UP PCS Mains-2025

Q. भारत में सुशासन सुनिश्चित करने में सिविल सेवाओं की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये। भारतीय लोकतंत्र में उनकी प्रभावशीलता में उन्नति के लिये किन सुधारों की आवश्यकता है? (उत्तर 200 शब्दों में दीजिये)

05 Mar 2026 | सामान्य अध्ययन पेपर 2 | राजव्यवस्था

दृष्टिकोण / व्याख्या / उत्तर

हल करने का दृष्टिकोणः

  • भारत की सिविल सेवाओं के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करके शुरुआत कीजिये।
  • सिविल सेवाओं द्वारा निभाई जाने वाली विविध भूमिकाओं पर प्रकाश डालिये। सुधार प्रयासों पर भी चर्चा कीजिये।
  • सुधारों की आवश्यकता पर बल देते हुए निष्कर्ष निकालिये।

परिचय

ब्रिटिश शासन के दौरान मूल रूप से कानून और व्यवस्था बनाए रखने का काम करने वाली भारत की सिविल सेवाएँ अब एक व्यापक भूमिका निभाती हैं। प्रशासन के ‘स्टील फ्रेम’ के रूप में कार्य करते हुए उन्हें सामाजिक परिवर्तन के एजेंट और राष्ट्रीय विकास के चालक के रूप में देखा जाता है।

मुख्य भाग

भारत में सिविल सेवाओं द्वारा निभाई जाने वाली विभिन्न भूमिकाएँ इस प्रकार हैंः

  • सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनः सिविल सेवक संसाधनों का प्रबंधन, विकास लक्ष्य निर्धारित करने और आधुनिकीकरण कार्यक्रमों को लागू करके कल्याणकारी राज्य के लक्ष्यों को बढ़ावा देते हैं।
  • संवैधानिक उद्देश्यों को साकार करनाः कानून और व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों को संविधान द्वारा गारंटीकृत अधिकारों और अवसरों का आनंद सुनिश्चित करने के लिये एक मज़बूत सिविल सेवा आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय एकीकरणः भारत की केंद्रीकृत सिविल सेवाएँ देश को एकीकृत करती हैं, जहाँ अधिकारियों से स्थानीय पहचानों पर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की अपेक्षा की जाती है।
  • सहकारी संघवादः सिविल सेवाएँ समान विकास लक्ष्यों पर केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देती हैं।

विकासशील देशों में सिविल सेवा को बढ़ती जन अपेक्षाओं और सीमित सरकारी क्षमता के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन मांगों को पूरा करने के लिये, इसे कम तकनीकी, लोगों से अधिक जुड़ा हुआ और उनकी जरूरतों में निहित होना चाहिये। इससे जनता का विश्वास बढ़ेगा और सेवा अधिक प्रभावी बनेगी।

सिविल सेवाओं में सुधार के सरकारी प्रयासः

  • पॉल एप्पलबी जैसे विशेषज्ञों को सुधारों का सुझाव देने और प्रदर्शन का आकलन करने के लिये आमंत्रित करना।
  • प्रशासनिक सुधार पर समितियों और आयोगों का गठन-
  • प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट (1967-70)।
  • सुरेन्द्र नाथ समिति (2003)।
  • सिविल सेवा सुधारों पर पी.सी. होता समिति (2004)।
  • दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग (2005 से अब तक)।
  • सिविल सेवा सुधार पर बसवान समिति (2016)।
  • विभिन्न विभागों में संयुक्त सचिव स्तर पर पार्श्व प्रवेश की शुरुआत।

इसलिये, पिछले कुछ वर्षों में सिविल सेवाओं में और सुधार लाने के लिये कई प्रयास किये गए हैं, लेकिन सिविल सेवा की धारणा अभी भी किराया-मांगने की प्रवृत्ति, कामकाज में अस्पष्टता, जटिल प्रक्रियाएँ, लालफीताशाही और जवाबदेही की कमी से प्रभावित है।

निष्कर्ष

योग्यता आधारित पदोन्नति, डोमेन-विशिष्ट प्रशिक्षण, राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करना, नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना, प्राधिकरण का विकेंद्रीकरण, जवाबदेही तंत्र को मज़बूत करना और नियमित नैतिक प्रशिक्षण जैसे सुधार सिविल सेवाओं की प्रभावशीलता को बढ़ा सकते हैं। इन परिवर्तनों से शासन में सुधार होगा, कार्यकुशलता बढ़ेगी तथा भारत की प्रशासनिक प्रणाली में जनता का विश्वास बढ़ेगा।