• प्रश्न :

    प्रश्न. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में डीप-टेक स्टार्टअप्स के बढ़ते उभार के साथ भारत वैश्विक प्रौद्योगिकी परिदृश्य में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने की दिशा में अग्रसर है। इस परिप्रेक्ष्य में, भारत की वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करने में डीप-टेक नवाचारों और स्टार्टअप्स की भूमिका का आकलन कीजिये। (250 words)

    11 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 विज्ञान-प्रौद्योगिकी

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत इस तर्क को रेखांकित करते हुए कीजिये कि वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है।
    • मुख्य भाग में यह विस्तार से बताइये कि भारत इन प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में स्वयं को किस प्रकार स्थापित कर रहा है।
    • इसके बाद स्पष्ट कीजिये कि डीप-टेक नवाचार और स्टार्टअप्स भारत की वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करने में क्या भूमिका निभा रहे हैं।
    • वर्तमान में भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।
    • अंत में, इन चुनौतियों से निपटने के लिये आवश्यक उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    वैश्विक प्रौद्योगिकी परिदृश्य को ‘प्रौद्योगिकीय संप्रभुता’ की तीव्र प्रतिस्पर्द्धा परिभाषित कर रही है।

    • भारत की महत्त्वाकांक्षाएँ वर्ष 2035 तक अनुमानित $1.7 ट्रिलियन AI-प्रेरित आर्थिक मूल्य पर आधारित हैं और वर्ष 2032 तक भारत विश्व के शीर्ष चार सेमीकंडक्टर विनिर्माण देशों में से एक बनने की ओर अग्रसर है।
    • साथ ही, इसकी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था तेज़ी से एक सरकारी एकाधिकार से निजी क्षेत्र-नेतृत्व वाले सशक्त तंत्र में परिवर्तित हो रही है।
    • उच्च-स्तरीय प्रौद्योगिकियों पर यह निर्भरता अब वैकल्पिक नहीं रही, बल्कि यह भारत के $5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था और उससे आगे की ओर संक्रमण का प्रमुख इंजन बन चुकी है।

    मुख्य भाग:

    प्रमुख प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में भारत की स्थिति:

    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता: अपनाने से ‘सॉवरेन AI’ तक
      • स्वदेशी मॉडल: सामान्य वैश्विक LLMs से आगे बढ़ते हुए, भारतीय स्टार्टअप ‘सोशल AI’ टूल्स जैसे भारत-विस्तार (Bharat-VISTAAR) विकसित कर रहे हैं, जो कृषि और शासन जैसी स्थानीय चुनौतियों के समाधान हेतु घरेलू डाटासेट्स का उपयोग करते हैं।
      • वैश्विक कौशल केंद्र: दिसंबर 2025 तक, भारत विश्व के AI कार्यबल का 16% हिस्सा रखता है और 2.8 के स्कोर के साथ AI कौशल प्रसार में वैश्विक स्तर पर प्रथम स्थान पर है।
        • डीप-टेक स्टार्टअप्स की भूमिका: यह प्रतिभा डीप-टेक स्टार्टअप्स को ‘सेवा प्रदाता’ से ‘बौद्धिक संपदा (IP) के स्वामी’ बनने में सक्षम बनाती है, जिससे वर्ष 2035 तक $1.7 ट्रिलियन के आर्थिक मूल्य की संभावनाएँ उत्पन्न होती हैं।
      • बुनियादी ढाँचा: इंडिया AI मिशन ने कंप्यूटिंग क्षमता (38,000+ GPUs) तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाया है, जिससे स्टार्टअप्स अत्यधिक लागत के बिना वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर पा रहे हैं।
    • सेमीकंडक्टर: भौतिक स्तर को सुरक्षित करना
      • ISM 2.0: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 “पूर्ण-स्तरीय भारतीय बौद्धिक संपदा (फुल-स्टैक इंडियन IP)” पर केंद्रित है।
        • फैबलेस डिज़ाइन और उन्नत पैकेजिंग में कार्यरत स्टार्टअप्स वैश्विक आपूर्ति शृंखला आघातों के प्रति भारत की रणनीतिक संवेदनशीलता को कम कर रहे हैं।
      • आयात प्रतिस्थापन: हार्डवेयर विनिर्माण के स्थानीयकरण के माध्यम से भारत अपने डेटा उद्योगों को अस्थिर व्यापार प्रतिबंधों से सुरक्षित कर रहा है, विशेषकर महत्त्वपूर्ण खनिजों और सिलिकॉन के संदर्भ में।
      • वाणिज्यिक उत्पादन उपलब्धि (2026): पहली बार भारत पायलट चरण से आगे बढ़ चुका है।
        • वर्ष 2026 की शुरुआत में चार प्रमुख इकाइयाँ (जिनमें टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल है) बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उत्पादन में परिवर्तित हो गईं।
        • यह ‘केवल डिज़ाइन’ करने वाले देश से ATMP (असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग) के वैश्विक केंद्र बनने की दिशा में महत्त्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।
      • डिज़ाइन-आधारित विनिर्माण (DLI 2.0): पुनर्गठित डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) 2.0 के तहत ध्यान अब बाज़ार-प्रमाणित भारतीय बौद्धिक संपदा (IP) पर अधिक केंद्रित हो गया है।
        • अब स्टार्टअप्स अत्याधुनिक 2 नैनोमीटर चिप डिज़ाइन और रीकन्फिगरेबल मल्टी-कोर प्रोसेसर विकसित कर रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स का ‘मस्तिष्क’ तेज़ी से भारत में ही डिज़ाइन और निर्मित हो रहा है।
    • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी: वैश्विक प्रक्षेपण बाज़ार में हिस्सेदारी बढ़ाना
      • मांग-आधारित प्रक्षेपण: निजी कंपनियाँ जैसे स्काईरूट एयरोस्पेस और अग्निकुल कॉसमॉस उपग्रह निर्माण से आगे बढ़कर ‘ऑर्बिटल मिशन’ तथा 3D-प्रिंटेड इंजनों की पेशकश कर रही हैं।
      • लागत नेतृत्व: फ्रुगल इंजीनियरिंग का उपयोग करके भारतीय स्पेस-टेक स्टार्टअप्स लाभकारी वैश्विक स्मॉल-सैटेलाइट प्रक्षेपण बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं और स्थापित पश्चिमी कंपनियों से सीधे प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं।
      • निजी कॉन्स्टेलेशन गठबंधन: भारत अब व्यक्तिगत उपग्रह प्रक्षेपण से आगे बढ़कर अपना पहला निजी पृथ्वी अवलोकन (EO) कॉन्स्टेलेशन विकसित कर रहा है।
        • वर्ष 2026 में एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), जिसमें पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, पियरसाइट और सैटश्योर शामिल हैं, 12 उपग्रहों की प्रणाली स्थापित कर रही है।
      • PNT में विशिष्ट वैश्विक नेतृत्व: भारतीय स्टार्टअप्स (जैसे VyomIC) निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में देश का पहला निजी पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग (PNT) कॉन्स्टेलेशन विकसित कर रहे हैं।

    डीप-टेक नवाचार और स्टार्टअप्स की भूमिका

    भूमिका

                      वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता पर प्रभाव

    बौद्धिक संपदा (IP) सृजन:

    भारत को ‘सेवा-आधारित’ मॉडल से ‘नवाचार-आधारित’ विकास मॉडल की ओर स्थानांतरित करता है, जिससे स्थायी प्रतिस्पर्द्धात्मक बढ़त बनती है।

    रणनीतिक स्वायत्तता:

    राष्ट्रीय सुरक्षा, क्वांटम क्रिप्टोग्राफी और संचार जैसे क्षेत्रों में विदेशी प्रौद्योगिकियों पर निर्भरता को कम करता है।

    प्रतिभा संरक्षण:

    ‘फर्स्ट-प्रिंसिपल वैज्ञानिकों’ के लिये उच्च स्तरीय अवसर प्रदान करता है, जिससे पारंपरिक ‘ब्रेन ड्रेन’ की प्रवृत्ति उलटती है।

    गुणक प्रभाव:

    ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ या ‘क्लाइमेट-टेक’ जैसे क्षेत्रों में डीप-टेक नवाचार वैश्विक नेट-ज़ीरो अर्थव्यवस्था के लिये निर्यात योग्य अवसंरचना का निर्माण करता है।

    चुनौतियाँ

    • तेज़ी के बावजूद, कुछ संरचनात्मक कमियाँ मौजूद हैं जो भारत के उभरते हुए अवसर को धीमा कर सकती हैं।
    • ‘पेशेंट कैपिटल’ की कमी: डीप-टेक उद्यमों को लंबी परिपक्वता अवधि (5–7 वर्ष) की आवश्यकता होती है, जो अक्सर पारंपरिक वेंचर कैपिटल मॉडल (जो 2 वर्ष में शीघ्र निकास चाहते हैं) से मेल नहीं खाती।
    • विशेषज्ञता का असंतुलन: भारत लाखों इंजीनियर तैयार करता है, लेकिन क्रायोजेनिक्स, ऑप्टिक्स और 3D ग्लास पैकेजिंग जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में विशेषज्ञों की संख्या सीमित है।
    • विखंडित मांग: सरकारी मंत्रालयों द्वारा उन्नत तकनीकों का घरेलू उपयोग अक्सर असंगठित होता है, जिसके कारण कई स्टार्टअप्स को अपने पहले बड़े ग्राहक अमेरिका या यूरोप में खोजने पड़ते हैं।
    • उच्च अवसंरचना लागत: उच्च-स्तरीय फैब्रिकेशन, क्लीनरूम और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (HPC) क्लस्टर शुरुआती चरण के डीप-टेक उद्यमियों के लिये अत्यधिक महॅंगे साबित होते हैं।

    चुनौतियों से निपटने के उपाय

    • RDI फंड का प्रभावी क्रियान्वयन: ₹1 लाख करोड़ के अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) फंड का पूर्ण उपयोग करते हुए उभरते क्षेत्रों को दीर्घकालिक, कम ब्याज दर वाला ‘पेशेंट कैपिटल’ उपलब्ध कराना।
    • विश्वविद्यालय-उद्योग ‘स्पिन-ऑफ्स’: अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के तहत IITs और भारतीय विज्ञान संस्थान जैसे संस्थानों एवं स्टार्टअप्स के बीच अनिवार्य साझेदारी को लागू करना, ताकि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा मिले।
    • सरकार को ‘पहला खरीदार’ बनाना: विभिन्न मंत्रालयों की मांग को एकत्रित कर अंतरिक्ष और AI समाधानों के लिये घरेलू बाज़ार तैयार करना, जिससे भारतीय स्टार्टअप्स को वैश्विक विस्तार से पहले स्थिर राजस्व स्रोत मिल सके।
    • IP संरक्षण को सरल बनाना: नेशनल डीप-टेक स्टार्टअप पॉलिसी के तहत पेटेंट फाइलिंग और प्रवर्तन प्रक्रिया को सरल बनाना, ताकि भारतीय नवोन्मेषक वैश्विक बाज़ारों में अपनी बौद्धिक संपदा का प्रभावी व्यावसायीकरण कर सकें।

    निष्कर्ष:

    भारत में डीप-टेक का उदय ‘सिलिकॉन एली’ आधारित सेवा मॉडल से ‘सॉवरेन सिलिकॉन’ हार्डवेयर और AI स्टैक्स की ओर एक मौलिक परिवर्तन को दर्शाता है। बहुध्रुवीय विश्व में, तकनीकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता राष्ट्रीय शक्ति की नई मुद्रा बन चुकी है। पूंजी और परिपक्वता के अंतर को कम करते हुए तथा उच्च-स्तरीय वैज्ञानिक उद्यमिता की संस्कृति को प्रोत्साहित करके, भारत न केवल वैश्विक मानकों तक पहुँचने का प्रयास कर रहा है, बल्कि उन्हें परिभाषित करने की दिशा में भी सक्रिय रूप से आगे बढ़ रहा है।