सत्य कोई रंग नहीं जानता है | 19 Jan 2026
वर्ष 1893 में, एक युवा मोहनदास करमचंद गांधी को दक्षिण अफ्रीका के पीटर मैरिट्सबर्ग रेलवे स्टेशन पर उनकी त्वचा के रंग के कारण ट्रेन के डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया था। अपमान का वह क्षण केवल एक व्यक्तिगत अपमान नहीं था; बल्कि वह एक साक्षात्कार था—सत्य की वह चमक कि मानवीय गरिमा नस्ल और पूर्वाग्रहों से परे होती है। उस घटना ने गांधीजी को एक ऐसी नैतिक शक्ति के रूप में जगाया, जो आगे चलकर 'सत्याग्रह' के माध्यम से उपनिवेशवाद की नींव हिला देने वाली थी। उनका अनुभव मानवता को याद दिलाता है कि जहाँ पूर्वाग्रह विभाजन की रेखाएँ खींचते हैं, वहीं सत्य स्वयं किसी रंग को नहीं जानता। 'सत्य कोई रंग नहीं जानता है' यह वाक्यांश नैतिक और सार्वभौमिक दोनों है। यह इस तर्क पर ज़ोर देता है कि सत्य, न्याय और नैतिकता; नस्ल, जाति तथा पंथ की सीमाओं में बंधे नहीं हैं। यह सभी का समान रूप से अधिकार है और सभी मानवीय भेदों से ऊपर है। इसके सार को समझने के लिये, उन दार्शनिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और समकालीन आयामों को खोजना आवश्यक है, जो इसके अर्थ तथा प्रासंगिकता को आकार देते हैं।
दार्शनिकों ने लंबे समय से माना है कि सत्य सार्वभौमिक और निष्पक्ष है। इमैनुएल कांट की कर्त्तव्यनिष्ठ नैतिकता यह मानती है कि नैतिक कर्त्तव्यों का मार्गदर्शन सार्वभौमिक सिद्धांतों द्वारा होना चाहिये, न कि व्यक्तिगत स्वार्थ या बाहरी भेदभाव द्वारा। कांट के अनुसार, सत्य और नैतिक कानून सभी तार्किक प्राणियों पर समान रूप से लागू होते हैं, इसलिये 'सत्य कोई रंग नहीं जानता है'। भारतीय दार्शनिक परंपरा में, उपनिषद् में कहा गया है ‘सत्यमेव जयते’– केवल सत्य की ही विजय होती है। वेदों में ‘ऋत’ की अवधारणा उस ब्रह्मांडीय व्यवस्था को दर्शाती है, जो सत्य द्वारा संचालित होती है और सामाजिक या भौतिक भेदभाव से अप्रभावित रहती है। भगवान बुद्ध का मध्यम मार्ग और महावीर का अनेकांतवाद (बहुपक्षीय सत्य) दोनों यह पुष्टि करते हैं कि सत्य मानव पूर्वाग्रहों तथा सापेक्ष पहचानों से परे है। आगे चलकर, महात्मा गांधी ने 'सत्याग्रह' रूपी आत्मिक बल के ज़रिये इस शाश्वत सत्य को अपने राजनीतिक संघर्षों का आधार बनाया। उनके लिये, सत्य ही ईश्वर था और सभी मानव उस दिव्य सार के समान रूप से साधक थे। इसलिये जाति, रंग या वर्ग के आधार पर भेदभाव केवल सामाजिक अन्याय नहीं, बल्कि नैतिक असत्य था।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि सत्य हमेशा पूर्वाग्रह पर विजय पाता है। सदियों से मानवता ने देखा है कि रंग, जाति या धर्म का उपयोग उत्पीड़न को सही ठहराने के लिये किया गया, फिर भी सत्य ने हमेशा स्वयं को प्रकट करने का मार्ग ढूँढा। 19वीं सदी में, अब्राहम लिंकन की मुक्ति उद्घोषणा अमेरिका में दासप्रथा को समाप्त कर गई, यह पुष्टि करते हुए कि नैतिक सत्य किसी रंग को नहीं जानता। सदियों तक चले जातिगत शोषण का अंत उस सरल नैतिक विश्वास के प्रभाव में हुआ कि सभी मनुष्य समान रूप से उत्पन्न होते हैं। भारत में, गांधी का औपनिवेशिक अन्याय के खिलाफ अहिंसात्मक संघर्ष यह दिखाता है कि सत्य की नैतिक शक्ति साम्राज्यों की शक्ति से भी अधिक होती है। उनका आंदोलन दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला और अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनियर के लिये प्रेरणा स्रोत बना, जिन्होंने साबित किया कि मानव समानता रंगहीन है तथा सत्य सार्वभौमिक है। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का पतन, वैश्विक स्तर पर नागरिक अधिकारों की मान्यता और पूरे विश्व में लोकतांत्रिक संस्थाओं का उदय यह सब दर्शाता है कि पूर्वाग्रह पर आधारित व्यवस्थाएँ अंततः विक्षिप्त हो जाती हैं, जबकि सत्य स्थायी रहता है।
विज्ञान अपने स्वभाव से ही सत्य की सार्वभौमिकता की पुष्टि करता है। गुरुत्वाकर्षण का नियम सभी पर समान रूप से लागू होता है; यह भौगोलिक स्थिति, जाति या धर्म के अनुसार नहीं बदलता। थर्मोडायनामिक्स के सिद्धांत, प्रकाश की गति या मानवता का आनुवंशिक कोड किसी के साथ भेदभाव नहीं करते। ये रंगहीन सत्य हैं, जो सभी जीवन को जोड़ते हैं। कोविड-19 महामारी ने इस सार्वभौमिकता को और स्पष्ट किया। वायरस ने कोई सीमा या रंग नहीं पहचाना तथा अमीर और गरीब दोनों प्रकार के देशों को प्रभावित किया। वैश्विक वैज्ञानिक प्रतिक्रिया टीकों से लेकर अनुसंधान सहयोग तक यह दर्शाती है कि विज्ञान में सत्य पहचान से परे होता है। यह तथ्यों, अवलोकन और तर्क पर आधारित है तथा सामाजिक पूर्वाग्रह से अप्रभावित रहता है। इस प्रकार, विज्ञान यह जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है कि जब सत्य को वस्तुनिष्ठ रूप से खोजा जाता है, तो यह निष्पक्ष और रंगहीन रहता है तथा पूरी मानवता के लिये सुलभ होता है।
सामाजिक जीवन में, ‘सत्य कोई रंग नहीं जानता है’ का विचार समानता और न्याय में परिलक्षित होता है। भारत का लोकतांत्रिक ढाँचा इस सिद्धांत का प्रतीक है। संविधान अनुच्छेद 14 और 15 के माध्यम से, विधि के समक्ष समानता की गारंटी देता है तथा धर्म, जाति, लैंगिक, जन्म स्थान या वर्ग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। लेडी जस्टिस की आँखों पर पट्टी इस बात का प्रतीक है कि कानून को निष्पक्ष होना चाहिये और इसका मार्गदर्शन केवल सत्य तथा प्रमाण से होना चाहिये, न कि बाहरी रूप-रंग या सत्ता से। शिक्षा का अधिकार (RTE), मध्याह्न भोजन योजना और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी सामाजिक पहलें सामाजिक न्याय की रंगहीन सच्चाई को प्रस्तुत करती हैं। ये कार्यक्रम संरचनात्मक असमानताओं को समाप्त करने और यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हैं कि अवसर केवल वर्ग या जाति तक सीमित न रहें। इसी प्रकार, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिये सकारात्मक कार्रवाई सामाजिक ढाँचों को समानता के सार्वभौमिक सत्य के अनुरूप बनाने का प्रयास दर्शाती है। जब समाज यह समझता है कि सत्य और न्याय सतही विभाजनों से परे हैं, तो यह वास्तविक समावेशिता तथा सामंजस्य की दिशा में अग्रसर होता है।
आज के अंतर्संबंधित किंतु विभाजित विश्व में, यह विचार कि 'सत्य कोई रंग नहीं जानता है', अत्यंत महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक है। जलवायु परिवर्तन, महामारियाँ और युद्ध जैसी वैश्विक चुनौतियाँ राष्ट्रीय तथा जातीय सीमाओं से परे हैं। पिघलते ग्लेशियर, बढ़ता समुद्र स्तर और मरुस्थलीकरण मानवता को सामूहिक रूप से प्रभावित करते हैं, यह याद दिलाते हुए कि पारिस्थितिक सत्य रंगहीन है। प्रकृति किसी के साथ भेदभाव नहीं करती तथा इसके परिणाम सार्वभौमिक रूप से साझा होते हैं। यूक्रेन तथा गाज़ा की स्थितियाँ इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि भ्रामक प्रचार कृत्रिम विमर्श तो उत्पन्न कर सकता है, किंतु मानवीय संवेदना और पीड़ा राष्ट्रीयता या धर्म की सीमाओं से परे सार्वभौमिक होती है। डिजिटल मीडिया द्वारा नियंत्रित विश्व में, फेक न्यूज, डीपफेक और गलत सूचना के माध्यम से सत्य का विकृत होना एक नए प्रकार के रंगभेद को जन्म देता है, जो जाति पर आधारित नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक तथा संवेदनात्मक दृष्टिकोण से निर्मित है। इस प्रकार, आज की चुनौती केवल सत्य की जानकारी प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इसे विकृत होने से रोककर उसकी शुद्धता बनाए रखना भी है।
जबकि सत्य अपने सार में सार्वभौमिक है, इसकी धारणा प्राय: पूर्वाग्रह, शक्ति और वैचारिक झुकाव से प्रभावित होती है। फ्रेडरिक नीत्शे का यह कथन – “तथ्य नाम की कोई चीज़ नहीं होती, केवल व्याख्याएँ होती हैं” आज भी प्रासंगिक है। औपनिवेशिक शासन ने ‘सभ्य बनाने के मिशन’ के बहाने शोषण को सही ठहराया। तानाशाही सरकार ने प्रचार का उपयोग करके झूठ को सत्य के रूप में प्रस्तुत किया। डिजिटल युग में सत्य को इसी प्रकार की विकृतियों का सामना करना पड़ता है। सोशल मीडिया एल्गोरिद्म इको-चेंबर को बढ़ाता है, जिससे पूर्वाग्रह और गहरे हो जाते हैं। डीपफेक वास्तविकता और कल्पना के बीच की सीमा को धुंधला कर देता है, जबकि गलत सूचना सामूहिक चेतना को प्रभावित करती है। हमारे समय की नैतिक और बौद्धिक चुनौती यह है कि इन विकृतियों से सत्य को पुनः प्राप्त किया जाए। सामाजिक रूप से, गहरे जड़े हुए पूर्वाग्रह विभाजन को बनाए रखते हैं। संवैधानिक सुरक्षा उपायों के बावजूद जातिवाद, रंगभेद और लैंगिक असमानता अब भी प्रचलित हैं। ये पूर्वाग्रह व्यक्तियों को सत्य को सार्वभौमिक और रंगहीन रूप में देखने से रोकते हैं। अतः यह चुनौती केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि नैतिक है, जिसके लिये सहानुभूति, साहस और शिक्षा की आवश्यकता है।
सत्य को निष्पक्ष तथा सार्वभौमिक बनाए रखने के लिये समाज को कई मोर्चों पर कार्रवाई करनी होगी, जैसे- शिक्षा, शासन, कानून और वैश्विक सहयोग। शिक्षा को नैतिक तर्क, सहानुभूति एवं आलोचनात्मक सोच को विकसित करना चाहिये। गांधी, लिंकन और मंडेला जैसे आदर्श व्यक्तियों पर आधारित मूल्य-आधारित शिक्षा विद्यार्थियों को पहचान से परे मानवता को देखने के लिये प्रेरित कर सकती है। अनुच्छेद 51A में निहित वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना व्यक्तियों को पूर्वाग्रह की बजाय तर्क पर विश्वास करने में सहायता करता है। सरकार को भेदभाव विरोधी कानूनों को सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के साथ लागू करना चाहिये। लोक सेवकों को नैतिक शासन का प्रतीक बनना चाहिये और उनके निर्णय केवल साक्ष्यों, निष्पक्षता एवं न्याय के आधार पर होने चाहियें, न कि पक्षपात या दबाव के प्रभाव में। सार्वजनिक संस्थानों का संचालन पारदर्शिता एवं जवाबदेही के सिद्धांतों के तहत होना चाहिये, ताकि विधि के समक्ष समानता की भावना और उसका व्यावहारिक पालन दोनों सुनिश्चित हो सकें। मीडिया धारणा को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे सनसनीखेज खबरों की बजाय सत्य को प्राथमिकता देनी चाहिये और आलोचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिये। डिजिटल प्लेटफॉर्म को गलत सूचना से निपटने के लिये तथ्य-जाँच और नैतिक सामग्री नियमों में निवेश करना चाहिये। सत्य को प्रभाव के उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक साधन के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिये। सांस्कृतिक संवेदनशीलता कार्यक्रम, समुदायों के बीच संवाद और जागरूकता अभियान सहानुभूति बढ़ा सकते हैं तथा रूढ़ियों को तोड़ सकते हैं। साहित्य, फिल्में और कला पूर्वाग्रह को चुनौती देने तथा साझा मानव मूल्यों का उत्सव मनाने में सहायता करती हैं। नागरिक समाज संगठन मार्गदर्शन, नेतृत्व कार्यक्रम और हाशिये के समूहों को सशक्त करके समावेशिता को बढ़ावा दे सकते हैं। वैश्विक स्तर पर, देशों को जलवायु न्याय, मानवाधिकार और सतत विकास जैसे मुद्दों पर सहयोग करना चाहिये। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों का पालन करना चाहिये, ताकि सत्ता की राजनीति सत्य को प्रभावित न कर सके। यह सहयोग टीकाकरण समानता और मानवतावादी सहायता के क्षेत्र में, सत्य के निष्पक्ष एवं नैतिक सार को प्रतिबिंबित करता है।
सत्य अस्थायी रूप से छिपाया जा सकता है, विकृत किया जा सकता है या देर से प्रकट हो सकता है, लेकिन इसे कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। इतिहास इस बात का प्रमाण है कि साम्राज्य गिर जाते हैं, झूठ का पतन होता है और पूर्वाग्रह फीके पड़ जाते हैं, फिर भी सत्य स्थायी रहता है। जैसा कि मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने कहा है, “नैतिक ब्रह्मांड का वक्र लंबा है, लेकिन यह न्याय की ओर झुकता है।” जब गांधी जी को वर्ष 1893 में उस ट्रेन से बाहर निकाला गया, तब विश्व ने केवल एक रंग के आदमी को अपमानित होते देखा। लेकिन उसी व्यक्ति ने इस अपमान को नैतिक जागृति में बदला और सत्य को उस शक्ति में परिवर्तित किया, जिसने एक साम्राज्य को ध्वस्त कर दिया। उनका यह सफर एक कालातीत स्मरण है कि पूर्वाग्रह अस्थायी रूप से सत्य को ढक सकता है, लेकिन सत्य स्वयं शाश्वत, रंगहीन, निष्पक्ष और मुक्तिदायक है। अंततः सत्य रंग और भेद से परे है, क्योंकि यह उस मानवीय चेतना का प्रतिबिंब है, जो साझा है, अखंड है तथा असीम है। इसका पालन करना हमारे साझा भाग्य की पुष्टि करना है, जहाँ न्याय, समानता और गरिमा कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सभी का जन्मसिद्ध अधिकार हैं।