UP PCS Mains-2025

Q. "भारत में शरणार्थी समस्या एक मानवीय मुद्दा होने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का भी विषय है।" चर्चा कीजिये। (उत्तर 200 शब्दों में दीजिये)

06 Mar 2026 | सामान्य अध्ययन पेपर 1 | भारतीय समाज

दृष्टिकोण / व्याख्या / उत्तर

हल करने का दृष्टिकोणः

  • शरणार्थियों को परिभाषित कीजिये।
  • शरणार्थी समस्या से संबंधित मानवीय मुद्दों पर प्रकाश डालिये।
  • इस समस्या के राष्ट्रीय सुरक्षा पहलुओं पर चर्चा कीजिये।
  • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष लिखिये।

परिचय

शरणार्थियों के लिये संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त (UNHCR) के अनुसार, शरणार्थी से आशय ऐसे व्यक्ति से है जो उत्पीड़न, युद्ध या हिंसा के कारण अपने देश से भागने के लिये मजबूर होता है। उदाहरण के लिये, रोहिंग्या अपने ही देश में धार्मिक उत्पीड़न से आश्रय और सुरक्षा चाहते हैं।

मुख्य भाग

शरणार्थी समस्या केवल मानवीय मुद्दा नहीं है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी मामला हैः

मानवीय पहलूः

  • ऐतिहासिक उत्तरदायित्वः भारत में शरणार्थियों को आश्रय देने की परंपरा रही है, जो मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
    • भारत ने 1950 के दशक में तिब्बतियों और 1980 के दशक में श्रीलंकाई तमिलों को शरण दी।
  • उत्पीड़न और भेद्यताः म्यांमार में हिंसा के कारण पलायन कर रहे रोहिंग्या जैसे कई शरणार्थियों को गंभीर मानवाधिकारों के हनन का सामना करना पड़ा है, जिससे उनकी सुरक्षा एवं गरिमा सुनिश्चित करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं समर्थन की आवश्यकता होती है।
    • 31 जनवरी, 2022 तक 46,000 से अधिक शरणार्थी और शरण चाहने वाले (मुख्य रूप से म्यांमार और अफगानिस्तान से) UNHCR इंडिया के साथ पंजीकृत हैं।
  • सामाजिक एकीकरण चुनौतियाँः शरणार्थी अक्सर भेदभाव एवं संसाधनों की कमी के कारण एकीकृत होने के लिये संघर्ष करते हैं।
    • शहरी क्षेत्रों में अफगान शरणार्थी सामाजिक अशांति की स्थिति के साथ हाशिये पर हैं।
  • बुनियादी सेवाओं तक पहुँचः कई शरणार्थियों के पास आवश्यक सेवाओं तक पहुँच की कमी है; उदाहरण के लिये रोहिंग्या शरणार्थियों को स्वास्थ्य देखभाल एवं शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
  • नैतिक दायित्वः उदाहरण के लिये वर्ष 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए शरणार्थी कमजोर आबादी को सुरक्षा प्रदान करने में भारत के नैतिक रुख को दर्शाते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी विचारः

  • सीमा नियंत्रण संबंधी चिंताएँः विशेष रूप से म्यांमार और अफगानिस्तान जैसे संघर्ष क्षेत्रों से शरणार्थियों के पलायन से सीमा प्रबंधन और अवैध क्रॉसिंग की संभावना के मुद्दों पर प्रकाश पड़ता है, जिससे सुरक्षा अभियान जटिल हो जाते हैं।
  • कट्टरता जोखिमः अनियमित शरणार्थी आबादी कट्टरपंथियों के संपर्क में आ सकती है।
  • आतंकवाद का खतराः जम्मू और कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में शरणार्थियों की उपस्थिति से चरमपंथी समूहों द्वारा घुसपैठ करने की आशंका बनी हुई है।
  • संसाधनों पर अतिरिक्त दबावः शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से स्थानीय संसाधनों और बुनियादी ढाँचे पर दबाव पड़ सकता है, जिससे शरणार्थियों तथा स्थानीय समुदायों के बीच तनाव पैदा हो सकता है।
  • भू-राजनीतिक गतिशीलताः शरणार्थी संकट को अक्सर भू-राजनीतिक हितों के माध्यम से देखा जाता है, जिसमें पड़ोसी देश दबाव बनाते हैं, जिससे भारत के राजनयिक संबंधों और सुरक्षा नीतियों पर प्रभाव पड़ सकता है।

संतुलित दृष्टिकोणः

  • भारत के समक्ष इन मानवीय जरूरतों एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने करने की चुनौती है।
    • विधिक ढाँचाः शरणार्थी संरक्षण के लिये एक स्पष्ट विधिक ढाँचा स्थापित करने से मानवीय और सुरक्षा चिंताओं दोनों को दूर करने में मदद मिल सकती है।
  • उदाहरणः यूनाइटेड किंगडम का राष्ट्रीयता और सीमा अधिनियम, 2022।
  • सामुदायिक जुड़ावः स्थानीय आबादी और शरणार्थियों के बीच संवाद तथा समझ को बढ़ावा देने से तनाव कम होने के साथ एकीकरण को बढ़ावा मिल सकता है।
  • सुरक्षा उपायः शरण चाहने वालों के लिये गहन पुनरीक्षण प्रक्रियाओं को लागू करने से मानवीय मूल्यों से समझौता किये बिना राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा दिया जा सकता है।
    • शरणार्थी सम्मेलन 1951 पर हस्ताक्षर।

निष्कर्ष

इसलिये भारत में शरणार्थी समस्या के लिये सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिससे वैध सुरक्षा चिंताओं को हल करते हुए शरण मांगने वाले व्यक्तियों की गरिमा एवं अधिकारों को मान्यता मिल सके। मानवीय और राष्ट्रीय स्थिरता दोनों के लिये इन हितों को संतुलित करना आवश्यक है।