प्रश्न: ऊर्जा परस्पर-निर्भरता और प्रवासी भारतीयों से प्राप्त विप्रेषण लंबे समय से पश्चिम एशिया के साथ भारत की संलग्नता का आधार रहे हैं। विवेचना कीजिये कि उभरते भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण और क्षेत्रीय संघर्ष इस क्षेत्र में भारत की सामरिक स्वायत्तता को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। (250 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत ऊर्जा सुरक्षा और विप्रेषण के संदर्भ में पश्चिम एशिया के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में उभरते भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण और क्षेत्रीय संघर्षों के भारत की सामरिक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण कीजिये।
- इसके बाद सुझाव दीजिये कि संघर्ष की स्थिति में भारत अपने हितों को कैसे सुनिश्चित कर सकता है।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
|
परिचय:
भारत अपनी LNG आपूर्ति का 90% से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया से खरीदता है, जबकि लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी विप्रेषण (Remittances) के माध्यम से महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं।
इस संदर्भ में, हालिया इज़राइल–ईरान संघर्ष और संयुक्त राज्य अमेरिका से जुड़े बढ़ते तनाव यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र की अस्थिरता सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा तथा आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती है।
मुख्य भाग:
भारत की सामरिक अर्थव्यवस्था पर उभरते भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण और क्षेत्रीय संघर्षों के प्रभाव:
हालिया क्षेत्रीय तनाव, जिनमें इज़राइल–ईरान के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव और लाल सागर शिपिंग संकट शामिल हैं, ने भारत की पारंपरिक ‘डी-हाइफेनेटेड’ कूटनीति पर अभूतपूर्व दबाव डाला है।
- ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ सिद्धांत पर दबाव: प्रॉक्सी युद्धों से हटकर इज़राइल और ईरान जैसे साझेदार देशों के बीच प्रत्यक्ष राज्य-से-राज्य संघर्ष ने भारत को एक शून्य-योग कूटनीतिक स्थिति में ला खड़ा किया है, जिससे ‘सभी के मित्र’ बने रहना कठिन हो जाता है, बिना किसी एक पक्ष को नाराज़ किये।
- कनेक्टिविटी मेगा-प्रोजेक्ट्स में बाधा: भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) का स्थलीय घटक सुरक्षा जोखिमों के कारण ठप पड़ गया है, जिससे भारत को अधिक लंबी और महॅंगी समुद्री मार्गों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
- समुद्री सुरक्षा दुविधा: लाल सागर और अदन की खाड़ी में हौती हमलों (Houthi attacks) के चलते भारतीय नौसेना की बड़े पैमाने पर तैनाती (ऑपरेशन संकल्प) आवश्यक हो गई है।
- यह भारत को ‘नेट सुरक्षा प्रदाता’ के रूप में प्रदर्शित करता है, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय शक्तियों के विरुद्ध पश्चिम-नेतृत्व वाले व्यापक सैन्य गठबंधन में खिंच जाने का जोखिम भी बढ़ाता है।
- प्रवासी भारतीयों और विप्रेषण की संवेदनशीलता: खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के प्रमुख क्षेत्रों (यूएई/सऊदी अरब) में किसी भी लंबे संघर्ष से भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
- वर्ष 1990 जैसी बड़े पैमाने पर निकासी की स्थिति न केवल एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती होगी, बल्कि विप्रेषण प्रवाह में तत्काल गिरावट भी ला सकती है।
- ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता और मुद्रास्फीति: ऊर्जा अवसंरचना या होरमुज जलडमरूमध्य पर सीधे हमले तेल की कीमतों में ‘भय प्रीमियम’ बढ़ा देते हैं।
- ICRA की एक रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि भारत के चालू खाते के घाटे (CAD) को लगभग 30–40 बेसिस पॉइंट तक बढ़ा सकती है।
संघर्ष की स्थिति में हितों की सुरक्षा के लिये रणनीतियाँ
- ‘पूर्वी गलियारे’ का संचालन: भारत को IMEC के ‘भारत-से-खाड़ी’ खंड को प्राथमिकता देनी चाहिये, जिसमें UAE और सऊदी अरब के साथ डिजिटल तथा ऊर्जा ग्रिड कनेक्टिविटी पर ध्यान दिया जाए, ताकि लेवांत क्षेत्र की अस्थिरता के बावजूद अवसंरचना प्रगति जारी रह सके।
- ऊर्जा स्रोतों का रणनीतिक विविधीकरण: रूस, अमेरिका और ब्राज़ील के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों को बढ़ाकर ‘अलोचनीय निर्भरता’ को कम करना चाहिये, साथ ही सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का तेज़ी से विस्तार करना आवश्यक है।
- गैर-डॉलर व्यापार तंत्र का उपयोग: स्थानीय मुद्रा निपटान (LCS) प्रणालियों का विशेष रूप से GCC देशों के साथ विस्तार कर व्यापार और विप्रेषण को पश्चिमी प्रतिबंधों या वैश्विक बैंकिंग व्यवधानों से सुरक्षित किया जा सकता है।
- ‘I2U2’ खाद्य और तकनीकी गलियारों को आगे बढ़ाना: I2U2 (भारत-इज़राइल-UAE-अमेरिका) के माध्यम से ‘गैर-सुरक्षा’ सहयोग पर ध्यान केंद्रित करते हुए फूड पार्क और नवीकरणीय ऊर्जा क्लस्टर विकसित किये जाएँ, जिससे ‘साझा हितों का समुदाय’ बने, जो सैन्य टकराव से कम प्रभावित हो।
- स्वायत्त नौसैनिक एस्कॉर्ट संचालन: अरब सागर में एक दृश्यमान लेकिन स्वतंत्र नौसैनिक उपस्थिति बनाए रखते हुए भारतीय ध्वज वाले जहाजों की सुरक्षा की जाए, बिना औपचारिक रूप से अमेरिका-नेतृत्व वाले टास्क फोर्स में शामिल हुए, जिससे क्षमता और तटस्थता दोनों का संकेत मिले।
निष्कर्ष:
भारत की पश्चिम एशिया नीति एक ‘कठिन परीक्षा’ से गुजर रही है, जहाँ ऊर्जा और श्रम के पारंपरिक स्तंभ अब प्रौद्योगिकी, कॉरिडोर और उच्च-तीव्रता वाले संघर्षों की नई वास्तविकताओं के कारण पुनः आकार ले रहे हैं। यद्यपि क्षेत्रीय पुनर्संरेखण भारत को पक्षपातपूर्ण गुटों में खींचने का खतरा उत्पन्न करते हैं, फिर भी नई दिल्ली की रणनीतिक स्वायत्तता के प्रति प्रतिबद्धता एक महत्त्वपूर्ण आधार के रूप में कार्य करती है।