• प्रश्न :

    प्रश्न: हाल के वर्षों में बहुपक्षीय संस्थाओं को वैधता और प्रभावशीलता से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। परीक्षण कीजिये कि बहुपक्षवाद के प्रति भारत का दृष्टिकोण किस प्रकार सुधारवादी आकांक्षाओं और व्यावहारिक सहभागिता दोनों को प्रतिबिंबित करता है। (250 शब्द)

    24 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत बहुपक्षीय संगठनों में उत्पन्न संकट को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में बहुपक्षवाद के संकट को स्पष्ट कीजिये।
    • इसके बाद, इस संकट के संदर्भ में भारत के दृष्टिकोण को समझाएँ।
    • आगे, नए वैश्विक व्यवस्था में मार्गदर्शन से जुड़ी चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये।
    • अंत में, भारत के बहुपक्षीय दृष्टिकोण को सुदृढ़ करने के लिये रणनीतिक उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे संस्थानों पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था वर्तमान में प्रतिनिधित्व की वैधता, कार्यात्मक गतिरोध तथा वित्तीय दिवालियापन के ‘त्रिस्तरीय संकट’ का सामना कर रही है।

    • वर्तमान परिदृश्य में भारत ने ‘नियमों का पालन करने वाले’ से ‘नियमों को आकार देने वाले’ की भूमिका की ओर बदलाव किया है, जहाँ वह सुधारवादी आकांक्षाओं (वैश्विक दक्षिण का समर्थन) और सिद्धांतपरक व्यावहारिकता (मुद्दों-आधारित लघु-बहुपक्षवाद/मिनीलैटरलिज़्म में भागीदारी) का एक अनूठा मिश्रण अपनाता है।

    मुख्य भाग: 

    बहुपक्षवाद का संकट: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक व्यवस्था का क्षरण कई संरचनात्मक परिवर्तनों से प्रेरित है:

    • संस्थागत गतिरोध: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) यूरेशिया और पश्चिम एशिया के संघर्षों पर वीटो शक्ति के कारण गतिरोध का सामना कर रही है, जबकि विश्व व्यापार संगठन (WTO) का विवाद निपटान तंत्र भी निष्क्रिय बना हुआ है।
    • लेन-देन आधारित भू-राजनीति: प्रमुख शक्तियाँ अब सार्वभौमिक मंचों को दरकिनार कर एकतरफा शुल्क और ‘फ्रेंड-शोरिंग’ को प्राथमिकता दे रही हैं, जैसा कि 2020 के दशक के मध्य के व्यापारिक परिदृश्य में देखा गया है।
    • वित्तीय अंतराल: बहुपक्षीय संस्थाएँ गंभीर ‘तरलता संकट’ का सामना कर रही हैं, जहाँ जलवायु वित्त और महामारी तैयारी के लिये उपलब्ध संसाधन वैश्विक आवश्यकताओं से कम पड़ रहे हैं।

    भारत की सुधारवादी आकांक्षाएँ:

    • ‘विश्व मित्र’ दृष्टिकोण
      • भारत का सुधारवादी एजेंडा वैश्विक शासन को अधिक न्यायसंगत और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने पर केंद्रित है।
        • ‘वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ’ का समर्थन: भारत ने वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट (VOGSS) को संस्थागत रूप दिया है, जो एक ‘विकासात्मक सेतु’ के रूप में कार्य करता है।
          • अफ्रीकी संघ को G20 में सफलतापूर्वक शामिल कराने तथा IMF कोटा सुधारों को आगे बढ़ाने के माध्यम से भारत यह सुनिश्चित करता है कि ‘महाशक्ति’ प्रतिद्वंद्विताओं के बीच वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताएँ उपेक्षित न हों।
        • वैश्विक वित्तीय संरचना का पुनर्कल्पन: वर्ष 2026 में BRICS+ की अध्यक्षता सॅंभालते हुए भारत न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को सशक्त बनाने तथा स्थानीय मुद्रा में व्यापार तंत्र को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखता है, ताकि विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ एकतरफा प्रतिबंधों और डॉलर की अस्थिरता से सुरक्षित रह सकें।
        • ‘UN 80’ सुधारों को बढ़ावा: भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपने न्यायोचित स्थायी सदस्यता के लिये व्यापक संरचनात्मक सुधारों का दृढ़ता से समर्थन कर रहा है।
    • व्यावहारिक संलग्नता: बहुपक्षीयता (Plurilateralism) और बहु-संरेखण (Multi-alignment)
      • सुधारों को आगे बढ़ाते हुए भारत अपने मूल हितों की रक्षा के लिये यथार्थवादी रूप से कार्यात्मक बहुपक्षवाद में संलग्न रहता है।
      • मिनीलैटरल समूहों का उदय (QUAD, I2U2, IMEC): भारत ने बड़े संगठनों की निष्क्रियता से बचने के लिये ‘अनुकूल’ समूहों को अपनाया है।
        • QUAD: यह औपचारिक सैन्य गठबंधन न होते हुए भी समुद्री सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण खनिजों पर केंद्रित है।
        • I2U2 एवं IMEC: इनका उद्देश्य भारत, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच मज़बूत आपूर्ति शृंखलाएँ तथा संपर्क स्थापित करना है, जो भू-अर्थशास्त्रीय व्यावहारिकता को दर्शाता है।
      • बहु-संरेखण के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता: SCO (शंघाई सहयोग संगठन) और QUAD दोनों में भारत की समान उपस्थिति उसकी ‘प्लान B’ कूटनीति को दर्शाती है।
        • भारत वर्ष 2025 में लगभग 40% तेल आयात के बावजूद रूस के साथ अपने रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखते हुए, iCET (क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी पहल) के ज़रिये अमेरिका के साथ उच्च-प्रौद्योगिकी सहयोग को भी सुदृढ़ कर रहा है।
      • सॉफ्ट पावर के रूप में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): भारत अपने ‘इंडिया स्टैक’ (UPI, ONDC) को ‘वैश्विक सार्वजनिक वस्तु’ (Global Public Good) के रूप में निर्यात कर रहा है।
        • वर्ष 2026 तक एक दर्जन से अधिक देशों ने इन मॉडलों को अपनाया है, जिससे ‘डिजिटल गुटनिरपेक्षता’ का एक नया मार्ग विकसित हो रहा है, जो पश्चिमी कॉरपोरेट-नेतृत्व वाले और चीनी राज्य-नेतृत्व वाले डिजिटल मॉडलों का वैकल्पिक विकल्प प्रस्तुत करता है।

    नए विश्व व्यवस्था में मार्गदर्शन की चुनौतियाँ

    • ‘G2’ का जोखिम: अमेरिका-चीन के संभावित ‘G2’ गठजोड़ के सुदृढ़ होने से भारत जैसे मध्यम शक्तियों के लिये रणनीतिक स्थान सीमित हो सकता है।
    • आर्थिक निर्भरता: आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य और चीन के साथ उच्च व्यापारिक मात्रा की वास्तविकता के बीच संतुलन बनाए रखना एक जटिल चुनौती बना हुआ है।
    • संसाधन सीमाएँ: जहाँ भारत ‘मानदंड और नेतृत्व’ प्रदान करता है, वहीं कई ग्लोबल साउथ देशों की आवश्यकताओं के अनुरूप ‘स्टील एवं कंक्रीट’ (बड़े पैमाने पर अवसंरचना वित्तपोषण) उपलब्ध कराने में वह अभी भी चीन से पीछे है।

    भारत के बहुपक्षीय दृष्टिकोण को सुदृढ़ करने हेतु रणनीतिक मार्ग

    • ग्लोबल साउथ के नेतृत्व का औपचारिककरण: ‘वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ’ के लिये एक स्थायी कार्यात्मक सचिवालय की स्थापना, ताकि प्रमुख संयुक्त राष्ट्र और G20 शिखर सम्मेलनों से पहले जलवायु वित्त तथा ऋण राहत जैसे मुद्दों पर समन्वित दृष्टिकोण विकसित किया जा सके।
    • रणनीतिक ‘मिनीलैटरल’ का विस्तार: I2U2-प्लस और QUAD जैसी ‘अनुकूल’ साझेदारियों को और गहरा करना, ताकि वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएँ एवं समुद्री सुरक्षा ढाँचे विकसित किये जा सकें, जो गतिरोधग्रस्त वैश्विक संस्थाओं की जड़ता को दरकिनार कर सकें।
    • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) कूटनीति: ‘इंडिया स्टैक’ (UPI, आधार, ONDC) को वैश्विक सार्वजनिक वस्तु के रूप में निर्यात करना, ताकि विकासशील देशों को बिग टेक या राज्य-नेतृत्व वाले डिजिटल एकाधिकारों के विकल्प के रूप में एक संप्रभु और गुटनिरपेक्ष मॉडल मिल सके।
    • रुपया व्यापार के माध्यम से आर्थिक सुदृढ़ता: ASEAN और BRICS+ साझेदारों के साथ द्विपक्षीय स्वैप समझौतों तथा स्थानीय मुद्रा में व्यापार निपटान प्रणालियों को तीव्र करना, ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को ‘डॉलर के हथियारीकरण’ एवं वैश्विक वित्तीय आघातों से सुरक्षित किया जा सके।

    निष्कर्ष

    भारत का बहुपक्षवाद के प्रति दृष्टिकोण अब पूर्व या पश्चिम के बीच चयन का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि विविधीकरण के माध्यम से रणनीतिक स्वायत्तता की खोज बन गया है। ग्लोबल साउथ के लिये एक ‘नीति मध्यस्थ’ (Policy Arbiter) के रूप में स्वयं को स्थापित करते हुए और पश्चिम के साथ गहरे कार्यात्मक संबंध बनाए रखते हुए, भारत एक विखंडित वैश्विक व्यवस्था को स्थिर करने का प्रयास कर रहा है। अंततः भारत की सफलता इस तर्क पर निर्भर करेगी कि वह अपने ‘नैतिक नेतृत्व’ को ‘भौतिक क्षमता’ में कितने प्रभावी रूप से परिवर्तित कर पाता है, ताकि नए वैश्विक नियम उसके समानता, स्थिरता और संप्रभुता के मूल्यों को प्रतिबिंबित करें।