• प्रश्न :

    प्रश्न: “पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में, संयुक्त अरब अमीरात भारत का एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार बनकर उभरा है।” भारत के क्षेत्रीय हितों को आगे बढ़ाने में इस साझेदारी की भूमिका का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)

    31 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर का परिचय भारत–UAE संबंधों का संक्षिप्त वर्णन करते हुए दीजिये।
    • भारत–UAE साझेदारी की भूमिका को भारत के क्षेत्रीय हितों को आगे बढ़ाने के संदर्भ में स्पष्ट कीजिये।
    • रणनीतिक क्षमता को सीमित करने वाले प्रमुख अवरोध बताएँ।
    • लेन-देन आधारित संबंधों से रूपांतरण की दिशा में आगे बढ़ने के उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत–UAE संबंध अपने पारंपरिक ‘तेल और प्रवासी’ आधारित लेन-देन चरण से आगे बढ़ चुके हैं। पश्चिम एशिया की अमेरिकी-उत्तर भू-राजनीति के संदर्भ में ये संबंध एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के ‘स्वर्णिम युग’ में प्रवेश कर चुके हैं।

    • UAE व्यापक ग्लोबल साउथ में भारत के भू-राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा हितों के लिये एक स्थिरता प्रदान करने वाले स्तंभ तथा महत्त्वपूर्ण आधार के रूप में उभरा है।

    मुख्य भाग: 

    भारत–UAE साझेदारी की भूमिका: भारत के क्षेत्रीय हितों को आगे बढ़ाने में

    • भूराजनीतिक संतुलन और डी-हाइफनेशन
      • पाकिस्तान से अलगाव: UAE  ने सफलतापूर्वक भारत के साथ अपने संबंधों को पाकिस्तान से अलग किया है।
        • यह वर्ष 2019 में स्पष्ट रूप से देखा गया जब पाकिस्तान के बहिष्कार के बावजूद भारत को OIC में मुख्य अतिथि (Guest of Honour) के रूप में आमंत्रित किया गया।
      • कूटनीतिक अनुकूलन का मंच: UAE संवेदनशील क्षेत्रीय वार्ताओं के लिये एक विश्वसनीय और तटस्थ मंच के रूप में कार्य करता है, जिससे भारत ध्रुवीकृत मध्य-पूर्व में बिना किसी गुटीय राजनीति में फॅंसे अपनी कूटनीति संचालित कर सकता है।
    • आर्थिक और आपूर्ति शृंखला एकीकरण को गहरा करना
      • वैश्विक अस्थिरता से सुरक्षा: खरीदार-विक्रेता मॉडल से आगे बढ़ते हुए, वर्ष 2022 का व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) दोनों अर्थव्यवस्थाओं को गहराई से जोड़ने का प्रयास करता है।
        • वित्त वर्ष 2024-25 में 100 बिलियन डॉलर के स्तर को पार करने के बाद, दोनों देशों ने वर्ष 2032 तक 200 बिलियन डॉलर के व्यापार का लक्ष्य निर्धारित किया है।
      • रणनीतिक बाधाओं को पार करना: UAE के संप्रभु कोष भारत में ग्रीनफील्ड परिसंपत्तियों (जैसे—धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र) के निर्माण की ओर बढ़ रहे हैं।
        • जेबेल अली में ‘भारत मार्ट’ और IMEC कॉरिडोर जैसी पहलें संपूर्ण लॉजिस्टिक्स शृंखला को नियंत्रित करने की दिशा में हैं, जो यूरोप एवं अफ्रीका के लिये एक वैकल्पिक प्रवेश द्वार प्रदान करती हैं तथा पारंपरिक पश्चिमी निर्भरताओं को कम करती हैं।
    • समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता 
      • हिंद महासागर क्षेत्र में प्रमुख सुरक्षा साझेदार: UAE अब भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के लिये अपना प्रमुख साझेदार मानता है।
        • जनवरी 2026 में रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिये आशय पत्र (LoI) ने सहयोग को अंतर-संचालनीयता और रक्षा औद्योगिक साझेदारी की ओर अग्रसर किया है।
      • युद्धक तैयारी: ‘डेजर्ट साइक्लोन’ जैसे संयुक्त अभ्यास प्रतीकात्मक अभ्यासों से आगे बढ़कर बहु-आयामी जटिल अभियानों में बदल चुके हैं, जो सीमा-पार आतंकवाद जैसे साझा खतरों के विरुद्ध वास्तविक युद्धक तैयारी को दर्शाते हैं।
    • ऊर्जा सुरक्षा: कच्चे तेल से स्वच्छ ऊर्जा तक (‘SHANTI’)
      • ऊर्जा संक्रमण को जोड़ना: अल्पकालिक जीवाश्म ईंधन आवश्यकताओं (जैसे—वर्ष 2026 का HPCL-ADNOC 10-वर्षीय LNG समझौता) को सुनिश्चित करते हुए, UAE भारत के हरित ऊर्जा संक्रमण का प्रमुख वित्तपोषक बन रहा है।
      • परमाणु और हाइड्रोजन सहयोग: SHANTI (सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी) ढाँचे के तहत, दोनों देश स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) और हरित हाइड्रोजन मूल्य शृंखला के सह-विकास में सहयोग कर रहे हैं, जिसमें भारत की विनिर्माण क्षमता तथा UAE की पूंजी का संयोजन हो रहा है।
    • तकनीकी स्वतंत्रता और ‘नॉलेज कॉरिडोर’
      • डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty): भारत के RuPay और UAE के JAYWAN प्लेटफॉर्म के एकीकरण से 3.5 मिलियन प्रवासियों के लिये विप्रेषण में क्रांतिकारी बदलाव आया है, साथ ही यह पश्चिमी वित्तीय प्रभुत्व को चुनौती देता है।
        • इसके अलावा, वर्ष 2026 में C-DAC और G42 के बीच सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर निर्माण का सहयोग AI तथा तकनीकी परस्पर निर्भरता में महत्त्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।
      • अंतरिक्ष और कौशल सह-विकास: ‘लॉन्च क्लाइंट’ की भूमिका से आगे बढ़ते हुए सह-विकासक के रूप में, जनवरी 2026 का IN-SPACe आशय पत्र वाणिज्यिक प्रक्षेपण अवसंरचना के विकास पर केंद्रित है।
        • साथ ही, IIT दिल्ली-अबू धाबी जैसे संस्थान भारतीय प्रवासियों को केवल श्रम शक्ति से आगे बढ़ाकर उच्च स्तरीय ‘ज्ञान साझेदारी’ में परिवर्तित कर रहे हैं।

    रणनीतिक क्षमता को सीमित करने वाले प्रमुख अवरोध 

    • IMEC की भू-राजनीतिक संवेदनशीलता: इज़राइल-गाज़ा संघर्ष के कारण भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEC) ठप पड़ गया है, जिससे भारत का ‘यूरोप के प्रवेश द्वार’ का दृष्टिकोण पश्चिम एशिया की अस्थिरता के अधीन हो गया है और महॅंगे समुद्री मार्गों पर निर्भरता बढ़ गई है।
    • ‘पेपर से प्रोजेक्ट’ तक की देरी: UAE के घोषित 75 बिलियन डॉलर के संप्रभु निवेश में से मार्च 2025 तक केवल लगभग 22 बिलियन डॉलर ही वास्तविक रूप से निवेशित हो पाया है। भारत में पूर्वव्यापी कर का डर और धीमी गति से संचालित विवाद समाधान प्रक्रिया दीर्घकालिक अवसंरचना निवेश को हतोत्साहित करती है।
    • ‘चीन कारक’ (The ‘China Factor’): UAE द्वारा चीन के साथ तकनीकी (जैसे—Huawei 5G) और बंदरगाह अवसंरचना में बढ़ती साझेदारी भारत के लिये एक जटिल सुरक्षा दुविधा उत्पन्न करती है, जिससे संवेदनशील तकनीकी हस्तांतरण तथा I2U2 ढाँचे में सहयोग प्रभावित होता है।
    • व्यापार असंतुलन और मुद्रा जाल: ऊर्जा आयात के कारण भारत को वित्त वर्ष 2024-2025 में लगभग 26 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा झेलना पड़ रहा है।
      • इसके परिणामस्वरूप, स्थानीय मुद्रा निपटान प्रणाली (LCSS) में तरलता जाल की स्थिति बनती है, क्योंकि UAE के निर्यातकों के पास एकत्रित रुपये को भारत में लाभकारी निवेश के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते।
    • श्रम राष्ट्रीयकरण: UAE की आक्रामक ‘एमिराटाइज़ेशन’ (Emiratisation) नीति (2025 तक बड़ी कंपनियों में 8% स्थानीय भर्ती अनिवार्य) भारत के वाइट-कॉलर प्रवासी समुदाय और उससे जुड़े विप्रेषण प्रवाह के लिये संरचनात्मक जोखिम उत्पन्न करती है।

    लेन-देन से रूपांतरण की ओर

    • संप्रभु त्वरित मध्यस्थता: UAE के संप्रभु कोष (ADIA, Mubadala) के लिये GIFT सिटी में एक विशेष विवाद समाधान तंत्र स्थापित किया जाए, जिससे निचली न्यायपालिका की देरी से बचते हुए ‘निवेश विलंब’ की समस्या दूर की जा सके।
    • वित्तीय अंतःक्रियाशीलता: अबू धाबी ग्लोबल मार्केट (ADGM) में ‘रुपया–दिरहम कॉर्पोरेट बॉण्ड’ बाज़ार विकसित किया जाए, जिससे UAE के बैंक अतिरिक्त रुपये को भारत के हरित अवसंरचना में पुनर्निवेश कर सकें और LCSS से जुड़े तरलता जाल की समस्या का समाधान हो।
    • अंतर्राष्ट्रीय कौशल समन्वय: UAE की नेशनल क्वालिफिकेशन अथॉरिटी द्वारा पूर्व-प्रमाणित ‘स्किल्स पासपोर्ट’ विकसित किया जाए, जिससे भारतीय ब्लू-कॉलर श्रमिकों को उन्नत कर ‘ग्रे-कॉलर’ तकनीशियन बनाया जा सके और एमिराटाइज़ेशन के प्रभाव को संतुलित किया जा सके।
    • आपूर्ति शृंखला सुरक्षा: एक ‘रणनीतिक खाद्य सुरक्षा संधि’ लागू की जाए, जिसके तहत UAE को भारत के कृषि निर्यात प्रतिबंधों से कोटा-आधारित छूट दी जाए, बदले में I2U2 फूड पार्क परियोजनाओं को पूर्ण वित्तपोषण सुनिश्चित किया जाए।
    • संयुक्त बौद्धिक संपदा: रक्षा सहयोग को ‘सह-उत्पादन’ के आधार पर विकसित किया जाए, जिसमें AI, ड्रोन और रेगिस्तानी युद्धक इलेक्ट्रॉनिक्स पर ध्यान केंद्रित हो, ताकि पश्चिमी/चीनी OEMs पर निर्भरता कम करते हुए साझा रणनीतिक स्वायत्तता विकसित की जा सके।

    निष्कर्ष:

    भारत–UAE साझेदारी एक लेन-देन आधारित श्रम और तेल संबंध से विकसित होकर ग्लोबल साउथ के लिये एक सभ्यतागत तथा रणनीतिक आधार स्तंभ बन चुकी है। वित्तीय, डिजिटल और सुरक्षा ढाँचों का संस्थानीकरण करते हुए तथा क्रियान्वयन से जुड़ी प्रमुख कमियों को दूर करके, यह साझेदारी पश्चिम एशिया की अस्थिरता से ऊपर उठ सकती है। इस प्रकार यह धुरी भारत के वैश्विक शक्ति के रूप में उभार को सुनिश्चित करने के साथ-साथ UAE के तेल-उपरांत आर्थिक भविष्य के लिये भी प्रेरक शक्ति बन सकती है।