• प्रश्न :

    प्रश्न: सामाजिक न्याय के लिये केवल आर्थिक पुनर्वितरण ही नहीं, बल्कि सामाजिक मान्यता और सशक्तीकरण भी आवश्यक है। चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    10 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 सामाजिक न्याय

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत सामाजिक न्याय का संक्षिप्त परिचय देकर कीजिये।
    • सामाजिक न्याय को आर्थिक पुनर्वितरण (भौतिक आयाम) के रूप में समझाते हुए तर्क प्रस्तुत कीजिये।
    • सामाजिक न्याय को सामाजिक मान्यता (सांस्कृतिक आयाम) के रूप में समझाते हुए तर्क दीजिये।
    • अंत में दोनों के परस्पर संबंध (अंतर्संबंध) का विश्लेषण कीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    सामाजिक न्याय एक लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है, जो यह सुनिश्चित करता है कि पंक्ति के ‘अंतिम व्यक्ति’ को न केवल भोजन मिले, बल्कि उसे सुना और सम्मानित भी किया जाए। भारतीय संदर्भ में, जैसा कि डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर द्वारा परिकल्पित किया गया था, सामाजिक न्याय एक त्रिस्तरीय लक्ष्य है: स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व।

    मुख्य भाग: 

    आर्थिक पुनर्वितरण: भौतिक आयाम

    • गरीबी को अमर्त्य सेन ने ‘क्षमता वंचना’ बताया है। भौतिक संसाधनों के अभाव में व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा या पोषण तक पहुँच नहीं बना पाता।
    • भारतीय हस्तक्षेप:
      • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT): कल्याणकारी योजनाओं में रिसाव (लीकेज) को समाप्त करना।
      • मनरेगा (MGNREGA): ग्रामीण क्षेत्रों में ‘कार्य का अधिकार’ और आय सुरक्षा प्रदान करना।
      • भूमि सुधार: संपत्ति के सामंती केंद्रीकरण को तोड़ने के ऐतिहासिक प्रयास।
    • सीमाएँ: केवल धन किसी व्यक्ति की ‘सामाजिक स्थिति’ को नहीं बदल सकता। हाशिये पर स्थित समुदाय से आने वाला एक संपन्न व्यक्ति भी आवास या सामाजिक संबंधों में भेदभाव का सामना कर सकता है।

    सामाजिक मान्यता: सांस्कृतिक आयाम

    • न्याय तब अधूरा रह जाता है जब कानून आपकी संपत्ति की रक्षा करता है, लेकिन समाज आपकी पहचान का अपमान करता है। इसके लिये ‘अस्पृश्यता का उन्मूलन’ (अनुच्छेद 17) और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा आवश्यक है।
    • मुख्य पहलू:
      • दान नहीं, गरिमा: सामाजिक न्याय कोई ‘खैरात’ नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक के समान नैतिक मूल्य की स्वीकृति से जुड़ा है।
      • कलंक के विरुद्ध संघर्ष: उदाहरण के लिये, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि ‘निहित गरिमा के सम्मान’ पर भी बल देता है।
      • समावेशी कथाएँ: जनजातीय समुदायों के इतिहास और योगदान (जनजातीय गौरव दिवस) को मान्यता देना आवश्यक है, ताकि उन्हें केवल ‘लाभार्थी’ नहीं, बल्कि विकास के ‘साझेदार’ के रूप में देखा जाए।

    सामाजिक सशक्तीकरण: राजनीतिक/एजेंसी आयाम

    • शक्ति का विकेंद्रीकरण आवश्यक है। न्याय तब सुनिश्चित होता है जब हाशिये पर स्थित समूहों के पास अपने भविष्य को स्वयं निर्धारित करने की ‘एजेंसी’ (स्वायत्त निर्णय-क्षमता) होती है।
    • भारतीय तंत्र:
      • 73वाँ और 74वाँ संशोधन: पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिये सीटों का आरक्षण कर, सत्ता को स्थानीय स्तर तक पहुँचाना।
      • स्वयं सहायता समूह (SHGs): कुदुंबश्री जैसे मॉडल महिलाओं को ‘सामाजिक पूंजी’ और निर्णय लेने की शक्ति विकसित कर सशक्त बनाते हैं।
      • शैक्षिक सशक्तीकरण: शिक्षा का अधिकार (RTE) सशक्तीकरण का ‘गुणक’ बनकर कार्य करता है, जो सामाजिक गतिशीलता को संभव बनाता है।

    अंतर्संबंध:

    • मान्यता के बिना पुनर्वितरण: ‘कल्याणकारी पितृसत्तात्मकता’ की ओर ले जाता है, जहाँ लोगों को भोजन तो मिलता है, लेकिन वे फिर भी अपमानित होते हैं (जैसे कुछ ग्रामीण स्कूलों में मध्याह्न भोजन होने के बावजूद पानी के लिये अलग गिलास रखना)।
    • पुनर्वितरण के बिना मान्यता: ‘प्रतीकात्मकता’ की ओर ले जाता है, जहाँ पहचान का सम्मान तो किया जाता है, लेकिन व्यक्ति अत्यधिक गरीबी में ही रहता है।
    • सशक्तीकरण के बिना पुनर्वितरण: ‘निर्भरता’ उत्पन्न करता है, जहाँ हाशिये पर स्थित लोग अपने अधिकारों के बजाय राज्य की इच्छा पर निर्भर रहते हैं।

    निष्कर्ष

    जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत @ 2047’ की ओर बढ़ रहा है, ध्यान केवल ‘नीति’ (संस्थागत नियमों) से हटकर ‘न्याय’ (वास्तविक रूप से प्राप्त न्याय) पर केंद्रित होना चाहिये। सामाजिक न्याय को एक समग्र परियोजना के रूप में देखना आवश्यक है, जिसमें आर्थिक आधार सुनिश्चित किये जाएँ, सामाजिक बाधाएँ (भेदभाव) तोड़ी जाएँ और राजनीतिक अवसरों के द्वार खोले जाएँ। तभी हम ‘जीवित रहने वाले समाज’ से आगे बढ़कर ‘उपलब्धि हासिल करने वाले राष्ट्र’ की ओर अग्रसर हो सकते हैं।