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डेली न्यूज़

  • 06 Feb, 2019
  • 46 min read
भारतीय अर्थव्यवस्था

महाराष्ट्र में गुलाबी क्रांति

चर्चा में क्यों?


हाल ही में महाराष्ट्र में किसानों और उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाने के लिये उच्च गुणवत्ता वाला पोर्क 'गुलाबी क्रांति' के रूप में विकसित हो रहा है।

  • इसका उद्देश्य किसानों को आजीविका प्रदान करने के अलावा सस्ते माँस तक पहुँच से वंचित आबादी के एक बड़े हिस्से हेतु प्रोटीन की कमी की समस्या के समाधान के लिये आयातित सूअरों का प्रजनन करना है।

कौन करेगा इसका परिचालन?

  • महाराष्ट्र सरकार की नीतियों के तहत समर्थित मुंबई स्थित गार्गी जेनेटिक्स प्राइवेट लिमिटेड उच्च गुणवत्ता वाले पोर्क की आपूर्ति के लिये एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने पर काम कर रही है।
  • यह कंपनी कनाडा से आयातित सूअरों (Pigs) की आपूर्ति करके किसानों के साथ साझेदारी की योजना बना रही है। इनका प्रजनन उच्च गुणवत्ता वाले माँस के उत्पादन के लिये स्वच्छ वातावरण में किया जायेगा।
  • गार्गी जेनेटिक्स आयातित नस्लों के स्वच्छ पर्यावरण में उत्पादित पोर्क की आपूर्ति के माध्यम से इस चिंता का समाधान करने की योजना बना रहा है, साथ ही एक शिक्षा अभियान शुरू करेगा।
  • कंपनी की योजना है कि पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय मानक पर खरा उतरने वाले पिग्लेट (baby pig) का प्रजनन किया जाये जिससे पशुपालन, खाद्य और चिकित्सा उद्योग में सहायता मिलेगी।
  • पोर्क उत्पादन के लिये यह एक व्यापक मूल्य श्रृंखला का निर्माण करेगा, साथ ही चिकित्सा और अनुसंधान उद्योग,अंग प्रत्यारोपण एवं इंसुलिन के लिये उच्च गुणवत्ता वाले जानवरों की आपूर्ति भी करेगा।

वैश्विक संदर्भ में भारत की स्थिति

  • भारतीय पोर्क लगभग 250 रुपए प्रति किग्रा. की दर से बेचा जाता है जबकि अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता वाले संसाधित पोर्क की कीमत 1,200- 3,000 रुपए प्रति किग्रा. है।
  • कीमत में इतना ज़्यादा अंतर का सबसे बड़ा कारण भारत के पोर्क का असुरक्षित होने के साथ ही गुणवत्ता युक्त न होना है।
  • किसानों की क्षमता बढ़ाने, उपभोक्ताओं की सुरक्षित और स्वस्थ माँस की मांग को पूरा करने तथा स्वास्थ्य उद्योग विकसित करने के लिए स्वस्थ, सुरक्षित जानवरों की आवश्यकता है।

अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • ‘गुलाबी क्रांति’ योजना का उद्देश्य ’फार्म टू मार्केट’ अर्थात पोर्क की बाज़ार तक पहुँच में आने वाली समस्या का समाधान करना है।
  • स्वस्थ पोर्क उत्पादों को बढ़ावा देने के लिये प्रमाणित दुकानों/भोजनालयों की एक फ्रेंचाइजी श्रृंखला शुरू करने की योजना बनाई जा रही है।
  • पोर्क और इसके लाभों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिये सार्वजनिक शिक्षा चैनलों का भी उपयोग किया जाएगा।
  • पोर्क की सार्वजनिक छवि को बदलने और उपभोक्ता की रसोई में गुणवत्ता वाले उत्पाद लाने का प्रयास किया जाएगा
  • इस पहल को 2019 की दूसरी तिमाही में आधिकारिक तौर पर शुरू किया जाना सुनिश्चित किया गया है। कंपनी अपने पहले चरण में इक्विटी फंडिंग से 2 मिलियन डॉलर की राशि जुटाने को प्रयासरत है।
  • कंपनी द्वारा परियोजना शुरू करने के लिये महाराष्ट्र के पालघर ज़िले के वाडा में पहले ही ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया गया था।

स्रोत – द हिंदू


शासन व्यवस्था

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना पर अध्ययन-रिपोर्ट

चर्चा में क्यों?

हाल ही में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (Pradhan Mantri Ujjwala Yojana- PMUY) पर तैयार की गई अध्ययन-रिपोर्ट पंजीकरण के बाद पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय को सौंपी गई।

अध्ययन-रिपोर्ट के बारे में

  • अध्ययन-रिर्पोट का शीर्षक ‘लाइटिंग अप लाईव्ज थ्रू कुकिंग गैस एंड ट्रांसफॉर्मिंग सोसाइटी’ (Lighting up Lives through Cooking Gas and transforming Society) है और इसमें देश के सबसे बड़े सामाजिक परिवर्तन कार्यक्रमों में शामिल प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का सफर पेश किया गया है।
  • यह रिर्पोट प्रोफेसर एस. के. बरुआ (S.K. Barua) ने तैयार की है, जो IIM अहमदाबाद के पूर्व निदेशक हैं।
  • इस अध्ययन में बताया गया है कि किस तरह रसोई गैस ने गरीबों के जीवन को बदला है और सामाजिक-आर्थिक समावेश के ज़रिये उन्हें शक्ति संपन्न बनाया है।
  • अध्ययन रिर्पोट में योजना के पूरे सफर के बारे में जानकारी दी गई है और बताया गया है कि इस योजना की बदौलत पहली बार रसोई गैस का इस्तेमाल करने वालों को कितना लाभ हुआ।
  • अध्ययन रिपोर्ट के लेखक और उनके दल ने लाभार्थियों के साथ विस्तार से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है।
  • अध्ययन रिर्पोट को पंजीकृत कर लिया गया है और अब दुनिया भर के प्रबंधन संस्थानों में इसका उपयोग किया जा सकता है।
  • यह अध्ययन रिपोर्ट अब विश्व के सामने है और विश्व के देश इस योजना के संबंध में भारत के अनुभवों से लाभ उठा सकते हैं। इस तरह प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना कई देशों के लिये आदर्श के रूप में सामने आएगी।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY)

  • BPL (Below Poverty Line) यानी गरीबी रेखा से नीचे गुज़र-बसर करने वाले परिवारों की महिलाओं को निःशुल्क LPG कनेक्शन देने के लिये प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने 10 मार्च, 2016 को ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ को स्वीकृति दी थी।
  • इस योजना की शुरुआत 1 मई, 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले से हुई थी।
  • इस योजना में नया LPG कनेक्शन उपलब्ध कराने के लिये 1600 रुपए की नकद सहायता देना शामिल है और यह सहायता राशि केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाती है।

अध्ययन-रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • सरकारी तंत्र, सरकारी स्वामित्व वाली तेल विपणन कंपनियों (Oil Marketing Companies- OMCs) और बैंकिंग प्रणाली के बीच उत्कृष्ट समन्वय के माध्यम से इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन का पैमाना तैयार किया गया जिसने इस कार्यक्रम को गति प्रदान की।
  • केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों के अधिकारियों एवं ग्राम प्रधानों (सरपंचों) के प्रतिनिधित्त्व वाली सरकारी प्रणाली ने BPL लाभार्थियों की पहचान करने और लोगों को खाना पकाने के लिये प्रयुक्त होने वाले पारंपरिक ईंधन के स्थान पर LPG के उपयोग करने के विचार को स्वीकार करने में मदद की है।
  • OMCs (कार्यान्वयन में शामिल तीन कंपनियाँ IOCL, BPCL और HPCL) ने खाना पकाने के लिये प्रयुक्त होने वाले गैस सिलिंडर की बॉटलिंग और वितरण के लिये आवश्यक मज़बूत लॉजिस्टिक सिस्टम का निर्माण किया। उन्होंने पूरी प्रणाली के लिये आसान लेन-देन और रिकॉर्ड रखने हेतु आवश्यक IT प्लेटफॉर्म भी स्थापित किया।
  • बैंकों ने सरकार की तरफ से सब्सिडी उपलब्ध कराने और लेखांकन सहित धन के प्रवाह के लिये आवश्यक बुनियादी ढाँचा प्रदान किया।
  • PMUY स्पष्ट रूप से इस तरह के चुनौतीपूर्ण वातावरण में दुनिया में कहीं भी निष्पादित सबसे बड़ी सामाजिक मध्यवर्ती योजनाओं में से एक है। इसका सफल कार्यान्वयन इस प्रकार के अन्य मध्यवर्ती योजनाओं के प्रबंधन हेतु अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

आगे की राह

  • PMUY को ऐसे समय में लागू किया गया है जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल और रसोई गैस की कीमतें देश की अर्थव्यवस्था के अनुकूल हैं। लेकिन यदि भविष्य में इन कीमतों में वृद्धि होती है तो संभवतः LPG का उपयोग करना BPL परिवारों के लिये महँगा हो सकता है। लागत बढ़ने से ये परिवार फिर से पारंपरिक इंधन के उपयोग की ओर अग्रसर हो सकते हैं। इस तरह के पलायन को रोकने के लिये सरकार को ऊर्जा सब्सिडी के लिये अधिक धनराशि निर्धारित करनी होगी।
    सरकार को ऐसी स्थिति का सामना करने के लिये नीतिगत विकल्प चुनने पर भी विचार करना होगा।
  • सौर ऊर्जा समय के साथ सस्ती होती जा रही है और भारत में वर्ष भर पर्याप्त धूप उपलब्ध होती है। ऐसे में दूर-दराज़ के क्षेत्रों में सौर-पैनलों को आसानी से लगाया भी जा सकता है। ऐसे में सौर ऊर्जा भविष्य में प्राथमिक ऊर्जा का वैकल्पिक स्रोत बन सकती है। यदि ऐसा होता है, तो खाना पकाने के लिये LPG से सौर ऊर्जा की ओर अग्रसर होने के लिये किस प्रकार की नीतियों को अपनाया जाना चाहिये इस पर विचार करना भी आवश्यक है।
  • उज्ज्वला ने महिलाओं (साथ ही पुरुषों, जो ईंधन के लिये लकड़ी इकट्ठा करने में समय खर्च करते थे) का काफी समय बचाया है क्योंकि खाना पकाने में अब पहले की तुलना में कम समय लगता है और LPG की प्राप्ति में भी बहुत समय नहीं लगता है। अतः सरकार को इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि क्या इस बचे हुए समय का उपयोग ग्रामीण घरेलू आय को बढ़ाने के लिये किया जा सकता है यदि हाँ तो कैसे?

तीसरे पक्ष द्वारा मूल्यांकन कराने का सुझाव

  • कार्यक्रम के प्रभाव का आकलन किसी विश्वसनीय तीसरे पक्ष द्वारा किया जाना अधिक उपयोगी होगा। भले ही सरकार और OMCs द्वारा किये गए आंतरिक मूल्यांकन ने यह संकेत दिया था कि इस योजना के महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त हुए हैं लेकिन कार्यक्रम के प्रभाव का आकलन किसी विश्वसनीय तीसरे पक्ष द्वारा किया जाना अधिक उपयोगी होगा क्योंकि तीसरे पक्ष द्वारा किया गया मूल्यांकन अधिक विश्वसनीय होगा।

स्रोत : पी.आई.बी.


शासन व्यवस्था

खदानों में महिलाओं के लिये रोज़गार के समान अवसर

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने खान अधिनियम, 1952 (Mines Act, 1952) की धारा 83 की उपधारा (1) के अंतर्गत प्रदत्‍त अधिकार का उपयोग करते हुए खान अधिनियम, 1952 की धारा 46 के प्रावधानों से महिलाओं को ज़मीन के ऊपर या ज़मीन के नीचे स्थित खदान में रोज़गार प्रदान करने की छूट दी है।

सरकार ने यह छूट निम्नलिखित शर्तों के तहत प्रदान की है-

  • ज़मीन के ऊपर स्थित किसी खदान में महिलाओं को रोज़गार देने के मामले में खदान का मालिक महिलाओं को रात्रि 7 बजे से प्रात: 6 बजे तक की कार्य अवधि प्रदान कर सकता है।  जबकि ज़मीन के नीचे स्थित किसी खदान में रोज़गार देने के मामले में खदान का मालिक महिलाओं को प्रात: 6 बजे से सायं 7 बजे तक तकनीकी,  निरीक्षण और प्रबंधकीय कार्य सौंप सकता है जहाँ निरंतर उपस्थिति की आवश्‍यकता न हो।
  • दोनों ही तरह की खदानों में महिलाओं की नियुक्ति उनकी लिखित अनुमति के बाद ही की जाएगी।
  • ऐसी नियुक्ति में महिलाओं को पर्याप्‍त सुविधाएँ, सुरक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा प्रदान की जाएगी।
  • मुख्‍य खान निरीक्षक (Chief Inspector of Mines) द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर मानक संचालन प्रक्रियाओं (Standard Operating Procedures) के क्रियान्‍वयन को ध्‍यान में रखते हुए महिलाओं की नियुक्ति की जाएगी।
  • एक शिफ्ट में कम-से-कम तीन महिलाओं को ड्यूटी दी जाएगी।

पृष्ठभूमि

  • खान अधिनियम, 1952 में ज़मीन के ऊपर या नीचे स्थित खदानों में महिलाओं को सायं 7 बजे से प्रात: 6 बजे तक रोज़गार देना प्रतिबंधित  था।
  • विभिन्‍न महिला कामगार समूह, उद्योग जगत और इंजीनियरिंग एवं डिप्‍लोमा की पढ़ाई कर रहे छात्रों ने सरकार से समय-समय पर यह मांग की थी कि खदानों में कार्य करने के लिये महिलाओं को भी रोज़गार के समान अवसर दिये जाने चाहिये। खनन कंपनियों ने भी इस संबंध में अनुरोध किया था।
  • श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय (Ministry of Labour & Employment) ने यह छूट खान अधिनियम, 1952 की धारा 12 के तहत गठित समिति की अनुशंसाओं तथा गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs), महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (Ministry of Women and Child Development), खान मंत्रालय (Ministry of Mines), कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) और पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय (Ministry of Petroleum and Natural Gas) के परामर्श के आधार पर प्रदान की है।

स्रोत : पी.आई.बी.


कृषि

‘शीर्ष कपास उत्पादक’ का तमगा खो देगा भारत

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2018-19 की हालिया अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि भारत प्रतिकूल जलवायु और अपर्याप्त वर्षा की वज़ह से ‘शीर्ष कपास उत्पादक’ होने का अपना तमगा खो देगा। गौरतलब है कि कपास उत्पादन में दुसरे नंबर पर स्थित चीन पिछले कुछ वर्षों के दौरान बेहतर कृषि पद्धतियों की सहायता से अच्छी पैदावार प्राप्त करने में सक्षम रहा है।

प्रमुख बिंदु

  • अंतर्राष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति (International Cotton Advisory Committee-ICAC) के अनुसार, भारत के कपास उत्पादन क्षेत्रों में ‘अपर्याप्त वर्षा’ के कारण कुल उत्पादन में 7 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है, जबकि चीन का उत्पादन लगभग 1 प्रतिशत बढ़ जाएगा।
  • कपास उगाने योग्य क्षेत्रों में प्रतिकूल जलवायु और जल उपलब्धता न होने की स्थिति के कारण भारत निश्चित रूप से चीन से पीछे हो जाएगा।
  • तेलंगाना और कर्नाटक में स्थिति और खराब है।
  • गौरतलब है कि भारत ने 2015-16 सीज़न के दौरान कपास उत्पादन में चीन को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष कपास उत्पादक बना था।
  • बदलती जलवायु की वज़ह से भारत कपास उत्पादन गिरता जा रहा है क्योंकि कपास उत्पादन योग्य क्षेत्र का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा गैर-सिंचित है और यह क्षेत्र बारिश पर अत्यधिक निर्भर रहता है।

कपास उत्पादन की वैश्विक स्थिति

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  • वैश्विक आँकड़ों के अनुसार, 2018-19 सत्र की अगस्त-दिसंबर अवधि के लिये भारत का कपास उत्पादन 5.98 मिलियन टन रहने का अनुमान है।
  • भारत के सर्वोच्च कपास व्यापार निकाय, कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (Cotton Association of India-CAI) के अनुसार, वर्ष 2018-19 के लिये भारत का कपास उत्पादन 335 लाख गाँठ (प्रत्येक 170 किलोग्राम) तक कम हो जाएगा, जो 2010-11 के 332.25 लाख गाँठ के बाद से सबसे कम है।

संसाधन बनाम उपज

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  • एक तरफ जहाँ भारत की अनुमानित कपास उपज लगभग 483-500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, वहीं चीन की उपज लगभग 1,755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है।
  • हालाँकि सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर कॉटन रिसर्च (Central Institute for Cotton Research-CICR) के निदेशक के अनुसार, अच्छी खेती के तरीकों पर किसानों के बीच जागरूकता की कमी भी कम पैदावार की एक वज़ह है। क्योंकि प्रति हेक्टेयर 1,200-1,500 किलोग्राम तक की कपास उपज कुछ विकट परिस्थितियों में भी हासिल की जा चुकी है। बेहतर कृषि प्रबंधन से ही उत्पादकता में सुधार आता है।

अंतर्राष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति

  • अंतर्राष्ट्रीय कपास सलाहकार समिति कपास का उत्पादन, खपत और व्यापार करने वाले सदस्य देशों का एक संघ है। इसका मुख्यालय वाशिंगटन DC, अमेरिका में है।
  • भारत 1939 से इस समूह के 27 सदस्यों में से एक है।

स्रोत- द हिंदू बिज़नेस लाइन


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भारत-मोनाको संबंध

चर्चा में क्यों?

हाल ही में मोनाको के राजकुमार अल्बर्ट द्वितीय (Albert II) अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर भारत आए। इस यात्रा के दौरान कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए।

प्रमुख बिंदु

  • मोनाको के राजकुमार अल्बर्ट द्वितीय की यात्रा से द्विपक्षीय सहयोग के क्षेत्र में प्रगति की समीक्षा करने और पारस्परिक हित के क्षेत्रों में साझेदारी को आगे बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करने का अवसर प्राप्त हुआ।
  • यात्रा के दौरान निम्नलिखित समझौतों पर हस्ताक्षर किये गए-

♦ पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा पर सहयोग।
♦ विकास के क्षेत्र में संबंध स्थापित करना, विशेषकर अवसंरचना के क्षेत्र में।
♦ मोनाको के राजनयिक पासपोर्ट धारकों के लिये वीज़ा छूट।
♦ व्यावसायिक सहयोग के लिये गुंज़ाइश।
♦ दोनों पक्षों ने समुद्रीय संसाधनों और शहरी मामलों (स्मार्ट सिटी) के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने का भी फैसला किया है।

भारत-मोनाको संबंध

  • भारत और मोनाको की रियासत ने आधिकारिक रूप से 21 सितंबर, 2007 को राजनयिक संबंध स्थापित किये थे। हालाँकि भारत और मोनाको की रियासत के बीच वाणिज्यिदूतावास स्तर का संबंध (Consular Relations) 30 सितंबर, 1954 से मौजूद है।

मोनाको

  • मोनाको भूमध्यसागरीय तट पर दक्षिणी यूरोप में स्थित एक शहर-राज्य है।
  • मोनाको 2 किमी. वर्ग में फैला हुआ है और वेटिकन सिटी के बाद दुनिया का दूसरा सबसे छोटा देश है।
  • मोनाको की शासनिक संरचना एक वंशानुगत संवैधानिक राजतंत्र की है, जो 17 दिसंबर, 1962 को स्थापित संविधान द्वारा शासित है।
  • कार्यकारी शक्ति राजकुमार अल्बर्ट द्वितीय के उच्च अधिकार के तहत है।

स्रोत- पीआईबी


जीव विज्ञान और पर्यावरण

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मिला ऊँट को आवास

चर्चा में क्यों?

हाल ही में बांग्लादेश सीमा पर तस्करों से बचाए गए एक ऊँट को राज्य की पुलिस और असम राज्य चिड़ियाघर के अधिकारियों के बीच छह महीने तक चली कानूनी लड़ाई के बाद पूर्वी असम के शिवसागर ज़िले में एक आवास प्रदान किया गया।

महत्त्वपूर्ण बिंदु

  • हाल ही में एक वयस्क नर ऊँट को गुवाहाटी के चिड़ियाघर से निकालकर लगभग 350 किमी. दूर पूर्वी असम के शिवसागर ज़िले में ‘पशु घर’ में एक ट्रक के माध्यम से पहुँचाया गया।
  • अरण्यम नामक इस ‘पशु घर’ का संचालक समीरन हातिमुरिया (Samiran Hatimuria) है जिसके संरक्षण में इस ऊँट को भेजा गया है।
  • समीरन हातिमुरिया ने ऊँट को यहाँ लाये जाने को स्वागत योग्य बताते हुए यहाँ मौजूद अन्य जानवरों के बारे में भी जानकारी दी जिनमें एमू (Emu), टर्की (Turkey), गिनी सूअर (Guinea Pigs), घोड़े (Horses), 12 प्रकार के मोर (Peafowls), पाँच प्रकार के कबूतर (Pigeons) और अन्य जानवर शामिल हैं।

क्या था मामला?

  • 2018 के मध्य में पश्चिमी असम के गोलपारा ज़िले की पुलिस ने इस ऊँट को बांग्लादेश में तस्करी के लिये ले जाने वाले तस्करों से बचाकर चिड़ियाघर में पहुँचा दिया था। जहाँ पहले से ही दो ऊँटों को रखा गया था।
  • पशु चिकित्सकों ने पहले दो ऊँटों को उन बीमारियों के वाहक बताया था जिनसे अन्य जानवरों की जान को खतरा हो सकता था, हालाँकि कुछ समय बाद दोनों ऊँटों की मौत हो जाने के बाद चिड़ियाघर प्रशासन ने गोलपारा में सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
  • चिड़ियाघर के प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) ने अदालत में अपना तर्क देते हुए कहा कि चिड़ियाघर घरेलू पशुओं को रखने के लिये अधिकृत नहीं है तथा ऊँट (जो स्वस्थ था) को चिड़ियाघर से बाहर पुलिस को वापस सौंपने की मांग की।
  • कुछ समय पश्चात स्थानीय अदालत ने पुलिस को ऊँट को वापस ले जाने का आदेश दिया लेकिन जानवर पालने में पुलिस की अक्षमता के चलते इसे चिड़ियाघर में छोड़ दिया।

अरण्यम (Aranyam)


वर्ष 2008 में समीरन हातिमुरिया ने अरण्यम नामक पशु घर खोला जिसमें शिवसागर ज़िले के वन्यजीव अधिकारियों द्वारा जंगली जानवरों को इलाज या पुनर्वास के लिये तथा उनकी सुरक्षा हेतु शरण दी जाती है।

स्रोत – द हिंदू


जीव विज्ञान और पर्यावरण

ग्लेशियरों के पिघलने से भारत चिंतित

चर्चा में क्यों?

हाल ही में वैज्ञानिकों द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि कार्बन उत्सर्जन को सीमित करने के लिये पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो हिंदुकुश हिमालय में दो-तिहाई ग्लेशियर वर्ष 2100 तक पिघल सकते हैं तथा पानी के बढ़ जाने से बड़ी नदियों में बाढ़ आ सकती है।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?

  • हिंदुकुश हिमालय उत्तरी एवं दक्षिण ध्रुवों के बाद तीसरा सबसे बड़ा बर्फ का क्षेत्र है और 1970 के दशक से लगातार ग्लोबल वार्मिंग से प्रभावित है।
  • वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे सीमित करने हेतु पूर्व-औद्योगिक स्तर के वैश्विक प्रयास विफल हो जाते हैं, तो इसके कारण वर्ष 2100 तक हिंदुकुश क्षेत्र का दो-तिहाई ग्लेशियर पिघल सकता है।
  • ग्लेशियर पिघलने से स्थिति काफी भयावह हो सकती है क्योंकि इस क्षेत्र में हिमनदों की लगभग 8,790 झीलें हैं जिनमें से 203 हिमनद झीलों में बाढ़ आ सकती है।
  • सामान्यतः हिंदुकुश में हर साल औसतन 76 घटनाएँ ऐसी पाई जाती हैं, जिनमें चीन में लगभग 25 तथा भारत में 18 घटनाएँ हैं।

हिमालय में वार्मिंग की घटना कैसे नदियों को अस्थिर कर सकती है?

  • हिंदुकुश क्षेत्र एशिया का जल भंडार है। इसके ग्लेशियरों से निकलने वाला जल 10 मुख्य नदियों के माध्यम से दो अरब से अधिक लोगों को जीवन प्रदान करता है। लोग जल का उपयोग कृषि,उद्योग-धंधों एवं पीने के लिए करते हैं।
  • हिमनद पिघलने की दर बढ़ने से इन नदियों का प्रवाह बदलकर अस्थिर हो सकता है।
  • हिमनद पिघलने के उच्च दर के कारण सिंधु नदी के जल-स्तर में वर्ष 2050 तक अधिक जल का प्रवाह देखा जा सकता है, उसके बाद हिमनद पिघलने की दर कम होने के कारण जल प्रवाह कम हो जाएगा।
  • गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियाँ जो मुख्य रूप से मानसून से प्रभावित हैं, में भी बदलाव देखने को मिलेगा, क्योंकि मानसून से पहले जल प्रवाह में कमी हो सकती है। इससे कृषि के लिये संकट उत्पन्न हो जाएगा क्योकि कृषि कार्य में जल का बहुत बड़ा योगदान है।

क्या बढ़ता प्रदूषण स्तर संकट में योगदान दे रहा है?

  • इंडो-गंगेटिक समतल भाग जो कि अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्र है, ने ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को बढ़ाया है। ब्लैक कार्बन और धूल के जमाव ने हिंदुकुश ग्लेशियरों के पिघलने की दर को तेज़ दिया है।

मानसून पर क्या असर हो सकता है?

  • मानसून परिसंचरण के दौरान मौसमी घटनाओं तथा गर्मियों में एशिया में वर्षा के वितरण पर हिंदुकुश श्रेणी का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
  • दक्षिण-पश्चिम मानसून से भारत में 70% वार्षिक वर्षा होती है। एक अनुमान के अनुसार, ग्लेशियर पिघलने से ग्रीष्म ऋतु की वर्षा में 4-12% से 4-25% की वृद्धि की संभावना है।
  • मानसून के पैटर्न में बदलाव से, तूफानों की आवृत्ति बढ़ने सहित यह पर्वत के लिए विभिन्न खतरों को बढ़ाकर इसके महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर सकता है।

क्या ज़बरन पर्यावरणीय पलायन का खतरा हो सकता है?

  • शोधकर्त्ताओं का कहना है कि बाढ़ जैसी चरम घटनाओं में वृद्धि के कारण लोग मज़बूरी में प्रवासन हो सकते हैं। साथ ही बड़े पैमाने पर जनसांख्यिकीय आंदोलन शुरू हो सकते हैं।
  • हिंदुकुश हिमालय के देशों में प्रवासन में वृद्धि की वार्षिक दर सामान्य से अधिक रही है और आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों की संख्या भी बढ़ने की उम्मीद है। अगले 20 वर्षों में इस क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों में पलायन दर तीव्र हो सकती है।

स्रोत – लाइव मिंट


भारत-विश्व

व्यापार युद्ध पर अंकटाड (UNCTAD) की रिपोर्ट

चर्चा में क्यों?

हाल ही में व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD) ने व्यापार युद्ध (Trade War) पर एक रिपोर्ट जारी की है।

  • UNCTAD द्वारा जारी इस नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जो दुनिया की शीर्ष दो अर्थव्यवस्थाओं- अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापारिक तनाव से लाभान्वित हो सकता।

अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध (पृष्ठभूमि)

  • अमेरिका और चीन तब से एक व्यापार युद्ध में लिप्त हैं जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल मार्च में आयातित इस्पात और एल्युमीनियम की वस्तुओं पर भारी शुल्क लगा दिया था, यह एक ऐसा कदम था जिसने वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका को जन्म दिया।
  • चीन ने भी अमेरिका के इस कदम का ‘जैसे को तैसा’ की तर्ज़ पर जवाब दिया और अरबों डॉलर के अमेरिकी आयात पर शुल्क लगा दिया।
  • संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के अनुसार, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच व्यापार संबंधी विवाद वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

व्यापार युद्ध के सकारात्मक प्रभाव

  • जिन देशों को अमेरिका-चीन के बीच व्यापारिक तनाव से सबसे अधिक लाभ होने की उम्मीद है, वे ऐसे देश हैं जो अधिक प्रतिस्पर्द्धी हैं और आर्थिक रूप से अमेरिकी और चीनी फर्मों को प्रतिस्थापित करने में सक्षम हैं।
  • अध्ययन के अनुसार, यूरोपीय संघ के निर्यात में सबसे अधिक वृद्धि होने की संभावना है। इसके बाद क्रमशः जापान, मेक्सिको, कनाडा, रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया और भारत का स्थान आता है।
  • अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापर युद्ध के कारण लाभान्वित होने वाले देशों की सूची में शामिल अन्य देश हैं-
  • ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, ताइवान, वियतनाम, सिंगापुर, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, तुर्की, फिलिपींस, चिली, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, अर्जेंटीना, पाकिस्तान, पेरू तथा ईरान।

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नकारात्मक वैश्विक प्रभावों के हावी होने की संभावना

  • हालाँकि इस अध्ययन में इस बात को रेखांकित किया गया है कि व्यापार युद्ध के कारण कुछ देशों के निर्यात में वृद्धि हुई है लेकिन इस व्यपार युद्ध के सभी परिणाम सकारात्मक नहीं होंगे।
  • एक सामान्य चिंता यह है कि इस व्यापार युद्ध का व्यापक प्रभाव कमज़ोर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर होगा।
  • एक आर्थिक मंदी अक्सर अपने साथ वस्तुओं की कीमतों, वित्तीय बाज़ारों और मुद्राओं तथा वे सभी चीज़ें जो एक विकासशील देश की अर्थव्यवस्था के लिये महत्त्वपूर्ण होती हैं, से संबंधित परेशानियाँ लेकर आती है।
  • इसका एक प्रमुख जोखिम यह है कि व्यापारिक तनाव करेंसी वॉर के रूप में तब्दील हो सकता है।
  • एक और चिंता यह है कि अन्य देश भी इस प्रकार के व्यापार युद्ध में शामिल हो सकते हैं तथा संरक्षणवादी नीतियाँ वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ सकती हैं। ये संरक्षणवादी नीतियाँ आम तौर पर कमज़ोर देशों को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाती हैं।

व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD)

  • 1964 में स्थापित, व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (United Nations Conference on Trade and Development- UNCTAD) विकासशील देशों के विकास के अनुकूल उनके एकीकरण को विश्व अर्थव्यवस्था में बढ़ावा देता है।
  • यह एक स्थायी अंतर सरकारी निकाय है।
  • इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में है।
  • इसके द्वारा प्रकाशित कुछ रिपोर्ट हैं:

♦ व्यापार और विकास रिपोर्ट (Trade and Development Report)
♦ विश्व निवेश रिपोर्ट (World Investment Report)
♦ न्यूनतम विकसित देश रिपोर्ट (The Least Developed Countries Report)
♦ सूचना एवं अर्थव्यवस्था रिपोर्ट (Information and Economy Report)
♦ प्रौद्योगिकी एवं नवाचार रिपोर्ट (Technology and Innovation Report)
♦ वस्तु तथा विकास रिपोर्ट (Commodities and Development Report)

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चीन-अमेरिका ट्रेड वार पर विराम

व्यापार युद्ध के प्रारंभ का संकेत

यूएस-चीन व्यापार युद्ध भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्द्धी बना सकता है : सीआईआई रिपोर्ट

स्रोत : UNCTAD वेबसाइट


विविध

Rapid Fire करेंट अफेयर्स (6 February)

  • भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने फ्रेंच गुयाना के स्पेसपोर्ट से उपग्रहों का प्रक्षेपण करने वाली यूरोपीय कंपनी एरियनस्पेस के एक प्रक्षेपण यान के ज़रिये अपना नवीनतम संचार उपग्रह जीसैट-31 का सफल प्रक्षेपण किया। जीसैट-31 का वज़न 2535 किग्रा. है और यह भारत की मुख्य भूमि और द्वीप-समूहों को सेवाएँ प्रदान करेगा। जीसैट -31 देश का 40वाँ संचार उपग्रह है, जो लगभग 15 वर्ष तक सक्रिय रहेगा। यह टीवी अपलिंकिंग, डिजिटल सैटेलाइट न्यूज एकत्रीकरण, डीटीएच टीवी आदि सेवाएँ देगा। यह उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा में Ku बैंड ट्रांसपोंडर की क्षमता को मज़बूत करेगा।
  • नई दिल्ली में 5 फरवरी को आयोजित एशिया एलपीजी समिट 2019 में बताया गया कि केंद्र सरकार की प्रत्येक परिवार को स्वच्छ रसोई गैस ईंधन उपलब्ध कराने की पहल से 2.25 करोड़ टन खपत के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LPG उपभोक्ता बन गया है। देश में LPG की मांग 2025 तक 34 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है। 2014-15 में देश में LPG उपभोक्ताओं की संख्या 14.8 करोड़ थी, जो 2017-18 में बढ़कर 22.4 करोड़ हो गई। ग्रामीण क्षेत्रों में LPG की पहुँच बढ़ने से इसके उपभोग में औसतन 8.4 प्रतिशत वृद्धि हुई है।
  • आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने देशभर में शहरी समृद्धि उत्सव की शुरुआत की है। इसका लक्ष्य दीनदयाल अंत्योदय मिशन-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के लाभ सबसे कमज़ोर वर्गों तक पहुँचाना है। ‘शहरी समृद्धि उत्सव’ के माध्यम से शहरों के स्व-सहायता समूहों के सदस्यों को राष्ट्रीय स्तर की सरकारी योजनाओं अर्थात् स्वच्छ भारत मिशन (शहरी), प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी), प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना. प्रधानमंत्री जनधन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना तथा राष्ट्रीय पोषण मिशन से जोड़ा जा रहा है।
  • भारत को जानो कार्यक्रम का 53वाँ संस्करण हाल ही में आयोजित किया गया, जिसके तहत 8 देशों के भारतीय मूल के युवाओं का एक समूह भारत आया है। युवा प्रवासी भारतीयों के लिये ‘भारत को जानो कार्यक्रम’ के 53वें संस्करण में 40 युवा (24 युवतियाँ और 16 युवक) फिजी, गुयाना, मॉरीशस, पुर्तगाल, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, सूरीनाम तथा त्रिनिदाद और टोबैगो से आए हैं। इस संस्करण के सहयोगी राज्य महाराष्ट्र तथा दमन और दीव हैं। ‘भारत को जानो’ कार्यक्रम विदेश मंत्रालय आयोजित करता है और इसका उद्देश्य 18-30 वर्ष की आयु समूह के प्रवासी युवा भारतीयों को देश के विकास और उपलब्धियों से अवगत कराना है।
  • पश्चिम बंगाल में चल रही हलचलों के बीच केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार से कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के खिलाफ अनुशासनहीनता और सेवा नियमों का उल्लंघन करने के लिये अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने को कहा है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव से इसकी प्रक्रिया शुरू करने को कहा है। गौरतलब है कि गृह मंत्रालय के पास देश में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों का कैडर नियंत्रण प्राधिकार है। गृह मंत्रालय के अनुसार, राजीव कुमार का पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ धरने पर बैठना अखिल भारतीय सेवा नियमावली, 1968 और अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1969 के प्रावधानों का उल्लंघन है।
  • राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2017 प्रदान किये। संगीत नाटक अकादमी भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की स्वायत्त संस्था है। राष्ट्रीय संगीत, नृत्य और नाट्य अकादमी ने पिछले वर्ष जून में इम्फाल (मणिपुर) में अपनी बैठक में संगीत, नृत्य, थिएटर आदि विभिन्न विधाओं में 42 कलाकारों का चयन संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2017 के लिये किया था। ये पुरस्कार 1952 से दिये जा रहे हैं, जो न केवल उत्कृष्टता और उपलब्धि के उच्च मानकों के संकेतक हैं, बल्कि व्यक्तिगत कार्य/योगदान को मान्यता भी देते हैं। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार में ताम्रपत्र तथा अंगवस्त्रम के अतिरिक्त एक लाख रुपए प्रदान किये जाते हैं।
  • मध्य प्रदेश के सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व में पहली बार लगभग 2300 किमी. क्षेत्र का सर्वे किया गया। नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंस की निगरानी में एक दिन में हुआ यह देश का सबसे बड़ा सर्वे है। इसमें बर्ड वाच एप की सहायता से 10 राज्यों के लगभग 100 पक्षी प्रेमियों ने 300 देशी और विदेशी पक्षियों की प्रजातियों को देखा। इस सर्वे में 38 दलों ने 40 रूटों पर बर्ड सर्वे का काम किया।
  • पुद्दुचेरी के निकट अरिकामेदु में हाल ही में हुई खुदाई में पतली गर्दन वाली दुहत्थी सुराही (Amphora) मिली है। यह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) द्वारा संरक्षित स्थल है। यहाँ लगभग 250 वर्ष पुराने फ्रेंच मिशन के खंडहर हैं। सर मोर्टिमर व्हीलर ने 1945 में और ज्यां-मैरी कैसल ने 1947-1950 में यहाँ पुरातात्विक खुदाई की थी। आपको बता दें कि वर्तमान स्वरूप में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की स्थापना 1861 में ब्रिटिश शासन के अधीन सर अलेक्ज़ैंडर कन्निघम द्वारा तत्कालीन वायसरॉय चार्ल्स जॉन कैनिंग की सहायता से की गई थी।
  • इंसानों जैसी समझ रखने वाली रोबोट सोफिया को बनाने वाले डॉ. डेविड हान्सन ने अपने The Age of Living Intelligent System & Android Society नामक नए शोध कहा है कि वर्ष 2045 तक एंड्रॉयड आधारित रोबोट मनुष्य से विवाह करने के लायक हो जाएंगे। उनके अनुसार ऐसे रोबोट विवाह के अलावा ज़मीन की खरीद-बिक्री के साथ वोट डालने के लायक भी हो जाएंगे। इससे पहले एंड्रॉयड आधारित रोबोट वर्ष 2035 तक वह सबकुछ करने में सक्षम होंगे जो इंसान अभी कर रहे हैं और वर्ष 2038 तक रोबोट मनुष्यों की तरह सामाजिक अधिकारों की मांग भी करेंगे और उसके लिये आंदोलन भी चलाएंगे।
  • ब्रिटेन की लिवरपूल यूनिवर्सिटी के शोधकर्त्ताओं ने अपने एक विस्तृत अध्ययन के बाद बताया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कुछ जीवों की विभिन्न प्रजातियों की आबादी घट रही है। इसमें प्रजातियों पर विस्तृत अध्ययन करके बदलते तापमान का उनके ऊपर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन किया गया। प्राप्त डेटा से हर जीव की तापमान की नियत निर्धारण सीमा निकाली गई जिसे क्रिटिकल थर्मल लिमिट कहते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि बहुत सारे जीव अपनी प्रजनन क्षमता तब खो देते हैं जब तापमान उनके क्रिटिकल थर्मल लिमिट से कम होता है। कुछ जीव समूहों को जलवायु परिवर्तन से होने वाली प्रजनन हानि के लिये सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जाता है। इसमें ठंडे रक्त की प्रजातियां और जलीय जीव शामिल हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय संगठन हिंदुकुश हिमालय असेसमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी नहीं आई तो वर्ष 2100 तक हिमालय के ग्लेशियरों का दो-तिहाई हिस्सा पिघल सकता है। इससे चीन से लेकर भारत तक की नदियों का जल प्रवाह प्रभावित होगा। 210 वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों को गंगा, सिंधु, येलो, मेकांग, इरावदी सहित विश्व की 10 महत्त्वपूर्ण नदियों का जलस्रोत माना गया है। लगभग 3500 किमी. में फैले हिमालयी क्षेत्र में भारत, अफगानिस्तान, म्यांमार, चीन, भूटान, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश आते हैं।

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