प्रश्न. राजनीतिक सत्ता में परिवर्तन, आर्थिक अधिशेष के स्वरूप में बदलाव तथा संस्थागत संरक्षण के बदलते स्वरूप ने भारत में दरबारी परंपराओं से समुदाय-आधारित कला रूपों की ओर कलात्मक अभिव्यक्ति को किस प्रकार रूपांतरित किया? परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत इस बात को रेखांकित करते हुए कीजिये कि संस्थाएँ किस प्रकार कलात्मक अभिव्यक्तियों के रूपांतरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि राजनीतिक सत्ता, आर्थिक अधिशेष के स्वरूप और संस्थागत संरक्षण में परिवर्तन ने किस प्रकार दरबार-केंद्रित परंपराओं को समुदाय-आधारित कला रूपों में परिवर्तित किया।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
भारतीय कला का विकास कलाकारों और उनके संरक्षकों के बीच बदलते संबंधों को दर्शाता है। राजदरबारों एवं मंदिरों से लेकर आधुनिक राज्य संस्थाओं और कॉरपोरेट फाउंडेशनों तक, इन संरक्षकों ने कलात्मक विषयों, माध्यमों तथा पैमाने को आकार दिया है। इसके परिणामस्वरूप कला धीरे-धीरे विशिष्ट/अभिजात्य स्थानों से निकलकर अधिक सहभागी और समुदाय-केंद्रित क्षेत्रों की ओर अग्रसर हुई है।
मुख्य भाग:
राजनीतिक सत्ता में परिवर्तन
राजशाही या औपनिवेशिक शासन से लोकतांत्रिक और संघीय संरचना की ओर संक्रमण ने भारतीय कला के ‘नियंत्रण केंद्रों’ को मूलतः विकेंद्रीकृत कर दिया।
- राजकीय संरक्षण से लोकतांत्रिक जनता तक: राजशाही के अधीन, कला ‘शक्ति के प्रभाव’ (Aura of Power) की सेवा करती थी (जैसे: मुगल लघु चित्रकला या चोल कांस्य मूर्तियाँ)।
- गणतंत्र के आगमन के साथ, ध्यान सार्वजनिक कला और उन स्मारकों की ओर स्थानांतरित हो गया जो किसी शासक की वंशावली के बजाय ‘आम आदमी’ की सामूहिक पहचान का उत्सव मनाते हैं।
- क्षेत्रीय राजनीतिक दावे: क्षेत्रीय राजनीतिक दलों और राज्य-आधारित सांस्कृतिक विभागों (जैसे साहित्य और ललित कला अकादमियाँ) के उदय ने देशज सौंदर्यशास्त्र (Vernacular Aesthetics) को पुनर्जीवित किया है।
- स्थानीय लोक रूपांकन, जिन्हें कभी केंद्रीय शाही दरबारों द्वारा हाशिये पर धकेल दिया गया था, अब क्षेत्रीय गौरव और राज्य की पहचान के प्रतीकों के रूप में उन्नत किये गए हैं।
- सौंदर्यबोध का वि-औपनिवेशीकरण: स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक नेतृत्व ने ‘कंपनी स्कूल’ (ब्रिटिश कालीन कला शैली) के प्रभाव को त्यागने का प्रयास किया।
- इसके परिणामस्वरूप स्वदेशी आधुनिकतावाद की ओर एक सचेत कदम बढ़ाया गया, जहाँ समुदाय-आधारित तकनीकों (जैसे कालीघाट या मधुबनी) को मुख्यधारा के राष्ट्रीय विमर्श में फिर से एकीकृत किया गया।
- सॉफ्ट पावर और वैश्विक कूटनीति: आधुनिक राजनीतिक सत्ता समुदाय-आधारित कला रूपों का उपयोग ‘सांस्कृतिक राजदूतों’ के रूप में करती है।
- भारत में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों ने विविध जनजातीय और लोक शिल्पों (जैसे वारली) का प्रदर्शन किया, जिससे कला महलों से निकलकर वैश्विक राजनयिक मंच तक पहुँच गई है।
आर्थिक अधिशेष के प्रतिरूप
कला के वित्तपोषण में ‘कौन’ और ‘कैसे’ जैसे प्रश्न यह निर्धारित करते रहे हैं कि कला कुछ लोगों के लिये एक परिष्कृत विलासिता बनी रहेगी या फिर अनेक लोगों के लिये साझा संसाधन बनेगी।
- कला बाज़ारों का लोकतंत्रीकरण: संपत्ति का संकेंद्रण, जो पहले भू-राजस्व (ज़मींदारी/राजशाही) पर आधारित था, अब मध्यम वर्ग के पास उपलब्ध अधिशेष में बदल गया है। इससे किफायती और पुनरुत्पादनीय कला के लिये एक नया बाज़ार तैयार हुआ है।
- इससे समुदाय-आधारित शिल्प समूहों को डिजिटल मंचों के माध्यम से सीधे शहरी उपभोक्ताओं तक पहुँचने का अवसर मिला।
- CSR और परोपकार: आधुनिक आर्थिक अधिशेष को प्राय: कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के माध्यम से संचालित किया जाता है।
- बड़ी कंपनियाँ अब ‘शिल्प ग्राम’ (Craft Villages) और सामुदायिक उत्सवों को वित्तपोषित करती हैं, जिससे ध्यान व्यक्तिगत उत्कृष्ट कृतियों से हटकर पूरे कारीगर समुदायों की स्थायी आजीविका पर केंद्रित हो गया है।
- लोक परंपराओं का व्यावसायीकरण: वैश्विक मांग के कारण कर्मकांडीय सामुदायिक कला (जैसे: गोंड कला) का व्यावसायिक डिज़ाइन में रूपांतरण हुआ है।
- इस आर्थिक बदलाव ने सामुदायिक दीवारों को वैश्विक बाज़ार के लिये कैनवास और कागज़ में बदल दिया है।
- कला की ‘गिग इकोनॉमी’: स्वतंत्र क्राउडफंडिंग और डिजिटल संरक्षण (जैसे: पेट्रियन, सोशल मीडिया) के उदय ने कलाकारों को पारंपरिक ‘द्वारपालों’ से बचने का मौका दिया है।
- समुदाय-आधारित कला अब सीधे ‘जनता’ द्वारा वित्तपोषित होती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि कला के विषय दरबारी चापलूसी के बजाय सामाजिक वास्तविकता से जुड़े रहें।
संस्थागत संरक्षण में परिवर्तन
‘कला के संरक्षक’ की अवधारणा के विकास ने यह भी बदल दिया है कि कला किस भौतिक और सामाजिक स्थान में अस्तित्व रखती है।
- राजसी कार्यशालाओं से खुले संग्रहालयों तक: पारंपरिक संरक्षण महल की दीवारों के भीतर 'कारखानों' (कार्यशालाओं) में होता था।
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय जैसे आधुनिक संस्थान ‘जीवंत संग्रहालयों’ पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जहाँ सामुदायिक कलाकार सार्वजनिक स्थानों पर अपने शिल्प का प्रदर्शन करते हैं।
- द्विवार्षिकी और कला मेलों का उदय: संस्थागत संरक्षण अब कोच्चि-मुज़िरिस बिनेले (Kochi-Muziris Biennale) जैसे विशाल आयोजनों की ओर बढ़ गया है।
- ये मंच सार्वजनिक विरासत स्थलों का उपयोग करके और स्थापना प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों को शामिल करके कला का लोकतंत्रीकरण करते हैं, जिससे पारंपरिक ‘व्हाइट क्यूब’ गैलरी संस्कृति की सीमाएँ टूटती हैं।
- डिजिटल अभिलेखागार और आभासी संरक्षण: भारतीय संग्रहालयों के साथ गूगल आर्ट्स एंड कल्चर जैसी साझेदारियों ने कला को भौतिक संग्रहों से निकालकर डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र तक पहुँचा दिया है।
- NFT के उदय सहित यह ‘डिजिटल संरक्षण’ यह सुनिश्चित करता है कि समुदाय-आधारित कला रूप प्रलेखित हों और वैश्विक ‘डिजिटल समुदाय’ के लिये सुलभ हों।
- शिल्प का अकादमिक एकीकरण: औपचारिक डिज़ाइन पाठ्यक्रमों में पारंपरिक लोक कलाओं को शामिल करने से सामुदायिक ज्ञान को संस्थागत बना दिया गया है।
- इसने ‘गुरु-शिष्य’ मॉडल को एक बंद दरबारी रहस्य से बदलकर एक व्यवस्थित और समुदाय-साझा व्यावसायिक कौशल में परिवर्तित कर दिया है।
निष्कर्ष:
दरबारी-केंद्रित कला से समुदाय-आधारित कला की ओर यह संक्रमण भारत की एक 'प्रजा' के युग से 'नागरिकों' के युग तक की व्यापक यात्रा को दर्शाता है। जहाँ दरबारी परंपराएँ राजाओं के ‘दैवीय अधिकार’ को प्रतिबिंबित करने के लिये तकनीकी पूर्णता और विशिष्टता को प्राथमिकता देती थीं, वहीं समकालीन सामुदायिक रूप सामाजिक समावेशिता एवं सांस्कृतिक अनुकूलन पर ज़ोर देते हैं।