प्रश्न. राजकोषीय घाटा, राजस्व घाटा और प्राथमिक घाटा को परिभाषित कीजिये। भारत में राजकोषीय असंतुलन को कम करने में राजकोषीय उत्तरदायित एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिये। (उत्तर 125 शब्दों में दीजिये)
09 Mar 2026 | सामान्य अध्ययन पेपर 3 | अर्थव्यवस्था
हल करने का दृष्टिकोणः
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परिचय
राजकोषीय घाटा, राजस्व घाटा और प्राथमिक घाटा सरकार की उधार आवश्यकताओं और राजकोषीय अनुशासन की सीमा का आकलन करने के लिये उपयोग किये जाने वाले प्रमुख पैरामीटर हैं।
राजकोषीय घाटाः
राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और उसके कुल राजस्व (उधार को छोड़कर) के बीच का अंतर है। यह सरकार की अपने व्यय को पूरा करने के लिये उधार की आवश्यकता को दर्शाता है।
सूत्रः राजकोषीय घाटा = कुल व्यय - (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियाँ)।
राजस्व घाटाः
राजस्व घाटा सरकार के राजस्व व्यय और राजस्व प्राप्तियों के बीच का अंतर है। यह सरकार की चालू आय में परिचालन व्यय को पूरा करने के लिये कमी को दर्शाता है।
सूत्रः राजस्व घाटा = राजस्व व्यय - राजस्व प्राप्तियाँ।
प्राथमिक घाटाः
प्राथमिक घाटा राजकोषीय घाटे में से पिछले उधारों पर ब्याज भुगतान को घटाने के बाद प्राप्त होता है। यह ब्याज दायित्वों को छोड़कर, वर्तमान व्यय के लिये सरकार की उधारी आवश्यकताओं को दर्शाता है।
सूत्रः प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा - ब्याज भुगतान।
मुख्य भाग
राजकोषीय असंतुलन को कम करने में FRBM अधिनियम की प्रभावशीलताः
राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003, राजकोषीय अनुशासन को संस्थागत बनाने, राजकोषीय घाटे को कम करने और भारत में व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये पुरःस्थापित किया गया था।
उपलब्धियाँः
चुनौतियाँः
सुधार और आगे की राहः
संशोधित लक्ष्यः एन.के. सिंह की अध्यक्षता वाली FRBM समीक्षा समिति (2017) ने 2023 तक राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 2.5% तक सीमित रखने तथा ऋण-जी.डी.पी. अनुपात को 60% तक सीमित रखने का सुझाव दिया था, लेकिन कार्यान्वयन असमान बना हुआ है।
अधिक लचीलापनः दीर्घकालिक राजकोषीय स्थिरता सुनिश्चित करते हुए प्रति-चक्रीय राजकोषीय नीतियों की अनुमति देने से ढाँचा अधिक प्रभावी हो सकता है।
व्यय की गुणवत्ताः संख्यात्मक लक्ष्यों से हटकर सरकारी व्यय की गुणवत्ता में सुधार पर ध्यान केन्द्रित करना, सतत् राजकोषीय प्रबंधन के लिये महत्त्वपूर्ण है।
स्वतंत्र राजकोषीय परिषदः राजकोषीय अनुपालन की निगरानी के लिये एक स्वतंत्र निकाय की स्थापना से जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ सकती है।
निष्कर्ष
FRBM अधिनियम ने भारत के राजकोषीय अनुशासन और पारदर्शिता को बेहतर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालाँकि, आर्थिक संकटों, कमज़ोर प्रवर्तन और संरचनात्मक चुनौतियों के कारण इसकी प्रभावशीलता सीमित रही है। संशोधित लक्ष्यों, अधिक लचीलेपन और व्यय की गुणवत्ता पर जोर देकर अधिनियम को मजबूत करना दीर्घकालिक राजकोषीय स्थिरता सुनिश्चित करने तथा राजकोषीय असंतुलन को कम करने के लिये आवश्यक है।