UP PCS Mains-2025

प्रश्न. “यह अभिवृत्ति है, न कि अभिरूचि, जो किसी व्यक्ति की सफलता निर्धारित करती है”। आप इस कथन से क्या समझते हैं? (12 marks, 200 words)

09 Mar 2026 | सामान्य अध्ययन पेपर 4 | सैद्धांतिक प्रश्न

दृष्टिकोण / व्याख्या / उत्तर

हल करने का दृष्टिकोण:

  • अभिवृत्ति और अभिरूचि के बीच अंतर बताइए।
  • उदाहरणों की सहायता से अभिरूचि की अपेक्षा अभिवृत्ति के महत्त्व को समझाइए।
  • उद्धरण से सहमत/असहमति जताते हुए निष्कर्ष लिखिये।

परिचय

यह उद्धरण ज़िग ज़िगलर (Zig Ziglar) नामक अमेरिकी लेखक द्वारा दिया गया है। यह किसी के जीवन के लक्ष्य या पेशेवर करियर में ऊँचाइयों को प्राप्त करने में अभिरूचि से अधिक अभिवृत्ति के महत्त्व को दर्शाता है।

अभिवृत्ति एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति को संदर्भित करती है जो किसी विशेष वस्तु का कुछ हद तक पक्ष या विपक्ष के साथ मूल्यांकन करके व्यक्त की जाती है। यह किसी चीज़ के प्रति व्यक्तिगत व्यवहार की प्रमुख निर्धारक है।

दूसरी ओर, अभिरूचि किसी विशेष कार्य को करने की क्षमता (जन्मजात या अर्जित) को संदर्भित करती है। यह एक निश्चित प्रकार का कार्य करने की योग्यता का एक घटक है, जिसे ‘प्रतिभा’ भी माना जा सकता है। उदाहरणों में पेंटिंग करने की क्षमता, भाषा सीखने की क्षमता, नेतृत्व करने की क्षमता और प्रशासनिक कार्य करने की क्षमता आदि शामिल हैं। जब हम कहते हैं कि कोई व्यक्ति ‘प्रतिभाशाली’ है या उसके पास कुछ करने की प्रतिभा है, तो इसका अर्थ होता है कि उसके पास उस विशेष कौशल/कार्य के लिये योग्यता है।

मुख्य भाग

अभिरूचि की तुलना में अभिवृत्ति के महत्त्व को निम्नलिखित उदाहरणों से समझा जा सकता है-

परीक्षा में सफलता:
एक बच्चे में परीक्षा में अच्छे अंक लाने की अभिरूचि हो सकती है, लेकिन वह पढ़ाई के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति नहीं रखता है। उसका मानना है कि खुशहाल और आनंदमय जीवन जीने के लिये पढ़ाई अप्रासंगिक है। अपनी इस अभिवृत्ति के कारण, वह खराब अंक प्राप्त करता है।

‘खरगोश और कछुआ’ की कहानी:
इस कहानी में खरगोश के पास दौड़ जीतने की अभिरूचि थी, लेकिन उसने एक नकारात्मक अभिवृत्ति दिखाई, जहाँ उसने कछुए की सकारात्मक अभिवृत्ति (हार न मानने के) को कम आँका। इसलिये, खरगोश दौड़ हार गया और कछुआ जीत गया।

रामायण का उदाहरण:
रामायण में, हनुमान समुद्र से छलांग लगाकर लंका जा सकते थे, लेकिन उन्हें इस पर संदेह था और उन्होंने ऐसा करने का प्रयास नहीं किया। यह संदेह उनकी अभिवृत्ति के कारण था। बाद में, जाम्बवान ने हनुमान को याद दिलाया कि वह वायु के पुत्र हैं, जो पवन-देवता हैं और उनमें समुद्र से छलांग लगाने की क्षमता है। यहाँ, जाम्बवान ने अभिरूचि नहीं बनाई बल्कि उनकी अभिवृत्ति को अनुकूलित किया जिससे सफलता मिली।

सभी लोक सेवकों को दिये गए नियम और विनियम एक जैसे होते हैं, फिर भी उनके प्रदर्शन में अंतर होता है। सकारात्मक सोच वाले अधिकारी मामले के पक्ष में नियमों और विनियमों की व्याख्या करने में सक्षम होते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं, जबकि नकारात्मक सोच वाले अधिकारी मामले के विरुद्ध उन्हीं नियमों और विनियमों की व्याख्या करके लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं।

निष्कर्ष

अभिवृत्ति में अभिरूचि के प्रभाव को समाप्त करने की क्षमता होती है, इसलिये यह सही कहा गया है कि “यह अभिवृत्ति है, अभिरूचि नहीं, जो किसी की सफलता निर्धारित करती है”। हालाँकि, यह कथन सभी मामलों के लिये बिल्कुल सही नहीं माना जा सकता है। अभिरूचि भी किसी की सफलता निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, हालाँकि बहुत कम हद तक।