UP PCS Mains-2025

Q. नव भारत के विकास पर जातिवाद के परिणामों की विवेचना कीजिये। (उत्तर 125 शब्दों में दीजिये)

03 Mar 2026 | सामान्य अध्ययन पेपर 1 | भारतीय समाज

दृष्टिकोण / व्याख्या / उत्तर

हल करने का दृष्टिकोणः

  • जाति और जातिवाद को परिभाषित कीजिये।
  • इसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिणाम बताइये।
  • जातिवाद को समाप्त करने के उपाय बताइये।
  • संक्षेप में बताइये कि जातिवाद समावेशी विकास में किस प्रकार बाधक है और इसके निराकरण हेतु आगे की राह बताइये।

परिचय

जाति व्यवस्था सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र का एक ऐसा रूप है जो सिद्धांतों और प्रथागत नियमों पर आधारित है। इसमें सामाजिक समूहों (जातियों) में लोगों का विभाजन शामिल है, जहाँ अधिकार जन्म से तय होने के साथ वंशानुगत होते हैं।

काका कालेकर के अनुसार, "जातिवाद एक सामाजिक समस्या के रूप में एक सर्वोपरि, निराधार और सर्वोच्च समूह निष्ठा है जिसमें न्याय, निष्पक्षता, समानता एवं सार्वभौमिक भाईचारे के स्वस्थ सामाजिक मानकों की अनदेखी होती है"। जातिवाद एक विशेष जाति के पक्ष में आंशिक या एकतरफा वफादारी के साथ एक नए भारत के विकास के लिये प्रमुख चुनौती है।

मुख्य भाग

जातिवाद के परिणामः

  1. राष्ट्रीय एकता में बाधाः जातिवाद से लोगों के बीच विभाजन को बढ़ावा मिलता है, जिससे असहिष्णुता, ईर्ष्या एवं संघर्ष होने के साथ राष्ट्रीय प्रगति के लिये आवश्यक एकता में बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।
  2. लोकतंत्र के लिये खतराः जाति आधारित राजनीति से शासन जटिल बनता है एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होती है, जिससे अक्सर निम्न जातियों की आवाज़ें हाशिये पर चली जाती हैं।
  3. नैतिक पतनः जातिवाद से भाई-भतीजावाद एवं पक्षपात को प्रोत्साहन मिलता है तथा नैतिक मानकों का पतन होता है।
  4. प्रतिभा एवं दक्षता की उपेक्षाः जब जाति, भर्ती और पदोन्नति के लिये एकमात्र मानदंड बन जाती है, तो इससे योग्यता नजरअंदाज हो सकती है।
  5. प्रतिभा पलायन की संभावनाः जातिगत भेदभाव से कुशल व्यक्ति विदेशों में अवसरों की तलाश हेतु प्रेरित हो सकते हैं, जिससे प्रतिभा पलायन को बढ़ावा मिल सकता है।
  6. निम्न जातियों की उन्नति में बाधाः जैसा कि नंबूदरीपाद ने उल्लेख किया है, जातिगत अलगाववाद से अवरोध पैदा होता है जिससे अंततः सामाजिक विकास तथा निम्न जातियों के उत्थान में बाधा आती है।

जातिवाद के प्रतिकूल प्रभावों के निराकरण हेतु उपायः

जातिवाद के प्रतिकूल प्रभावों के निराकरण हेतु कई समाधानों पर विचार किया जा सकता हैः

  1. उचित शिक्षाः शैक्षणिक संस्थानों को एक ऐसे वातावरण को बढ़ावा देना चाहिये जहाँ जातिगत भेदभाव कम से कम हो। व्यापक शिक्षा से समझ और स्वीकृति को बढ़ावा मिल सकता है।
    1. नई शिक्षा नीति, 2020 में ऐसी शिक्षा को प्राथमिकता दी गई है।
  2. अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहनः अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने से जातिगत सीमाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। इससे जातियों के बीच पारिवारिक संबंधों को बढ़ावा मिलने के साथ पूर्वाग्रह में कमी आती है।
    1. अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने के क्रम में डॉ. सविता अंबेडकर अंतरजातीय विवाह योजना की शुरुआत की गई।
  3. जातिगत आयाम को कम महत्त्व देनाः जाति से संबंधित शब्दावली के उपयोग को सीमित करने से समाज में (विशेष रूप से युवा पीढ़ियों के बीच) इसके महत्त्व को कम करने में मदद मिल सकती है। इस बदलाव से अधिक समावेशी पहचान को बढ़ावा मिल सकता है।
  4. सांस्कृतिक एवं आर्थिक समानताः सांस्कृतिक तथा आर्थिक समानता को बढ़ावा देने के प्रयास, विभिन्न जातियों के बीच अंतराल को कम करने में मदद कर सकते हैं। सभी के लिये संसाधनों तथा अवसरों तक पहुँच में सुधार लाने के उद्देश्य से निर्मित नीतियाँ जातिवाद पर आधारित सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम करने में सहायक हो सकती हैं।

इन मुद्दों को हल करने के लिये एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें शिक्षा, सामाजिक सुधार तथा समानता के प्रति प्रतिबद्धता शामिल है। जातिवाद का सामना करके, भारत में एक अधिक समावेशी भविष्य का मार्ग प्रशस्त (यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी नागरिक राष्ट्रीय विकास में योगदान दे सकें और उससे लाभान्वित हो सकें) हो सकता है