• प्रश्न :

    प्रश्न. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और आपूर्ति-शृंखला व्यवधानों के बीच भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, उच्च आर्थिक विकास को बनाए रखने के साथ-साथ व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में आने वाली चुनौतियों का परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)

    18 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर होने को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में, उच्च आर्थिक वृद्धि को बनाए रखते हुए व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।
    • इन चुनौतियों से निपटने के लिये उपयुक्त उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत का वर्ष 2026-27 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य, एक विकसित राष्ट्र (विकसित भारत) बनने की उसकी यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

    अर्थव्यवस्था की अनुकूलन क्षमता के बावजूद, अस्थिर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में 7%+ की वृद्धि दर को अक्षुण्ण रखने हेतु यह आवश्यक है कि हम तीव्र आर्थिक विस्तार और विवेकी व्यापक आर्थिक नियंत्रण के मध्य एक सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाएँ।

    मुख्य भाग

    वृद्धि और स्थिरता बनाए रखने में चुनौतियाँ

    • बाह्य एवं भू-राजनीतिक अस्थिरता
      • वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान: बार-बार उत्पन्न होने वाले भू-राजनीतिक तनाव (जैसे पश्चिम एशिया और पूर्वी यूरोप में) ‘वस्तु मूल्य आघातों’ का कारण बनते हैं, विशेषकर कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और खाद्य तेलों में, जिससे आयातित मुद्रास्फीति बढ़ती है।
      • व्यापार संरक्षणवाद: पारस्परिक शुल्कों और ‘खंडित व्यापार (Fragmented Trade)’ की बढ़ती प्रवृत्ति भारत के निर्यात-आधारित विकास के अवसरों को सीमित करती है, जिससे वर्ष 2030 तक कुल 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
      • पूंजी पलायन का जोखिम: उन्नत अर्थव्यवस्थाओं (जैसे US Fed) की सख्त मौद्रिक नीतियाँ विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के आकस्मिक बहिर्गमन का कारण बन सकती हैं, जिससे भारतीय रुपये पर अवमूल्यन का दबाव पड़ता है।
    • घरेलू व्यापक-संरचनात्मक बाधाएँ
      • धीमा निजी निवेश: जबकि सार्वजनिक पूंजीगत व्यय रिकॉर्ड स्तर (GDP का 4.4% - बजट 2026) पर है, वैश्विक अनिश्चितता और ग्रामीण क्षेत्रों में कमज़ोर ‘नाममात्र’ मांग के कारण निजी पूंजीगत व्यय अभी भी संकोचपूर्ण बना हुआ है।
      • ‘K-आकार की’ पुनर्बहाली की चुनौती: बढ़ते कॉर्पोरेट मुनाफों और स्थिर ग्रामीण मज़दूरी के बीच अंतर उपभोग आधार को सीमित करता है, जो भारत की GDP का प्रमुख चालक है।
      • राजकोषीय संतुलन बनाम कल्याण: वर्ष 2027 तक 4.3% के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बनाए रखते हुए महत्त्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा योजनाओं (जैसे VB GRAM G और PM-किसान) को वित्तपोषित करना एक प्रमुख चुनौती है।
      • रोज़गार-वृद्धि असंगति: ‘रोज़गारविहीन वृद्धि’ से ‘रोज़गार-आधारित वृद्धि’ की ओर संक्रमण, बड़े कौशल अंतर के कारण बाधित है, जहाँ केवल 42.6% भारतीय स्नातक रोज़गार योग्य हैं (इंडियाज़ ग्रेजुएट स्किल इंडेक्स 2025)।

    चुनौतियों से निपटने के उपाय

    • औद्योगिक एवं अवसंरचनात्मक आधार को सुदृढ़ करना
      • PLI 2.0 का विस्तार: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं को डीप-टेक और श्रम-प्रधान क्षेत्रों (जैसे वस्त्र और चमड़ा) तक विस्तारित करना, ताकि विनिर्माण GVA को 14% से बढ़ाकर 25% के लक्ष्य की ओर ले जाया जा सके।
      • लॉजिस्टिक्स दक्षता: पीएम गति शक्ति और राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति के त्वरित कार्यान्वयन से लॉजिस्टिक्स लागत को और कम करना, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ेगी।
      • ऊर्जा सुरक्षा: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण करना, ताकि वार्षिक तेल आयात बिल को कम किया जा सके, जो व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिये सबसे बड़ा खतरा है।
    • व्यापक-राजकोषीय एवं वित्तीय सुधार
      • विश्वास-आधारित कर व्यवस्था: GST (GST 2.0) और प्रत्यक्ष करों को और सरल बनाना, ताकि कर-उत्प्लावकता (Tax Buoyancy) में सुधार हो तथा बिना कर दर बढ़ाए राजस्व वृद्धि, GDP वृद्धि से अधिक हो सके।
      • निजी पूंजी निवेश को प्रोत्साहन: ‘निवेश कर प्रोत्साहन’ की शुरुआत करना तथा पुराने नियामकीय अवरोधों को दूर करना, ताकि अवसंरचना और अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़े।
      • MSME का औपचारिकीकरण: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME), जो GDP का लगभग 30% योगदान देते हैं, के लिये उन्नत ‘क्रेडिट गारंटी योजनाएँ’ और डिजिटल ब्रिज ऋण प्रदान करना, जिससे संस्थागत ऋण तक उनकी पहुँच बढ़ सके।
    • मानव पूंजी और ग्रामीण अनुकूलन 
      • कृषि-प्रौद्योगिकी एवं मूल्य संवर्द्धन: कोल्ड चेन और खाद्य प्रसंस्करण में निवेश करके ‘खाद्य सुरक्षा’ से ‘पोषण एवं मूल्य सुरक्षा’ की ओर ध्यान केंद्रित करना, ताकि ग्रामीण आय को दोगुना किया जा सके तथा खाद्य मुद्रास्फीति को स्थिर किया जा सके।
      • शिक्षा से रोज़गार का सेतु: ‘राष्ट्रीय कौशल मानचित्रण’ प्रणाली की स्थापना करना, ताकि व्यावसायिक प्रशिक्षण को सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसे उभरते क्षेत्रों की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा सके।

    निष्कर्ष

    5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक परिवर्तन का संकेतक है। भारत को अपने ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’और ‘डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI)’ का प्रभावी उपयोग करते हुए एक सशक्त घरेलू बाज़ार का निर्माण करना चाहिये, जो वैश्विक आघातों का सामना कर सके। राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए और आपूर्ति-पक्षीय सुधारों को आक्रामक रूप से लागू करके, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसकी आर्थिक वृद्धि न केवल तीव्र हो, बल्कि दीर्घकाल में स्थिर, समावेशी एवं सतत भी रहे।