UP PCS Mains-2025

Q. विश्लेषण कीजिये कि जलवायु परिवर्तन से किस प्रकार भारत में आपदाओं की आवृत्ति एवं तीव्रता में वृद्धि हो रही है। इन उभरती चुनौतियों का समाधान करने के लिये रणनीतियाँ बताइये। (उत्तर 125 शब्दों में दीजिये)

12 Mar 2026 | सामान्य अध्ययन पेपर 3 | आपदा प्रबंधन

दृष्टिकोण / व्याख्या / उत्तर

हल करने का दृष्टिकोणः

  • जलवायु परिवर्तन का संक्षिप्त विवरण दीजिये तथा स्पष्ट कीजिये कि भारत में आने वाली आपदाएँ इससे किस प्रकार संबंधित हैं। 
  • भारत में आपदाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों एवं चुनौतियों के समाधान संबंधी उपायों को स्पष्ट कीजिये। 
  • एक सक्रिय एवं बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर देते हुए निष्कर्ष लिखिये। 

परिचय

भारत विश्व का सातवाँ सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील देश है, इसके नौ राज्य वैश्विक स्तर पर शीर्ष 50 सबसे कमज़ोर क्षेत्रों में से एक हैं। देश के शहर जलवायु संकट के मामले में सबसे आगे हैं, जहाँ 80% से अधिक शहरी आबादी संवेदनशील जिलों में निवास करती है 

अत्यधिक गर्मी, अप्रत्याशित बाढ़ और लगातार आने वाले तूफान शहरी समुदायों पर लगातार दबाव डाल रहे हैं। ये प्रभाव वंचित क्षेत्रों में सर्वाधिक गंभीर हैं क्योंकि उनके पास नए जलवायु संबंधी खतरों से निपटने के लिये संसाधनों की कमी है।

भारत के छह जोन- दक्षिण, उत्तर, उत्तर-पूर्व, पश्चिम और मध्य क्षेत्र की गंभीर जल-मौसम संबंधी आपदाओं से निपटने की क्षमता सीमित है। हालाँकि, पूर्वी क्षेत्र, कुछ हद तक चरम जल-मौसम संबंधी आपदाओं से निपटने में सक्षम है।

जलवायु सुभेद्यता सूचकांक (CVI) के अनुसार, असम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी चरम जलवायु घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।

असंवहनीय भूदृश्य, बुनियादी ढाँचे की योजना का अभाव और मानव-प्रेरित सूक्ष्म जलवायु परिवर्तन इस उच्च भेद्यता के प्रमुख कारण हैं। 

मुख्य भाग

भारत में आपदाओं पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव 

  • चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्तिः बढ़ते तापमान ने विशेषकर अरब सागर के ऊपर चक्रवातों की तीव्रता को बढ़ा दिया है। उदाहरण के लिये, चक्रवात ताउते (वर्ष 2021) और चक्रवात बिपरजॉय (वर्ष 2023) ने व्यापक क्षति पहुँचाई।
  • तीव्र बाढ़ एवं भूस्खलनः अनियमित मानसून पैटर्न, हिमनदों के पिघलने तथा बादल फटने के कारण उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और असम जैसे राज्यों में भयंकर बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएँ हुई हैं। 
  • लंबी अवधि तक सूखा: वर्षा के बदलते पैटर्न तथा बढ़ते तापमान के कारण मध्य एवं दक्षिणी भारत में सूखे की स्थिति और खराब हो गई है, जिससे कृषि एवं जल उपलब्धता प्रभावित हो रही है। 
  • हीटवेवः जलवायु परिवर्तन ने हीटवेव को तीव्र कर दिया है तथा लम्बे समय तक उच्च तापमान के बने रहने से सार्वजनिक स्वास्थ्य, उत्पादकता और ऊर्जा की मांग प्रभावित हो रही है। 
  • तटीय सुभेद्यताः समुद्र का बढ़ता स्तर और तूफानी लहरें मुंबई, चेन्नई एवं कोलकाता जैसे तटीय शहरों के लिये खतरा बन रही हैं, जिससे लाखों लोगों के जीवन एवं महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा प्रभावित हो रहा है। 

उभरती चुनौतियों के समाधान की रणनीतियाँ 

  • जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचाः ऐसी अवसंरचना विकसित करें जो चरम मौसम की घटनाओं का सामना कर सके, जैसे बाढ़ प्रतिरोधी इमारतें और ऊँची सड़कें। 
  • पूर्व चेतावनी प्रणालियाँः आपदाओं के लिये समय पर चेतावनी प्रदान करने के लिये वास्तविक समय मौसम निगरानी एवं पूर्वानुमान प्रणालियों को मजबूत करना। 
  • समुदाय-आधारित अनुकूलनः आपदा तैयारी और सतत् प्रथाओं के लिये शिक्षा और क्षमता निर्माण के माध्यम से स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना। 
  • सतत् शहरी नियोजनः शहरी क्षेत्रों में हरित बुनियादी ढाँचे, वर्षा जल संचयन और प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन जैसे उपायों को लागू करना। 
  • नीतिगत एकीकरणः जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) और राज्य कार्य योजनाओं जैसी राष्ट्रीय नीतियों में जलवायु अनुकूलन रणनीतियों को एकीकृत करना। 
  • वनरोपण एवं पारिस्थितिकी तंत्रः आपदा जोखिमों को कम करने के लिये बड़े पैमाने पर वनरोपण को बढ़ावा देने के साथ-साथ मैंग्रोव जैसे पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा करना। 

निष्कर्ष

जलवायु-प्रेरित आपदाओं के प्रति भारत की संवेदनशीलता के लिये तकनीकी नवाचार, नीति एकीकरण और सामुदायिक भागीदारी के संयोजन के साथ एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इन बढ़ती चुनौतियों का समाधान करने के लिये अनुकूलन एवं स्थिरता को प्राथमिकता देना महत्त्वपूर्ण होगा।