• प्रश्न :

    प्रश्न. जलवायु शमन के प्रभावी उपायों के लिये तकनीकी नवाचार के साथ-साथ पारिस्थितिकीय सहनशीलता भी अत्यंत आवश्यक मानी जा रही है। इस संदर्भ में स्पष्ट कीजिये कि प्रकृति-आधारित समाधान किस प्रकार पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरुद्धार और जैव विविधता संरक्षण में तकनीकी हस्तक्षेपों के साथ पूरक भूमिका निभा सकते हैं। (250 words)

    11 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 पर्यावरण

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत इस तर्क को रेखांकित करते हुए कीजिये कि तकनीकी हस्तक्षेपों के साथ-साथ प्रकृति-आधारित समाधानों की आवश्यकता क्यों है।
    • मुख्य भाग में, पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना और जैव विविधता संरक्षण के संदर्भ में यह चर्चा कीजिये कि प्रकृति-आधारित समाधान तकनीकी हस्तक्षेपों के साथ कैसे पूरक भूमिका निभा सकते हैं।
    • साथ ही प्रकृति-आधारित समाधानों और तकनीकी हस्तक्षेपों के अंतर्संबंध से जुड़े प्रमुख मुद्दों का विश्लेषण कीजिये तथा उपयुक्त उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    मानव युग में, जहाँ पर्यावरणीय क्षति प्रकृति की पुनर्प्राप्ति की गति से अधिक तीव्र है, ‘प्रकृति बनाम प्रौद्योगिकी’ की अवधारणा अब अप्रासंगिक हो गई है। प्रभावी जलवायु कार्रवाई के लिये एक मिश्रित दृष्टिकोण आवश्यक है, जो तकनीकी नवाचार को प्रकृति-आधारित समाधानों (NbS) के साथ जोड़कर पारिस्थितिक संतुलन बहाल करे और दीर्घकालिक अनुकूलन सुनिश्चित करे।

    NbS जलवायु कार्रवाई के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में मान्यता प्राप्त हैं, जो वर्ष 2030 तक आवश्यक लागत-प्रभावी CO2 शमन का लगभग 37% तक प्रदान करने में सक्षम हैं।

    मुख्य भाग:

    पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापना में पूरक भूमिका

    • सटीक वनीकरण: ड्रोन तकनीक और AI-आधारित बीज मैपिंग (तकनीकी) दुर्गम क्षेत्रों में तेज़ी से बीजों का प्रसार संभव बनाते हैं।
      • हालाँकि, इन वनों की सफलता सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन (NbS) पर निर्भर करती है, जो मृदा के स्वास्थ्य और स्थानीय प्रजातियों की अनुकूलता सुनिश्चित करता है।
    • जल-वैज्ञानिक पुनर्स्थापना: जहाँ रिमोट सेंसिंग एवं GIS (तकनीकी) क्षतिग्रस्त जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान करते हैं, वहीं वास्तविक पुनर्स्थापना तटीय बफर और आर्द्रभूमि पुनर्निर्माण के माध्यम से अधिक प्रभावी होती है।
      • ये प्राकृतिक फिल्टर बाढ़ के पानी का प्रबंधन कंक्रीट बाँधों या तटबंधों की तुलना में अधिक गतिशील तरीके से करते हैं।
    • मृदा सूक्ष्मजीव संवर्द्धन: उच्च-थ्रूपुट मेटाजीनोमिक अनुक्रमण (तकनीकी) क्षतिग्रस्त मृदा के सूक्ष्मजीव स्वास्थ्य का मानचित्रण कर विशिष्ट पोषक तत्त्वों की कमी की पहचान कर सकता है।
      • इस जानकारी का उपयोग बायो-ऑगमेंटेशन (NbS) लागू करने में किया जा सकता है, जिसमें स्थानीय फफूंद और बैक्टीरिया को पुनः स्थापित किया जाता है, जिससे प्राकृतिक नाइट्रोजन चक्र को पुनः सक्रिय किया जा सके तथा पौधों के दीर्घकालिक जीवित रहने को सुनिश्चित किया जा सके।

    जैव विविधता संरक्षण में पूरक भूमिका

    • जीनोमिक हस्तक्षेप: जलवायु-प्रेरित आवास हानि के कारण विलुप्ति के कगार पर पहुँची प्रजातियों के लिये CRISPR और आनुवंशिक मैपिंग (तकनीकी) कुछ वनस्पतियों एवं जीवों में जलवायु सहनशीलता विकसित करने में सहायक हो सकते हैं।
      • इसके बाद इन प्रजातियों को पुनर्स्थापित पारिस्थितिक गलियारों (NbS) में पुनः स्थापित किया जाता है, जिससे आनुवंशिक प्रवाह सुनिश्चित हो सके।
    • वन क्षेत्रों में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT): ध्वनिक सेंसर और कैमरा ट्रैप (तकनीकी) का उपयोग वास्तविक समय में जैव विविधता के स्वास्थ्य की निगरानी में सहायता करता है।
      • यह डेटा पुनर्वनीकरण/रीवाइल्डिंग परियोजनाओं (NbS) को दिशा देता है, जिससे पुनर्स्थापना के दौरान शिकारी-शिकार संतुलन बना रहे।
    • पर्यावरणीय DNA (eDNA) निगरानी: जल या मृदा के नमूनों में मौजूद आनुवंशिक पदार्थ के माध्यम से ‘अदृश्य’ या दुर्लभ प्रजातियों की पहचान के लिये नेक्स्ट-जनरेशन सीक्वेंसिंग (तकनीकी) का उपयोग किया जाता है।
      • यह उन्नत तकनीक गतिशील समुद्री संरक्षित क्षेत्रों या मौसमी आवासों (NbS) के निर्माण में सहायक होती है, जिनकी सीमाएँ प्रजातियों की वास्तविक प्रवासन उपस्थिति के अनुसार समायोजित की जाती हैं।

    इस अंतर्संबंध से जुड़े प्रमुख मुद्दे

    • ‘टेक्नो-फिक्स’ भ्रांति और शमन में विलंब: उच्च-तकनीकी कार्बन कैप्चर या ड्रोन-आधारित तीव्र वनीकरण पर अत्यधिक निर्भरता से एक तरह की संतुष्टि उत्पन्न हो सकती है, जिसमें हितधारक यह मानकर उत्सर्जन में कटौती को टाल देते हैं कि “प्रौद्योगिकी प्रकृति को ठीक कर देगी।”
      • इससे ‘शमन में विलंब’ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जहाँ पारिस्थितिक पुनर्स्थापना का उपयोग सामान्य रूप से जारी उत्सर्जन को जारी रखने के लिये एक आवरण के रूप में किया जाता है।
    • पारिस्थितिक सरलीकरण (एकल फसल का जोखिम): प्रौद्योगिकी प्राय: मानकीकरण को बढ़ावा देती है। ‘दक्षता’ के लिये ड्रोन के माध्यम से एक ही मज़बूत प्रजाति के लाखों बीज बोने से जैविक मरुस्थल बन सकते हैं।
      • ये ‘मानकीकृत वन’ स्थानीय पारिस्थितिक तंत्रों की संरचनात्मक एवं कार्यात्मक विविधता से वंचित होते हैं, जिससे वे कीटों और जलवायु आघातों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
    • डिजिटल विभाजन और डेटा उपनिवेशवाद: हालाँकि उपग्रह निगरानी और AI सटीकता प्रदान करते हैं, लेकिन ये अक्सर शक्ति को उन लोगों के हाथों में केंद्रीकृत कर देते हैं जो डेटा के मालिक होते हैं।
      • स्वदेशी और स्थानीय समुदाय, जो प्रकृति के प्रमुख संरक्षक हैं, तकनीकी क्षमता के अभाव में हाशिये पर जा सकते हैं, यदि वे अपनी भूमि के मूल्यांकन के लिये उपयोग किये जा रहे डिजिटल मानकों (जैसे कार्बन क्रेडिट) तक पहुँच या उनकी पुष्टि नहीं कर पाते।
    • बायो-इंजीनियरिंग के अनपेक्षित खतरे: जलवायु-सहिष्णु प्रजातियों के लिये CRISPR-आधारित आनुवंशिक मैपिंग जैसे हस्तक्षेप ‘प्रकृति को डिज़ाइन करने’ से जुड़े नैतिक प्रश्न उठाते हैं।
      •  जंगली वातावरण में आनुवंशिक रूप से परिवर्तित गुणों को शामिल करने से स्थानीय खाद्य शृंखलाओं और मूल आनुवंशिक संरचना पर अप्रत्याशित और व्यापक प्रभाव पड़ सकते हैं।

    नैतिक और प्रभावी एकीकरण सुनिश्चित करने के उपाय

    • ‘एथिकल-स्टैंडर्ड’ फ्रेमवर्क को अपनाना: भारत को IUCN के वैश्विक NbS मानकों को अपनाकर उनका स्थानीयकरण करना चाहिये, ताकि प्रत्येक तकनीक-आधारित परियोजना के लिये अनिवार्य ‘पारिस्थितिक अखंडता ऑडिट’ की जाए।
      • कोई भी परियोजना केवल ‘हरित आवरण’ (मात्रा) बढ़ाने के आधार पर स्वीकृत न हो, जब तक कि ‘स्थानीय प्रजातियों की विविधता’ (गुणवत्ता) में समान वृद्धि न हो।
    • ‘कम्युनिटी-फर्स्ट’ तकनीकी क्षमता निर्माण: डिजिटल विभाजन को कम करने के लिये तकनीक का उपयोग स्थानीय ज्ञान को सशक्त बनाने के लिये होना चाहिये, न कि उसे प्रतिस्थापित करने के लिये।
      • भागीदारी आधारित PGIS को लागू किया जाए, जिसमें स्थानीय समुदाय मोबाइल ऐप्स के माध्यम से अपनी पारंपरिक सीमाओं और पारिस्थितिक अवलोकनों का मानचित्रण करें और इस ‘नीचे से ऊपर’ डेटा को ‘ऊपर से नीचे’ उपग्रह चित्रों के साथ एकीकृत किया जाए।
    • वित्तीय सुरक्षा और ‘लाभ-साझाकरण’: आर्थिक दबाव (जहाँ गरीब लोग तकनीक-आधारित क्रेडिट के लिये अपनी प्राकृतिक संपदा ‘बेचने’ को मज़बूर होते हैं) को रोकने के लिये—
      • एक नेशनल नेचर-क्रेडिट फंड स्थापित किया जाए, जो यह सुनिश्चित करे कि तकनीकी रूप से सत्यापित कार्बन/जैव विविधता क्रेडिट से होने वाली आय का एक निश्चित प्रतिशत सीधे स्थानीय ग्राम सभाओं और स्वदेशी परिषदों तक पहुँचे।
    • हाइब्रिड निगरानी प्रणाली: डिजिटल मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन (MRV) की ओर बढ़ते हुए विभिन्न डेटा स्रोतों को जोड़ा जाए।
      • प्रजातियों की उपस्थिति की पुष्टि के लिये eDNA (पर्यावरणीय DNA) का उपयोग किया जाए और बहाली के दावों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिये ब्लॉकचेन तकनीक को अपनाया जाए।

    निष्कर्ष:

    प्रकृति-आधारित समाधान वह अनुकूलन और जैव विविधता प्रदान करते हैं, जिसकी कमी तकनीक में होती है, जबकि तकनीक वह विस्तार और सटीकता प्रदान करती है, जिसकी आवश्यकता प्राकृतिक प्रक्रियाओं को वर्तमान जलवायु परिवर्तन की तीव्र गति से निपटने के लिये होती है।