मीरा शर्मा एक ज़िले में उप-मंडल दंडाधिकारी (एसडीएम) हैं, जहाँ सरकार द्वारा एक बड़े राजमार्ग विस्तार परियोजना को स्वीकृति दी गई है। इस परियोजना से संपर्क-सुविधा में सुधार, क्षेत्रीय व्यापार को प्रोत्साहन तथा रोज़गार के अवसरों का सृजन होने की अपेक्षा है।
हालाँकि, इस परियोजना के लिये कई गाँवों की कृषि भूमि का अधिग्रहण करना आवश्यक है। जहाँ अनेक भूमि स्वामियों ने कानून के अंतर्गत निर्धारित मुआवज़े को स्वीकार कर लिया है, वहीं लघु एवं सीमांत किसानों का एक समूह इस अधिग्रहण का कड़ा विरोध कर रहा है। उनका तर्क है कि यद्यपि मुआवज़ा विधिक रूप से निर्धारित है, फिर भी यह उनके दीर्घकालिक आजीविका-हानि की पर्याप्त भरपाई नहीं करता, क्योंकि कृषि ही उनकी मुख्य तथा कई मामलों में एकमात्र आय का स्रोत है।
एक सार्वजनिक परामर्श बैठक के दौरान स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने प्रशासन पर कमज़ोर किसानों के कल्याण की अपेक्षा आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया। कुछ ग्रामीणों ने विरोध-प्रदर्शन आयोजित करना भी प्रारंभ कर दिया है।
उधर, उच्च अधिकारी मीरा पर भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया को शीघ्र पूर्ण करने का दबाव डाल रहे हैं, क्योंकि इस परियोजना की कठोर समय-सीमा है तथा इसका राजनीतिक महत्त्व भी अधिक है।
मीरा समझती हैं कि यदि परियोजना में विलंब होता है तो इससे प्रशासनिक आलोचना तथा आर्थिक हानि हो सकती है, किंतु किसानों की चिंताओं का समाधान किये बिना आगे बढ़ने से सामाजिक अन्याय एवं अशांति उत्पन्न हो सकती है। इस प्रकार मीरा एक कठिन नैतिक द्वंद्व का सामना कर रही हैं।
प्रश्न
प्रश्न 1. इस स्थिति में कौन-कौन से नैतिक मुद्दे सम्मिलित हैं?
प्रश्न 2. इस स्थिति में मीरा के सामने कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? उनका मूल्यांकन कीजिये।
प्रश्न 3. इस स्थिति में मीरा को कौन-सा कार्य-पथ अपनाना चाहिये? अपने उत्तर का औचित्य सिद्ध कीजिये।
11 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़यह प्रकरण एक सिविल सेवक के सामने उत्पन्न नैतिक दुविधा को दर्शाता है, जहाँ उसे विकासात्मक प्राथमिकताओं और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करना होता है। एक उप-मंडल दंडाधिकारी के रूप में मीरा शर्मा को राजमार्ग विस्तार परियोजना के समयबद्ध क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना है, जो आर्थिक विकास और बेहतर संपर्क का वादा करती है। साथ ही उन्हें उन लघु एवं सीमांत किसानों की वैध चिंताओं का भी समाधान करना है, जिनकी आजीविका भूमि अधिग्रहण के कारण प्रभावित होने की आशंका है।
प्रश्न 1. इस स्थिति में कौन-कौन से नैतिक मुद्दे सम्मिलित हैं?
प्रश्न 2. इस स्थिति में मीरा के सामने कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? उनका मूल्यांकन कीजिये।
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मीरा के लिये उपलब्ध विकल्प |
लाभ |
हानियाँ |
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1. कानून और परियोजना की समय-सीमा के अनुसार भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना |
परियोजना का समय पर पूरा होना सुनिश्चित होगा। प्रशासनिक दक्षता और सरकारी निर्देशों के पालन का प्रदर्शन होगा। देरी के कारण होने वाले संभावित वित्तीय नुकसान से बचा जा सकेगा। |
किसानों की आजीविका से जुड़ी चिंताएँ अनसुलझी रह सकती हैं। विरोध प्रदर्शन और सामाजिक अशांति की संभावना बढ़ सकती है। प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास कम हो सकता है। |
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2. किसानों की चिंताओं के समाधान तक भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को स्थगित करना |
संवेदनशीलता और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित होगी। प्रशासन और स्थानीय समुदाय के बीच विश्वास मज़बूत होगा। बेहतर पुनर्वास या मुआवज़े के उपायों की संभावना तलाशने का अवसर मिलेगा। |
परियोजना में देरी और वित्तीय प्रभाव पड़ सकता है। उच्च अधिकारियों की आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। भविष्य की परियोजनाओं में देरी का उदाहरण स्थापित हो सकता है। |
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3. किसानों के साथ संवाद और वार्ता को प्रोत्साहित करना |
सहभागी निर्णय-निर्धारण को बढ़ावा मिलता है। तनाव और विरोध को कम करने में सहायता मिलती है। आजीविका सहायता या पुनर्वास जैसे वैकल्पिक समाधान खोजने का अवसर मिलता है। |
वार्ता प्रक्रिया में समय लग सकता है, जिससे कार्य धीमा हो सकता है। किसानों की अपेक्षाएँ कानूनी प्रावधानों से अधिक बढ़ सकती हैं। |
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4. बेहतर मुआवज़े या पुनर्वास उपायों की सिफारिश उच्च अधिकारियों को करना |
किसानों की चिंताओं को औपचारिक रूप से उठाया जा सकेगा। निष्पक्षता और वितरणात्मक न्याय को बढ़ावा मिलेगा। विकास के लक्ष्यों और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित होगा। |
अंतिम निर्णय उच्च अधिकारियों पर निर्भर करेगा। स्वीकृति प्रक्रिया में समय लग सकता है, जिससे परियोजना की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है। |
सबसे उपयुक्त दृष्टिकोण यह होगा कि विकल्प 1 को सावधानीपूर्वक लागू करते हुए विकल्प 3 और विकल्प 4 का संयोजन अपनाया जाए।
प्रश्न 3. इस स्थिति में मीरा को कौन-सा कार्य-पथ अपनाना चाहिये? अपने उत्तर का औचित्य सिद्ध कीजिये।
औचित्य:
नैतिक शासन के लिये ऐसा संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है, जो विकास को सहानुभूति और न्याय के साथ समन्वित करे। संवाद, पारदर्शिता और न्यायसंगत पुनर्वास सुनिश्चित करके मीरा लोक विश्वास बनाए रखते हुए समावेशी एवं सतत विकास को संभव बना सकती है।