रोहिंग्या समस्या और समाधान के बिंदु

संदर्भ

  • बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्व में स्थित कॉक्स बाज़ार में खड़े होकर यदि बांग्लादेश- म्याँमार सीमा की तरफ नज़र दौड़ाई जाए तो सीमावर्ती क्षेत्र के आसमान का रंग धुएँ से धूसर हो चुका है। पश्चिमी म्याँमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या समुदाय के गाँवो को निर्दयतापूर्वक जलाया जा रहा है। ‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार 30 साल के एक किसान नूरुल इस्लाम के गाँव में गोलीबारी के बाद सेना ने आग लगा दी और वह बोट से बांग्लादेश भाग आया।
  • म्याँमार में सदियों से रहते आ रहे रोहिंग्या को वहाँ की नागरिकता से वंचित कर उन्हें राज्यविहीन बना दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि म्याँमार में सुरक्षा बलों द्वारा रोहिंग्याओं का सामूहिक बलात्कार और फिर उनकी हत्या की जा रही है।
  • अत्याचार और उत्पीडन से त्रस्त रोहिंग्या भारत कैसे आ गए? क्यों सरकार उन्हें वापस म्याँमार भेजना चाहती है? क्या उन्हे वापस भेजना उचित है? आज वाद-प्रतिवाद-संवाद के माध्यम से हम इन सवालों का उत्तर ढूंढने का प्रयास करेंगे।

क्या है रोहिंग्या शरणार्थी संकट?

Rohingya-crisis

  • दरअसल म्याँमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है, जबकि रोहिंग्याओं को मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी माना जाता है। हालाँकि, लंबे समय से वे म्याँमार के रखाइन प्रान्त में रहते आ रहे हैं।
  • दरअसल, बौद्धों का मानना यह है कि बांग्लादेश से भागकर आए रोहिंग्याओं को वापस वहीं चले जाना चाहिये।
  • रोहिंग्याओं और बौद्धों के बीच होने वाले छिटपुट टकराव को हवा तब मिली जब वर्ष 2012 में रखाइन प्रांत में हुए भीषण दंगों में लगभग 200 लोग मारे गए, जिनमें ज़्यादातर रोहिंग्या मुसलमान थे।
  • ये दंगे तब शुरू हुए, जब एक बौद्ध महिला की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई और इसका इल्ज़ाम तीन रोहिंग्याओं पर लगाया गया। इसके बाद तो अल्पसंख्यक रोहिंग्याओं और बहुसंख्यक बौद्धों के बीच कई बार हिंसक टकराव हुआ, लेकिन ज़्यादातर जान गँवाने वाले रोहिंग्या ही बताए जाते हैं।
  • म्याँमार के सुरक्षा बलों ने भी जब इन्हें सताना शुरू कर दिया तो इनके लिये म्याँमार में रहना कठिन हो गया।
  • इन परिस्थितियों में हज़ारों की संख्या में रोहिंग्याओं को म्याँमार छोड़कर भागना पड़ रहा है। ये नौकाओं में सवार होकर समुद्र में निकल तो जाते हैं, लेकिन कोई भी देश उन्हें लेने को तैयार नहीं होता।
  • ऐसे में हज़ारों लोग समंदर में ही फँसे रहते हैं, कुछ की नौकाएँ डूब जाती हैं, कुछ बीमारियों की भेंट चढ़ जाते हैं, जबकि कई मानव तस्करों के चंगुल में फँस जाते हैं।
  • किसी तरह सीमा पार कर भारत में बड़ी संख्या में रोहिंग्या आ बसे हैं। भारत में इनकी कुल संख्या 10 से 12 हज़ार बताई जाती है, हालाँकि गृह मंत्रालय के पास जो अन्य आँकड़े मौजूद हैं उनके अनुसार भारत में रह रहे रोहिंग्याओं की संख्या लगभग 40 हज़ार है।
  • रोहिंग्याओं के साथ-साथ वैश्विक समुदाय आज जहाँ भारत से उम्मीद लगाए बैठा है कि वह राज्यविहीन रोहिंग्याओं को शरण देगा, वहीं भारत सरकार का गृह मंत्रालय देश में पहले से मौजूद रोहिंग्याओं को म्याँमार वापस भेजने के लिये कमर कस चुका है।

अब वाद-प्रतिवाद-संवाद के ज़रिये चर्चा करते हैं कि आगे की राह क्या होनी चाहिये?

वाद

Kept

  • जहाँ एक ओर भारत में शरणार्थियों की हिफाज़त की ऐतिहासिक परंपरा रही है वहीं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और दक्षिण एशिया की एक प्रमुख शक्ति के तौर पर भारत को म्याँमार छोड़कर भाग रहे रोहिंग्याओं को अपने यहाँ शरण देनी चाहिये।
  • दरअसल ऐसा पहली बार नहीं होगा कि भारत ने रोहिंग्याओं को शरण नहीं दी है। विदित हो कि 1980 के दशक के उत्तरार्ध और 1990 के आरंभ में भारत ने म्याँमार से आने वाले हज़ारों शरणार्थियों का स्वागत किया था।
  • तब नई दिल्ली ने न केवल उनके भोजन और आश्रय जैसे बुनियादी ज़रूरतों का ख्याल रखा था, बल्कि म्याँमार में उनके लोकतांत्रिक आंदोलन को जारी रखने के लिये आवश्यक सहायता भी प्रदान की थी।
  • म्याँमार ही नहीं बल्कि तिब्बत के भी लगभग 12,0000 शरणार्थी शांतिपूर्वक देश में विभिन्न जगहों पर रह रहे हैं। यहीं नहीं भारत, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों से सैकड़ों शरणार्थियों का घर भी है।
  • यह चिंता जायज़ हैं कि आतंकवादी संगठन कुछ कट्टर रोहिंग्याओं के ज़रिये अपना नेटवर्क बढ़ा सकते हैं, फिर भारत को कम-से-कम तत्कालीन तौर पर उनके निर्वासन को मंज़ूरी देनी चाहिये और फिर इस समस्या के समाधान में केंद्रीय भूमिका निभानी चाहिये।
  • भारत के आर्थिक निवेश के लिये रखाइन राज्य में शांति और स्थिरता महत्त्वपूर्ण है। हाल ही में म्याँमार के दौरे पर गए भारतीय प्रधानमंत्री ने वहाँ जारी "अतिवादी हिंसा" पर चिंता जताई है और सामाजिक-आर्थिक लाभ के लिये आरंभ की जा रही परियोजनाओं के लिये राज्य में शांति बहाल करने की ज़रूरत पर बल दिया है। इस दृष्टि से भी भारत को रोहिंग्या मुद्दे को लेकर संवेदनशीलता दिखानी चाहिये।
  • विदित हो कि रखाइन राज्य में निरंतर जारी हिंसा के कारण दक्षिण-पश्चिम म्याँमार और भारत के पूर्वोत्तर में परिवहन ढाँचे के विकास के उद्देश्य से आरंभ की गई ‘कालादान मल्टी-मॉडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट’ और ‘भारत-म्याँमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग’ जैसी परियोजनाएँ बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।
  • जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा म्याँमार सरकार पर हिंसा खत्म करने और रोहिंग्या समस्या के समाधान के लिये दबाव बनाया जा रहा है तो भारत द्वारा इनकी अनदेखी करना एक बुद्धिमान रणनीतिक कदम नहीं होगा।

प्रतिवाद

HUMAN

  • रोहिंग्याओं का मामला पूरी तरह से एक चयनात्मक प्रतिरोध का उदाहरण है, संयुक्त राष्ट्र द्वारा भले ही आज इसे ‘नस्लीय संहार’ बताया जा रहा है, लेकिन यही संयुक्त राष्ट्र तब एकदम से चुप रह गया था, जब कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को बेदखल किया जा रहा था।
  • कश्मीरी पंडितों के जैसे ही विभाजन के बाद से जारी पाकिस्तानी हिंदुओं के पलायन के मामले में भी मानवाधिकारों के स्वयंभू ठेकेदारों ने आज तक कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई है।
  • जहाँ तक ​​रोहिंग्या मुद्दे के समाधान का सवाल है तो इस संबंध में ‘आंग सान सू की’ की अगुवाई वाली म्याँमार सरकार को अत्यधिक पहल करने की ज़रूरत है, जो म्याँमार में लोकतंत्र बहाली के अपने बहादुर संघर्ष के लिये जानी जाती हैं।
  • भारत में शरणार्थियों को शरण देने की परंपरा रही है, लेकिन उन शरणार्थियों ने कभी भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को बिगाड़ने का काम नहीं किया है। हालाँकि आज परिस्थितियाँ बदली हुई हैं।
  • यूरोप और अमेरिका में शरणार्थियों के कारण सुरक्षा व्यवस्था को आज गंभीर खतरा है और कुछ हद तक उग्र दक्षिणपंथी प्रतिक्रियाओं का कारण भी यही है। ऐसे में भारत को अपनी शरण देने की परंपरा के नाम पर देश की सुरक्षा और अखंडता को दाँव पर नहीं लगाना चाहिये।
  • प्रारंभ में सरकार ने कुछ रोहिंग्याओं को समायोजित करने का प्रयास किया है लेकिन इसके तुरंत बाद उस क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन आरंभ हो गए हैं और इसका उदहारण जम्मू है।
  • साथ ही यदि रोहिंग्या भारत में बसते हैं तो असहाय और बेरोज़गार युवा रोहिंग्या पाकिस्तान की इंटर सर्विस इंटेलिजेंस और अंतर्राष्ट्रीय जिहादी संगठनों जैसे कि अल-कायदा तथा अन्य लोगों के लिये आसान शिकार होंगे। अतः सरकार की वर्तमान नीति उचित है।

संवाद

Human Being

  • दरअसल, यह एक जटिल समस्या है क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए दुर्भाग्यपूर्ण और पीड़ित रोहिंग्याओं को वापस म्याँमार भेजना और बांग्लादेश को उन्हें स्वीकार करने के लिये मज़बूर करना मुश्किल है।
  • साथ ही हम बड़ी संख्या में म्याँमार से विस्थापितों को शरण भी नहीं दे सकते हैं। यह समस्या एक पक्षीय न होकर बहुपक्षीय है| ऐसा नहीं है कि रोहिंग्याओं पर हो रहे अत्याचार को बंद करने के लिये कहा जाए और ऐसा हो जाएगा।
  • वर्षों के संघर्ष ने रखाइन में दो वर्ग पैदा किये हैं, रोहिंग्या को बाहर करने की चाहत रखने वाला समूह तो है ही साथ ही अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का बदला लेने के लिये रोहिंग्याओं ने भी एक संगठन बना रखा है, जिसका नाम ‘रोहिंग्या मुक्ति सेना’ है। 
  • कहा जा रहा है कि रोहिंग्याओं पर हमले तब तेज़ हुए जब ‘रोहिंग्या मुक्ति सेना’ ने म्याँमार में करीब 40 पुलिस चौकियों को निशाना बनाया जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। जहाँ तक भारत की भूमिका का सवाल है तो भारत हर प्रकार के आतंकवाद का विरोध करता है और ‘रोहिंग्या मुक्ति सेना’ को वह समर्थन नहीं दे सकता।
  • इसमें कोई दो राय नहीं है कि रोहिंग्याओं को भेदभाव का शिकार होना पड़ा है और इसका कारण म्याँमार की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था है, जहाँ उन्हें नित्कृष्ट समझा जाता है। ऐसे में रोहिंग्या संकट के समाधान की एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी म्याँमार के राजनीतिक अभिजात वर्ग के कंधे पर है, जिसमें शामिल है सरकार, सेना और खुद ‘आंग सान सू की’।
  • रोहिंग्या समस्या भारत को कई तरीकों से प्रभावित करने वाली है। म्याँमार में भारत के निवेश को एक पल के लिये भूल भी जाएँ तो बांग्लादेश का क्या, जो कि अपने यहाँ घुस आए रोहिंग्याओं को बाहर निकालना चाहता है।
  • रोहिंग्या वापस म्याँमार तो जा नहीं सकते ऐसे में वे असम के रास्ते बांग्लादेश से भारत में प्रवेश करना चाहते हैं, जबकि असम सरकार ने आदेश दिया है कि किसी भी प्रकार के अवैध प्रवेश को पीछे धकेल दिया जाए।
  • यह घटनाक्रम बांग्लादेश के लिये भारत की तरफ से एक नकारात्मक संदेश के तौर पर लिया जा सकता है, जो कि दक्षिण एशिया में भारत का एक महत्त्वपूर्ण साझेदार है। साथ ही भारत ‘बिम्सटेक’ को फिर से जीवंत बनाने के प्रयास में है, जिसमें म्याँमार और बांग्लादेश दोनों को ही महती भूमिका है।
  • कुल मिलाकर कहें तो यह बस रोहिंग्याओं को शरण देने और न देने तथा पहले से मौजूद रोहिंग्याओं को देश में रखने और न रखने भर का मसला नहीं है, बल्कि इससे भारत के आर्थिक और रणनीतिक हित भी जुड़े हुए हैं।
  • अतः भारत को इस समस्या को हल करने के लिये एक दीर्घावधि समाधान तलाशना होगा। सुरक्षा चिंताओं का समुचित ध्यान रखते हुए किसी भी उग्र प्रतिक्रिया से बचना चाहिये।

जहाँ तक देश में पहले से ही मौजूद रोहिंग्याओं को वापस भेजने का प्रश्न है तो उस बारे में हम पहले यह जान लेते हैं कि सरकार उन्हें वापस म्याँमार भेजना क्यों चाहती है?

रोहिंग्याओं को क्यों वापस भेजना चाहती है सरकार?

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  • केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल ही में कहा था कि गैर-कानूनी तौर पर रह रहे 40 हज़ार रोहिंग्या देश से बाहर निकाले जाएंगे, क्योंकि देश में अलग-अलग जगहों पर रह रहे रोहिंग्या अब समस्या बनते जा रहे हैं।
  • दरअसल, अवैध विदेशी नागरिकों का पता लगाना और उन्हें वापस भेज देना एक निरंतर प्रक्रिया है और गृह मंत्रालय ‘विदेशी अधिनियम, 1946’ की धारा 3(2) के तहत अवैध विदेशी नागरिकों को वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में मामला

  • रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्याँमार भेजने के केंद्र सरकार के हालिया कदम का विरोध करते हुए दो रोहिंग्याओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। हाल ही में केंद्र सरकार ने 40 हज़ार से अधिक रोहिंग्याओं को वापस भेजने की योजना बनाई है। न्यायालय अब इस मामले में सुनवाई करेगा। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस संबंध में नोटिस जारी कर सरकार से जवाब माँगा है।
  • याचिका दायर करने वालों ने अपनी दलील में कहा है कि सरकार का उन्हें वापस भेजने का फैसला संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। चाहे कोई भारत का नागरिक हो या न हो, भारत का संविधान प्रत्येक इंसान को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है और रोहिंग्याओं को यदि इस समय म्याँमार भेजा जाता है तो वहाँ सेना द्वारा इन्हें मार दिया जाएगा।
  • याचिका में कहा गया है कि उन्हें वापस भेजने का प्रस्ताव भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीने और व्यक्तिगत आज़ादी का अधिकार) और अनुच्छेद 51(सी) के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 51(सी) में अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं संधियों के दायित्वों के अनुपालन का ज़िक्र किया गया है।

निष्कर्ष के बिंदुओं में हम दो प्रकार के समाधान की बात करेंगे। पहले रोहिंग्याओं को भारत में शरण देने को लेकर सरकार रुख क्या होना चाहिये इस पर बात कर लेते है तत्पश्चात देखेंगे कि देश में पहले से मौजूद रोहिंग्याओं के संबंध में क्या करना उचित रहेगा?

निष्कर्ष

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  • पिछले कुछ वर्षों में पूरा विश्व शरणार्थी संकट से जूझ रहा है। आज से लगभग दो साल पहले समुद्र तट पर औंधे मुँह लाल रंग की टी-शर्ट और ब्लू शॉर्ट पहने तीन वर्षीय मासूम अयलान कुर्दी की तस्वीर जब दुनिया के सामने आई तो यह शरणार्थी संकट का प्रतीक बन गई। दुनिया भर में इसकी भर्त्सना की गई।
  • सीरिया तुर्की आदि देशों से भागते लोगों ने यूरोप में शरण ली, लेकिन फ्रांस पर हुए हमले के बाद से पूरी दुनिया शरणार्थियों को लेकर सशंकित हो उठी है। भारत भी नहीं चाहेगा कि आज का कोई रोहिंग्या शरणार्थी कल को उसकी आतंरिक सुरक्षा की चुनौती बन जाए। लेकिन मसला सिर्फ आतंरिक सुरक्षा का ही नहीं है बल्कि यह भारत के पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध को बनाए रखने की अग्निपरीक्षा भी है।
  • विदित हो कि म्याँमार ने कुछ समय पहले रखाइन राज्य में संयुक्त राष्ट्र के पूर्व मुख्य महासचिव कोफी अन्नान के नेतृत्व में एक सलाहकार आयोग की नियुक्ति की थी, जिसमें म्याँमार के विशेषज्ञ भी शामिल थे।
  • इस आयोग ने रोहिंग्या समस्या के समाधान के लिये कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये थे, जैसे-म्याँमार में रोहिंग्याओं की सामाजिक स्थिति में सुधार करना, सेना द्वारा होने वाले अत्याचारों से मुक्ति दिलाना और उन्हें वहाँ की नागरिकता देना।
  • लेकिन सत्ता की चाह महान सुधारों के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा मानी जाती है और म्याँमार भी इससे अछूता नहीं है। बहुसंख्यक बौद्धों की इच्छाओं के विरुद्ध रोहिंग्याओं को म्याँमार में नागरिकता और भेदभाव-रहित जीवन कोई भी नहीं देना चाहता। यहाँ तक कि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ‘आंग सान सू की’ ने भी इस मामले में चुप्पी साध रखी है।
  • म्याँमार के साथ-साथ भारत को भी कोफी अन्नान आयोग की सिफारिशों को गंभीरता से लेना चाहिये और इसके अमल के हर संभव प्रयास किये जाने चाहियें क्योंकि यह बहुत ही जटिल और गंभीर समस्या के समाधान का सबसे बेहतर रास्ता बतलाता है।
  • वहीं यदि भारत में पहले से ही रहे रोहिंग्याओं को वापस भेजने के बारे में बात की जाए तो दस्तावेज़ों के अभाव में इनके बच्चों को स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता है, न ही इन्हें कोई काम-धंधे पर रखता है और न ही सरकार के किसी उपक्रम का लाभ मिल पाता है।
  • भारत ने 1951 के ‘यूनाइटेड नेशंस रिफ्यूजी कन्वेंशन’ और 1967 के प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं। दरअसल, इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाले देश की यह कानूनी बाध्यता हो जाती है कि वह शरणार्थियों की मदद करेगा। इसी की वज़ह से वर्तमान में भारत के पास कोई राष्ट्रीय शरणार्थी नीति नहीं है। लिहाज़ा शरणार्थियों की वैधानिक स्थिति बहुत अनिश्चित है, जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों के विरुद्ध है।
  • एक लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के नाते भारत का यह दायित्व बनता है कि वह संकटग्रस्त लोगों के लिये अपने दरवाज़े खुले रखे। जिस शरणार्थी को शरण देने की अनुमति दे दी गई है, उसे बकायदा वैधानिक दस्तावेज़ मुहैया कराए जाएँ, ताकि वह सामान्य ढंग से जीवन-यापन कर सके।
  • हालाँकि, देशहित सर्वोपरि होता है और इससे समझौता नहीं किया जा सकता। शरणार्थियों के कारण संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, कानून व्यवस्था के लिये चुनौती उत्पन्न होती है। सरकार के समाने सबसे बड़ा सवाल यह है कि रोहिंग्याओं को म्याँमार में वह भेजेगी कैसे और म्याँमार उन्हें वापस लेगा क्यों?
  • अतः परिस्थितियों को देखते हुए शरणार्थियों को वापस म्याँमार भेजने से ज़्यादा उचित एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था का निर्माण करना है, ताकि शरणार्थियों का प्रबंधन ठीक से हो सके।