प्रश्न: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में परिवर्तित होते भू-राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में, भारत की सुरक्षा तथा आर्थिक हितों के लिये समुद्री साझेदारियों के रणनीतिक महत्त्व का विश्लेषण कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्यों को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में भारत की सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिये हिंद-प्रशांत के महत्त्व का विश्लेषण कीजिये।
- इसके बाद, यह उल्लेख कीजिये कि भारत इन हितों को कैसे साकार कर रहा है।
- आगे, इससे संबंधित चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।
- अंत में उपयुक्त उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक गुरुत्वाकर्षण के केंद्र के रूप में उभरा है, जिसे एकध्रुवीयता से एक प्रतिस्पर्द्धी बहुध्रुवीय स्थान में बदलते हुए देखा जा सकता है। यह बदलाव चीन के मुखर उदय और लघु-पक्षीय गठबंधनों की मज़बूती से परिभाषित है।
भारत के लिये, यह क्षेत्र अब केवल एक माध्यमिक समुद्री क्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि इसकी रणनीतिक स्वायत्तता और नेट सुरक्षा प्रदाता बनने की आकांक्षाओं के लिये प्राथमिक रंगमंच है।
मुख्य भाग:
भारत की सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिये समुद्री साझेदारी का महत्त्व:
- रणनीतिक सुरक्षा हित
- वर्चस्ववादी आक्रामकता का प्रतिरोध: समुद्री साझेदारियाँ दक्षिण एवं पूर्वी चीन सागर में यथास्थिति को एकतरफा बदलने के प्रयासों के विरुद्ध ‘बल गुणक’ का कार्य करती हैं और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को सुनिश्चित करती हैं।
- समुद्री संचार मार्गों (SLOCs) की सुरक्षा: भारत के अधिकांश ऊर्जा आयात मलक्का जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं, इसलिये साझेदारियाँ नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और ‘चोकपॉइंट’ से जुड़ी कमज़ोरियों से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
- गैर-पारंपरिक खतरों से निपटना: समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ना (IUU) और आपदा राहत (HADR) जैसे ‘ग्रे ज़ोन’ चुनौतियों से निपटने के लिये सहयोगात्मक ढाँचे आवश्यक हैं, विशेषकर हिंद महासागर क्षेत्र में।
- समुद्री क्षेत्र जागरूकता (MDA): संयुक्त गश्त और सूचना-साझाकरण समझौते भारत को समुद्र की सतह तथा पनडुब्बी गतिविधियों पर ‘निरंतर निगरानी’ बनाए रखने में सहायता करते हैं, जिससे ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति को निष्प्रभावी किया जा सकता है।
- रणनीतिक आर्थिक हित
- नीली अर्थव्यवस्था की क्षमता: साझेदारियाँ समुद्री संसाधनों के सतत दोहन, गहरे समुद्र में खनन और अपतटीय ऊर्जा को सुगम बनाती हैं, जो भारत के $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- व्यापार कनेक्टिविटी और बंदरगाह विकास: IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा) और ‘त्रिपक्षीय राजमार्ग’ जैसी सहयोगी परियोजनाएँ भारत को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकृत करने के लिये समुद्री संपर्कों का लाभ उठाती हैं।
- अनुकूल आपूर्ति शृंखला: SCRI (आपूर्ति शृंखला अनुकूलन पहल) के साथ जुड़कर, भारत एकल-स्रोत विनिर्माण केंद्रों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करता है, जिससे भू-राजनीतिक आघातों के दौरान आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।
- तकनीकी सह-नवाचार: फ्राँस और अमेरिका जैसे देशों के साथ समुद्री संबंध जहाज़ निर्माण, अंडरवॉटर रोबोटिक्स और हरित समुद्री प्रणोदन के लिये उच्च-स्तरीय तकनीक लाते हैं, जो ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा क्षेत्र को बढ़ावा देते हैं।
हितों की प्राप्ति: भारत की रणनीतिक उपस्थिति
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आयाम
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प्रमुख उपाय
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संस्थागत एवं कूटनीतिक पहल
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SAGAR विज़न: भारत को क्षेत्र में एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित करती है।
एक्ट ईस्ट → हिंद-प्रशांत: आसियान (ASEAN), जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंधों को सुरक्षा क्षेत्र तक विस्तारित करना।
लघु-पक्षीय समूह: तकनीकी, अंतरिक्ष और समुद्री सहयोग के लिये क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग (Quad) तथा I2U2 समूह में सक्रिय भूमिका।
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संचालनात्मक एवं अवसंरचनात्मक क्षमता
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लॉजिस्टिक समझौते: LEMOA जैसे समझौते मित्र देशों के नौसैनिक अड्डों तक पहुँच को सक्षम बनाते हैं।
रणनीतिक सैन्य आधार: मॉरीशस, ओमान और इंडोनेशिया जैसे प्रमुख स्थानों पर अपनी उपस्थिति का विस्तार करना।
समुद्री जागरूकता: इन्फॉर्मेशन फ्यूज़जन सेंटर – हिंद महासागर क्षेत्र (IFC-IOR) जहाजों की आवाजाही पर नज़र रखता है और क्षेत्रीय समन्वय को बढ़ाता है।
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समुद्री तालमेल की चुनौतियाँ
- चीनी ‘गहरे समुद्र’ में पैठ: चीनी अनुसंधान जहाजों की निरंतर उपस्थिति और हंबनटोटा जैसे ‘दोहरे उपयोग’ वाले बंदरगाह भारत के लिये एक निरंतर निगरानी चुनौती उत्पन्न करते हैं।
- साझेदारों की रणनीतिक अस्पष्टता: क्वाड (QUAD) जैसे संगठनों में जब कुछ देश केवल व्यापार और कुछ केवल सैन्य सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं तो इससे उनके साझा लक्ष्यों में तालमेल की कमी आ सकती है।
- संसाधन की कमी: आकांक्षाओं के बावजूद, भारतीय नौसेना का बजट हिस्सा निरंतर 'ब्लू-वॉटर' ऑपरेशंस के लिये आवश्यक स्तर से कम बना हुआ है।
- क्षेत्रीय संवेदनशीलता: छोटे तटीय राष्ट्र प्राय: ‘महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता’ में फॅंसने से डरते हैं, जिससे वे भारत की सुरक्षा पहलों के प्रति एक सतर्क दृष्टिकोण अपनाते हैं।
सुदृढ़ समुद्री नीति के उपाय
- ट्रिपल-हेलिक्स सहयोग: एकीकृत कमान के लिये 'राष्ट्रीय समुद्री प्राधिकरण' के तहत नौसेना, तटरक्षक बल और मर्चेंट नेवी के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना।
- पनडुब्बी क्षमता में वृद्धि: IOR में 'असममित खतरों' का मुकाबला करने के लिये 'प्रोजेक्ट 75I' में तेज़ी लाना और मानव रहित अंडरवॉटर वाहनों (UUVs) में निवेश करना।
- डिजिटल समुद्री सिल्क रोड: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी डिजिटल बुनियादी ढाँचे के विकल्प के रूप में एक क्षेत्रीय ‘फाइबर-ऑप्टिक और डेटा ग्रिड’ के निर्माण का नेतृत्व करना।
- ASEAN की केंद्रीयता को सुदृढ़ करना: यह सुनिश्चित करना कि समुद्री साझेदारियाँ ASEAN की अनदेखी न करें, बल्कि ‘हिंद-प्रशांत पर आसियान आउटलुक’ (AOIP) को और मज़बूत बनाएँ।
- जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचा: 'आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढाँचे के लिये गठबंधन' (CDRI) का नेतृत्व करने के लिये द्वीप राष्ट्रों के साथ ‘हरित बंदरगाहों’ और आपदा-प्रतिरोधी तटीय बुनियादी ढाँचे हेतु साझेदारी करना।
निष्कर्ष
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की समुद्री रणनीति ‘निष्क्रिय अवलोकन’ (Passive Observation) से ‘सक्रिय आकार देने’ (Active Shaping) की ओर विकसित हुई है, जो एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में इसकी स्थिति को दर्शाती है। भारत की समुद्री साझेदारियों की मज़बूती ही यह निर्धारित करेगी कि वह अपने संप्रभु और आर्थिक भविष्य को सुरक्षित रखते हुए 21वीं सदी के इन ‘अशांत जल’ (Turbulent Waters) के बीच अपना मार्ग बनाने में कितना सक्षम है।