• प्रश्न :

    प्रश्न. औपनिवेशिक शासन ने भारतीय कला और सांस्कृतिक संस्थानों की दिशा को बदल दिया। इस अवधि में उत्पन्न विघटन और नई संभावनाओं दोनों का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)

    09 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृति

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत इस संक्षिप्त व्याख्या से कीजिये कि किस प्रकार औपनिवेशिक काल ने भारतीय कला को पारंपरिक संरक्षण प्रणाली से बदलकर पश्चिमी प्रभाव वाले संस्थागत ढाँचे में परिवर्तित कर दिया।
    • मुख्य भाग में दोनों आयामों का विश्लेषण कीजिये:
    • पारंपरिक कलात्मक संरचनाओं और शिल्पों का पतन तथा
    • औपनिवेशिक शासन के दौरान उभरने वाली नई कलात्मक संस्थाएँ, शैलियाँ और माध्यम।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत में औपनिवेशिक काल एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था, जिसने भारतीय कला को पारंपरिक, दरबारी संरक्षण प्राप्त ‘कारखानों’ से हटाकर अधिक संस्थागत और पश्चिम-केंद्रित ढाँचे की ओर परिवर्तित कर दिया। यह काल ‘सौंदर्यबोध के टकराव’ से चिह्नित था, जिसने एक ओर स्वदेशी शैलियों को हाशिये पर धकेला और दूसरी ओर आधुनिक भारतीय पहचान को जन्म दिया।

    मुख्य भाग: 

    मुख्य विघटन: परंपरा का क्षरण

    • पारंपरिक संरक्षण का पतन: मुगल साम्राज्य के पतन और क्षेत्रीय रियासतों के अधीन होने से संरक्षण व्यवस्था में बड़ा खालीपन उत्पन्न हुआ। पारंपरिक दरबारी चित्रकारों, संगीतकारों तथा  कारीगरों ने अपनी आय और सामाजिक प्रतिष्ठा का मुख्य स्रोत खो दिया।
    • स्वदेशी शिल्पों का पतन: किफायती, मशीन से बने ब्रिटिश उत्पादों (विशेषकर वस्त्र) के आगमन से भारतीय हस्तशिल्पों का व्यवस्थित रूप से अवनयन हुआ।
      • निपुण बुनकरों और कारीगरों को कृषि की ओर मज़बूर होना पड़ा, जिससे पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही कौशल परंपरा का ह्रास हुआ।
    • पश्चिमी सौंदर्यबोध का आरोपण: ब्रिटिश प्रशासक प्राय: भारतीय कला को ओरिएंटलिस्ट दृष्टिकोण से देखते थे और पारंपरिक भारतीय कला (जिसमें पश्चिमी यथार्थवाद और परिप्रेक्ष्य का अभाव था) को ‘आदिम’ या केवल ‘शिल्प’ मानते थे, न कि ललित कला।
    • सांस्कृतिक विरासत का अपहरण: अनेक मूल्यवान सांस्कृतिक वस्तुएँ, मूर्तियाँ और पांडुलिपियाँ (जैसे अमरावती मार्बल्स और कोह-ए-नूर) अपने मूल संदर्भों से हटाकर ब्रिटिश संग्रहालयों में भेज दी गईं, जिससे स्थानीय सांस्कृतिक निरंतरता बाधित हुई।

    नई संभावनाएँ और परिवर्तन

    • ‘कंपनी शैली’ (कंपनी कलम) का उद्भव: जब कुछ भारतीय कलाकारों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों से संरक्षण प्राप्त करने का प्रयास किया तो एक नई मिश्रित (संकर) शैली विकसित हुई।
      • इसमें पारंपरिक भारतीय लघु चित्रकला तकनीकों के साथ पश्चिमी तत्त्वों जैसे रेखीय परिप्रेक्ष्य और जलरंग का समावेश हुआ, जो मुख्यतः भारतीय वनस्पति, जीव-जंतुओं एवं व्यवसायों का चित्रण करती थी।
    • सांस्कृतिक संस्थाओं की स्थापना: ब्रिटिशों ने औपचारिक संस्थागत ढाँचा प्रस्तुत किया, जिससे कला और विरासत संरक्षण को संगठित रूप मिला—
      • कला विद्यालय: मद्रास स्कूल ऑफ आर्ट (1850) और बंबई का जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट (1857) जैसे संस्थानों की स्थापना की गई।
      • संग्रहालय और सोसायटी: कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (1784) और इंडियन म्यूज़ियम (1814) ने भारतीय इतिहास तथा प्राचीन वस्तुओं के व्यवस्थित अध्ययन, अनुवाद एवं सूचीकरण की शुरुआत की।
      • भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI): वर्ष 1861 में अलेक्ज़ेंडर कनिंघम द्वारा स्थापित ASI ने सिंधु घाटी सभ्यता जैसी खोई हुई विरासत के उत्खनन और संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • नए माध्यमों का परिचय: तैल रंग, कैनवास और मुद्रण प्रेस के आगमन ने कला को अधिक जनसुलभ बना दिया। राजा रवि वर्मा ने पश्चिमी तैल चित्रकला तकनीकों में महारत हासिल कर भारतीय पौराणिक विषयों का चित्रण किया और ओलियोग्राफी प्रेस के माध्यम से अपनी कला को आम जनता तक पहुँचाया।
    • स्थापत्य का समन्वय: औपनिवेशिक काल में इंडो-सरसेनिक स्थापत्य शैली का विकास हुआ, जिसमें पश्चिमी गोथिक तत्त्वों के साथ भारतीय (हिंदू और मुगल) विशेषताएँ जैसे गुंबद, छतरियाँ और मेहराबों का समावेश किया गया (जैसे गेटवे ऑफ इंडिया)।
    • राष्ट्रवादी कला के लिये प्रेरक: पश्चिमी अकादमिक कला के थोपे जाने के परिणामस्वरूप राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई।
      • अबनींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं ने पश्चिमी भौतिकवाद को अस्वीकार किया और बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट की स्थापना की, जो स्वदेशी आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ था।

    निष्कर्ष

    औपनिवेशिक शासन दोधारी तलवार के समान था। एक ओर इसने अनेक स्वदेशी शिल्पों और पारंपरिक गिल्ड (श्रेणियों) के दर्दनाक पतन का कारण बना, वहीं दूसरी ओर इसने ऐसे संस्थागत ढाँचे, कला विद्यालय, दीर्घाएँ (गैलरी) और मुद्रण माध्यम प्रदान किये, जिनसे भारतीय कला का आधुनिकीकरण संभव हुआ। अंततः ब्रिटिश अकादमिक यथार्थवाद और भारतीय परंपरा के बीच का संघर्ष राष्ट्रवादी कला आंदोलन के लिये प्रेरक बना, जिसने वर्ष 1947 के बाद के भारत में दिखाई देने वाले विविध एवं जीवंत आधुनिकतावाद को जन्म दिया।