प्रश्न: “भारतीय शहरीकरण नियोजित विकास की तुलना में अधिक अनौपचारिकता से परिभाषित होता है।” शासन और सामाजिक समानता पर इसके प्रभावों का विश्लेषण कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत भारत में शहरीकरण और नियोजित विकास की बजाय अनौपचारिकता के बढ़ते स्वरूप के संक्षिप्त परिचय से कीजिये।
- इसके बाद अनौपचारिकता को बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों पर विस्तार से चर्चा कीजिये
- फिर इसके शासन और सामाजिक समानता पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित कीजिये
- अंत में समावेशी शहरीकरण की दिशा में कुछ उपायों का सुझाव दीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
भारत में शहरीकरण तेज़ी से बढ़ा है, लेकिन यह मुख्यतः औपचारिक नियोजन ढाँचों के बाहर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप अनौपचारिक बस्तियों का विस्तार हुआ है।
- इसके साथ ही भारतीय शहरों में अनौपचारिकता केवल आवास (झुग्गी-झोंपड़ियाँ) तक सीमित नहीं है, बल्कि आजीविका तक फैली हुई है। लगभग 80–90% कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में संलग्न है।

मुख्य भाग:
शासन पर प्रभाव
- अनौपचारिकता की व्यापक उपस्थिति एक ‘शासन अंतराल’ उत्पन्न करती है, जहाँ पारंपरिक प्रशासनिक उपकरण अप्रभावी हो जाते हैं।
- सेवा प्रदाय की चुनौतियाँ: नगरपालिकाएँ ‘अवैध’ बस्तियों में पानी, स्वच्छता और बिजली जैसी मूलभूत सेवाएँ उपलब्ध कराने में संघर्ष करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप निजी ‘वाटर माफिया’ या अवैध कनेक्शनों पर निर्भरता बढ़ जाती है।
- राजस्व हानि: अनौपचारिक बस्तियाँ प्राय: संपत्ति कर के दायरे से बाहर रहती हैं, जिससे शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) की वित्तीय क्षमता सीमित हो जाती है।
- अस्थायी योजना: शासन अधिकतर प्रतिक्रियात्मक हो जाता है (जैसे चुनावों से पहले कॉलोनियों का नियमितीकरण), न कि पूर्व-नियोजित, जिससे शहरी फैलाव और पर्यावरणीय क्षरण बढ़ता है।
- शासन में डिजिटल विभाजन: स्मार्ट सिटी पहलें प्राय: नियोजित क्षेत्रों पर केंद्रित रहती हैं, जबकि अनौपचारिक क्षेत्र ‘डेटा ब्लाइंड स्पॉट’ में रह जाते हैं।
सामाजिक समानता पर प्रभाव
अनौपचारिकता एक ओर जीविका का साधन है तो दूसरी ओर यह बहिष्करण का स्रोत भी बन जाती है।
- स्थानिक विभाजन: शहर ‘समृद्धि के द्वीपों’ और ‘अनौपचारिकता के सागरों’ में विभाजित हो जाते हैं, जिससे एक स्पष्ट वर्ग विभाजन उत्पन्न होता है तथा सामाजिक एकजुटता कमज़ोर पड़ती है।
- स्वास्थ्य और संवेदनशीलता: औपचारिक स्वामित्व के अभाव में निवासी जबरन बेदखली के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं और पर्यावरणीय न्याय से वंचित रहते हैं (जैसे प्रदूषण और हीट आइलैंड प्रभाव का अधिक जोखिम)।
- ‘गरीबी जाल’: औपचारिक पते के अभाव में लोगों को ऋण, मतदाता पहचान पत्र और सरकारी सब्सिडी प्राप्त करने में कठिनाई होती है, जिससे हाशिये पर जाने का चक्र लगातार बना रहता है।
- लैंगिक प्रभाव: अनौपचारिक बस्तियों में महिलाएँ पानी लाने और खराब स्वच्छता प्रबंधन का असमान बोझ उठाती हैं, जिससे उनकी औपचारिक श्रम बाज़ार में भागीदारी सीमित हो जाती है।
अनौपचारिकता और नियोजित विकास के बीच के अंतर को कम करने के लिये भारत को समावेशी शहरीकरण की दिशा में आगे बढ़ना होगा। इसके अंतर्गत निम्नलिखित उपाय शामिल हैं:
- स्थल पर ही झुग्गी पुनर्विकास: प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (PMAY-U) जैसी योजनाओं का उपयोग कर समुदायों को उनके आजीविका स्थलों से विस्थापित किये बिना आवास उपलब्ध कराना।
- सहभागी नियोजन: ‘अनौपचारिक’ क्षेत्रों को शहर की मास्टर प्लानिंग में शामिल करना, न कि उन्हें एक अपवाद के रूप में देखना।
- अनौपचारिक का औपचारिकीकरण: अनौपचारिक श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और मान्यता प्रदान करना (जैसे ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से)।
- डेटा-आधारित शहरी शासन: GIS मैपिंग, डिजिटल भूमि रिकॉर्ड और शहरी डेटा प्लेटफॉर्म का उपयोग कर अनौपचारिक बस्तियों की पहचान करना तथा उसके अनुरूप अवसंरचना योजना बनाना।
निष्कर्ष:
शहरी शासन को अनौपचारिकता को भारत के विकास की एक संरचनात्मक सच्चाई के रूप में मान्यता देनी चाहिये। ध्यान इस बात पर होना चाहिये कि इसे बहिष्करण की स्थिति से निकालकर समावेशी और सुरक्षित आजीविका की अवस्था में परिवर्तित किया जाए, जिसके लिये अनुकूलनशील एवं समानता-आधारित नीतियाँ अपनाई जाएँ, जो अनौपचारिक क्षेत्र को शहरी मुख्यधारा में समाहित करें।