायोजित योजनाओं को मुख्यतः 3 भागों में विभाजित किया जाना चाहिये।
    • कोर ऑफ द कोर स्कीम (Core of the Core Schemes) - इस प्रकार की योजनाएँ अधिकतर सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक समावेशन से संबंधित होती हैं और इनमें से अधिकांश योजनाओं में राज्यों की विशिष्ट भागीदारी पहले ही निर्धारित होती है। उदाहरण के लिये मनरेगा (MGNREGA) के मामले में, राज्य सरकारों को 25 प्रतिशत व्यय करना पड़ता है।
    • कोर स्कीम (Core Schemes) - इस प्रकार की योजनाओं में अधिकतर राष्ट्रीय विकास एजेंडा प्रमुख होता और इनके लिये केंद्र और राज्य मिलकर टीम इंडिया की भावना के साथ काम करते हैं। कोर स्कीम में वित्तीय भागीदारी का अनुपात मुख्यमंत्रियों के उप-समूह ने निर्धारित किया था। यह अनुपात पूर्वोत्तर राज्यों व हिमालयी राज्यों के लिये 90:10 है, जबकि देश के अन्य राज्यों के लिये यह 60:40 है।
    • ऑप्शनल स्कीम (Optional Schemes) - इन योजनाओं को लागू करने के संदर्भ में राज्य स्वतंत्र होते हैं और वे आवश्यकतानुसार इनको लागू कर सकते हैं। इन योजनाओं के वित्तपोषण का अनुपात पूर्वोत्तर राज्यों व हिमालयी राज्यों के लिये 80:20 है, जबकि देश के अन्य राज्यों के लिये यह 50:50 है।

इस प्रकार के वर्गीकरण के लाभ

केंद्र प्रायोजित योजनाओं को कोर ऑफ द कोर स्कीम, कोर स्कीम और ऑप्शनल स्कीम में वर्गीकृत करने से काफी हद तक केंद्र और राज्य के मध्य संसाधनों के इष्टतम प्रयोग को सुनिश्चित किया जा सका है। साथ ही इस प्रकार का वर्गीकरण यह भी सुनिश्चित करता है कि योजनाओं का लाभ अधिकतम लोगों तक पहुँचे।

प्रमुख योजनाओं के नाम

  • कोर ऑफ द कोर स्कीम
    • राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम
    • मनरेगा
    • अनुसूचित जातियों के विकास के लिये योजनाएँ
    • अनुसूचित जनजातियों के विकास के लिये योजनाएँ
    • अल्पसंख्यकों के विकास हेतु कार्यक्रम
    • पिछड़े वर्गों के विकास हेतु योजनाएँ
  • कोर स्कीम
    • ‘हरित क्रांति’ योजना
    • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
    • प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना
    • स्वच्छ भारत मिशन
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन
  • ऑप्शनल स्कीम
    • सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम
    • श्यामा प्रसाद मुखर्जी रुर्बन मिशन

संबंधित मुद्दे

केंद्रीय बजट की जाँच करने से मालूम होता है कि इस वर्ष सरकार की कुल 28 CSS हैं। परंतु विश्लेषण से ज्ञात होता है कि एक ही योजना को ‘अम्ब्रेला योजना’ (Umbrella Scheme) मानते हुए इनके अंदर भी कई योजनाएँ निर्धारित की गई हैं। इस प्रकार यदि सभी योजनाओं को गिनें तो यह आँकड़ा 200 के भी पार पहुँच सकता है। तीसरी राष्ट्रीय विकास परिषद में कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने कहा था कि “कई बार केंद्र प्रायोजित योजनाओं में अपने अंशदान की पूर्ति के लिये संसाधनों की कमी राज्यों के समक्ष बड़ी चुनौती होती है।” साथ एक अन्य बैठक में यह भी मुद्दा उठा था कि अन्य मंत्रालयों द्वारा कई बार जो केंद्र प्रायोजित योजनाएँ चलाई जाती हैं उनमें भी अंशदान के लिये राज्यों के समक्ष चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

CSS की आलोचना

  • लगभग सभी केंद्र प्रायोजित योजनाएँ केंद्र के एजेंडा और प्राथमिकताओं का ही प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि राज्यों के लिये इनकी कोई प्रासंगिकता नहीं होती।
  • इस प्रकार की योजनाओं में राज्यों के लिये लचीलेपन की कमी होती है।
  • राज्यों की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं और इसलिये एक सार्वभौमिक केंद्र प्रायोजित योजना सभी मामलों में व्यावहारिक नहीं हो पाती।
  • कई केंद्र प्रायोजित योजनाएँ जिनमें केंद्र से प्राप्त होने वाली राशि काफी कम होती है, राज्यों के लिये बोझ हो सकती है।

निष्कर्ष

भारतीय संघीय ढाँचे का झुकाव केंद्र की ओर है। इसके तहत केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़कर राज्यों के समग्र विकास के लिये केंद्रीय क्षेत्रक योजनाओं के साथ केंद्र प्रायोजित योजनाओं का संचालन किया जाता है। लेकिन कई बार ये योजनाएँ राज्यों को वांछनीय परिणाम नहीं दे पाती हैं, क्योंकि इन योजनाओं के निर्धारण में राज्यों के पक्ष को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया जाता है। अतः इन योजनाओं में राज्यों की चिंता शामिल करते हुए ‘सभी के लिये एक’ दृष्टिकोण के स्थान पर विभिन्न राज्यों के लिये अलग-अलग योजनाओं के क्रियान्वयन पर बल दिया जाना चाहिये जिससे देश का समावेशी विकास सुनिश्चित हो सके।

प्रश्न: केंद्र प्रायोजित योजनाएँ केंद्र व राज्यों के मध्य विवाद का विषय रही हैं। विवाद के कारणों को उचित उदाहरणों से स्पष्ट करते हुए समाधान हेतु उपाय सुझाएँ।