• प्रश्न :

    प्रश्न. प्लेट विवर्तनिकी ने पृथ्वी की सतही प्रक्रियाओं के बारे में हमारी समझ को मूल रूप से बदल दिया है। प्रमुख भू-वैज्ञानिक विशेषताओं की व्याख्या करने में इसकी भूमिका पर चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    09 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भूगोल

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत का संक्षेप में वर्णन करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह समझाएँ कि विभिन्न प्लेट सीमाओं - अभिसारी, अपसारी और रूपांतरण सीमाओं के परस्पर क्रियाओं के साथ-साथ अंतः-प्लेट हॉटस्पॉट गतिविधि किस प्रकार प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताओं के निर्माण का कारण बनती है।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    1960 के दशक से पहले, पृथ्वी की सतह को मुख्यतः स्थिर मॉडलों या महाद्वीपीय विस्थापन जैसी खंडित अवधारणाओं के माध्यम से समझा जाता था। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत (मैकेन्ज़ी, पार्कर और मॉर्गन) के आगमन ने एक गतिशील पृथ्वी मॉडल प्रस्तुत करके हमारी समझ को मूल रूप से बदल दिया।

    • यह व्यापक और एकीकृत सिद्धांत प्लेट सीमाओं पर होने वाली परस्पर क्रियाओं के माध्यम से पृथ्वी की सतह पर लगभग सभी प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताओं की उत्पत्ति, वितरण तथा विकास को सरलता से स्पष्ट करता है।

    मुख्य भाग: 

    प्रमुख भू-आकृतिक विशेषताओं की व्याख्या में प्लेट विवर्तनिकी की भूमिका

    पृथ्वी की विविध भू-आकृतिक विशेषताओं को तीन प्रमुख प्रकार की प्लेट सीमाओं तथा अंतः-प्लेट गतिविधियों के माध्यम से व्यवस्थित रूप से समझाया जा सकता है।

    • अभिसारी सीमाएँ (विनाशकारी किनारे)
      • यहाँ प्लेटें आपस में टकराती हैं, जिससे भूपर्पटी का विनाश होता है और तीव्र संपीडन बल उत्पन्न होते हैं। निर्मित होने वाली भू-आकृतियाँ प्लेटों के प्रकार पर आधारित होती हैं:
        • महाद्वीपीय–महाद्वीपीय (C-C) अभिसरण: जब दो कम घनत्व वाली महाद्वीपीय प्लेटें टकराती हैं तो कोई भी आसानी से अधःसरण (Subduct) नहीं करती। इसके बजाय भूपर्पटी मुड़ जाती है और ऊपर की ओर उठती है, जिससे विशाल वलित पर्वत बनते हैं।
          • उदाहरण: भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों के टकराव से हिमालय का निर्माण हुआ।
        • महासागरीय–महाद्वीपीय (O-C) अभिसरण: अधिक घनत्व वाली महासागरीय प्लेट, हल्की महाद्वीपीय प्लेट के नीचे अधःसरण करती है।
          • इस प्रक्रिया से अधःसरण क्षेत्र में गहरे समुद्री गर्त बनते हैं और पिघलती हुई प्लेट से ऊपर उठते मैग्मा के कारण महाद्वीपीय ज्वालामुखीय पर्वत शृंखलाएँ बनती हैं।
          • उदाहरण: पेरू–चिली गर्त (नाज़्का प्लेट का दक्षिण अमेरिकी प्लेट के नीचे जाना)।
        • महासागरीय–महासागरीय (O-O) अभिसरण: इसमें पुरानी और अधिक घनत्व वाली महासागरीय प्लेट अधःसरण करती है।
          • इससे समुद्र के भीतर गर्त का निर्माण होता है और समुद्र तल पर मैग्मा का उद्गार होता है, जो अंततः सतह को भेदकर ज्वालामुखीय द्वीप-चाप बनाता है।
          • उदाहरण: मारियाना गर्त।
    • अपसारी सीमाएँ (निर्माणात्मक किनारे)
      • यहाँ प्लेटें एक-दूसरे से दूर खिसकती हैं, जो ऊपर उठती हुई मेंटल संवहन धाराओं द्वारा संचालित होती हैं। इस प्रक्रिया में नई भूपर्पटी का निरंतर निर्माण होता रहता है।
        • मध्य-महासागरीय रिज (MORs): महासागरीय स्थलमंडल में प्लेटों के अलग होने से मैग्मा ऊपर उठता है और ठोस होकर निरंतर जलमग्न पर्वत शृंखलाओं का निर्माण करता है, जिससे समुद्री तल का प्रसार होता है।
          • उदाहरण: मिड-अटलांटिक रिज, जो आर्कटिक से दक्षिणी महासागर तक फैली हुई है।
        • रिफ्ट घाटियाँ (Rift Valleys): जब किसी महाद्वीपीय प्लेट पर तनाव बल कार्य करते हैं और वह अलग होने लगती है तो भूपर्पटी पतली होकर भ्रंशित हो जाती है तथा नीचे धॅंसकर एक रेखीय घाटी का निर्माण करती है।
          • उदाहरण: ग्रेट अफ्रीकन रिफ्ट वैली, जो भविष्य में जल से भरकर एक नए महासागर बेसिन का रूप ले सकती है।
    • रूपांतरण सीमाएँ (संरक्षणात्मक किनारे)
      • इन सीमाओं पर प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर क्षैतिज रूप से खिसकती हैं। यहाँ न तो भूपर्पटी का निर्माण होता है और न ही उसका विनाश।
        • रूपांतरण भ्रंश (Transform Faults): खिसकती हुई प्लेटों के बीच तीव्र घर्षण के कारण भारी तनाव संचित होता है, जो समय-समय पर शक्तिशाली, उथले-केंद्र भूकंपों के रूप में मुक्त होता है। यद्यपि ये पर्वत या ज्वालामुखी का निर्माण नहीं करते, लेकिन ये स्पष्ट रेखीय स्थलाकृतिक निशान और जल निकासी तंत्र में विस्थापन उत्पन्न करते हैं।
        • उदाहरण: कैलिफोर्निया का सैन एंड्रियास भ्रंश।
    • अंतः-प्लेट विशेषताएँ (हॉटस्पॉट)
      • यद्यपि प्लेट विवर्तनिकी मुख्य रूप से प्लेट सीमाओं पर केंद्रित है, यह मेंटल प्लूम की अवधारणा को भी शामिल करती है, जिससे प्लेट सीमाओं से दूर स्थित भू-आकृतियों की व्याख्या की जा सके।
        • जब कोई विवर्तनिक प्लेट एक स्थिर, अत्यधिक उष्ण मेंटल प्लूम (हॉटस्पॉट) के ऊपर से निरंतर गति करती है तो क्रमिक रूप से ज्वालामुखियों की एक शृंखला बनती जाती है।
        • उदाहरण: हवाई द्वीप समूह, जहाँ सक्रिय हॉटस्पॉट से दूरी बढ़ने के साथ द्वीपों की आयु भी क्रमशः बढ़ती जाती है।

    निष्कर्ष

    प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत वह ‘वर्णमाला’ है, जिसके माध्यम से पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास को लिखा जाता है। यह वलित पर्वतों, महासागरीय बेसिनों, रिफ्ट घाटियों तथा भूकंपीय और ज्वालामुखीय क्षेत्रों (जैसे प्रशांत महासागर की ‘रिंग ऑफ फायर’) के वैश्विक वितरण की व्यापक व्याख्या करता है। इसके माध्यम से भूविज्ञान एक वर्णनात्मक विज्ञान से विकसित होकर गहन विश्लेषणात्मक और पूर्वानुमानात्मक विज्ञान बन गया।