• प्रश्न :

    प्रश्न. तटरेखा के प्रकारों में भिन्नता, बंदरगाहों की स्थिति और तटीय शहरीकरण को कैसे प्रभावित करती है? चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    02 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भूगोल

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत भारत में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के तटरेखाओं को उजागर करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि तटरेखाओं के प्रकारों में भिन्नता बंदरगाहों के स्थान-निर्धारण और तटीय नगरीकरण को किस प्रकार प्रभावित करती है।
    • इसके बाद प्रतिवाद प्रस्तुत कीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    तटरेखा स्थलीय और समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों के बीच संपर्क क्षेत्र होती है। इसकी भौतिक प्रकृति चाहे वह उन्नत हो, निमज्जित हो, दंतीदार/खंडित हो या समतल हो समुद्री व्यापार की सुविधा और मानव बसावट की घनता को निर्धारित करती है।

    • उदाहरण के लिये, भारत की तटरेखा, जिसका पुनर्मूल्यांकन लगभग 11,098.81 किमी किया गया है, उल्लेखनीय भू-आकृतिक विविधता दर्शाती है जैसे कि ऊबड़-खाबड़ कोंकण तट से लेकर डेल्टाई कोरोमंडल तट तक। यह विविधता बंदरगाहों के स्थान-निर्धारण और तटीय नगरीकरण के स्वरूप को प्रभावित करती है।

    मुख्य भाग: 

    बंदरगाहों के स्थान-निर्धारण पर तटरेखा की विविधताओं का प्रभाव:

    तटरेखा की भौतिक संरचना और उसका भूवैज्ञानिक इतिहास यह निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक होते हैं कि किसी बंदरगाह का निर्माण कहाँ स्थायी तथा आर्थिक रूप से किया जा सकता है।

    • बाथिमीट्री (समुद्र की गहराई) और प्राकृतिक ड्राफ्ट: कोंकण और मालाबार जैसे निमज्जित तट प्राकृतिक रूप से गहरे जल एवं संरक्षित खाड़ियों की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। इससे मुंबई और JNPT जैसे बड़े बंदरगाहों का विकास अत्यधिक ड्रेजिंग के बिना संभव हो जाता है।
    • डेल्टाई संरचनाएँ और गाद जमाव: पूर्वी तट पर विशाल नदी डेल्टाओं (गंगा, गोदावरी, कृष्णा) का प्रभुत्व है।
      • यहाँ के बंदरगाह, जैसे कोलकाता-हल्दिया या तो अधिक भीतर स्थित होते हैं या फिर भारी नदीय गाद से निपटने के लिये निरंतर और महॅंगी ड्रेजिंग की आवश्यकता होती है।
    • आश्रय और ब्रेकवाटर की आवश्यकता: सीधी और रेतीली तटरेखाओं (जैसे आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों) में लहरों से मिलने वाली प्राकृतिक सुरक्षा का अभाव होता है।
      • इन क्षेत्रों के बंदरगाहों जैसे विशाखापत्तनम को अक्सर एक शांत बंदरगाह वातावरण बनाने के लिये बड़े पैमाने पर कृत्रिम ब्रेकवाटर की आवश्यकता होती है।
    • आधारभूत संरचना हेतु भूवैज्ञानिक स्थिरता: चट्टानी और स्थिर तटरेखाएँ भारी घाट तथा भंडारण सुविधाओं को तट के निकट बनाने की अनुमति देती हैं।
      • इसके विपरीत, दलदली या कीचड़युक्त तट (जैसे सुंदरबन) भूवैज्ञानिक रूप से अस्थिर होते हैं, जिससे वहाँ बंदरगाहों का विकास छोटे और विशेषीकृत जेट्टी तक सीमित रहता है।
    • ज्वारीय विस्तार और मुहाना (Estuary) तक पहुँच: कीप के आकार की खाड़ियों में उच्च ज्वारीय उतार-चढ़ाव, जैसे खंभात की खाड़ी, गहरे ड्राफ्ट वाले जहाजों को उच्च ज्वार के समय भीतर स्थित बंदरगाहों जैसे कांडला तक पहुँचने की अनुमति देते हैं, भले ही पहुँच मार्ग अपेक्षाकृत उथला हो।

    तटरेखा के प्रकार का तटीय नगरीकरण पर प्रभाव

    तटरेखा की विशेषताएँ यह निर्धारित करती हैं कि समुद्री व्यापार और प्राकृतिक संसाधनों के आसपास मानव बस्तियाँ किस प्रकार संगठित होती हैं।

    • नोडल विकास: निमज्जित और दंतुरित तट 'प्रमुख शहरों' के विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
    • चूँकि ये तट विशिष्ट ‘आदर्श’ स्थान प्रदान करते हैं, इसलिये शहरी विकास इन प्राकृतिक बंदरगाहों के आसपास अत्यधिक केंद्रित हो जाता है (जैसे: न्यूयॉर्क, मुंबई)।
    • संवेदनशीलता और अवसंरचना: * निम्न-स्थित डेल्टाई तट: यहाँ बाढ़ और समुद्र के बढ़ते जलस्तर का खतरा अधिक होता है, जिससे ‘झुग्गी-बहुल’ या अनिश्चित शहरीकरण (जैसे: ढाका, हुगली क्षेत्र) की स्थिति उत्पन्न होती है
    • चट्टानी/खड़ी तटरेखाएँ और ऊर्ध्वाधर शहर की प्रवृत्ति: चट्टानी और खड़ी तटरेखाएँ शहरों के क्षैतिज विस्तार पर कड़ा प्रतिबंध लगा देती हैं, परिणामस्वरूप शहरी विकास फैलाव के बजाय ऊर्ध्वाधर दिशा में बढ़ने लगता है।
      • यह भौगोलिक सीमा और उच्च जनसंख्या दबाव मिलकर ‘वर्टिकल सिटी’ की स्थिति उत्पन्न करते हैं, जहाँ मिश्रित उपयोग वाली ऊँची इमारतें निवास और व्यावसायिक गतिविधियों के लिये आवश्यक हो जाती हैं।
    • औद्योगिक गलियारों का एकीकरण: पूर्वी भाग के सपाट तटीय मैदान 'विज़ाग-चेन्नई औद्योगिक गलियारे' (VCIC) जैसे विशाल औद्योगिक क्षेत्रों के विकास की सुविधा प्रदान करते हैं। पहाड़ी पश्चिमी घाटों की तुलना में यहाँ की ज़मीन रेल और सड़क संपर्क को आसान बनाती है।
    • पर्यटन और सुविधाओं से प्रेरित विकास: सुंदर ‘पॉकेट बीच’ वाली तटरेखाएँ (जैसे: गोवा) शहरीकरण के एक अलग रूप को बढ़ावा देती हैं। यहाँ का विकास भारी औद्योगिक बंदरगाह समूहों के बजाय आतिथ्य सत्कार और उच्च-मूल्य वाली आवासीय रियल एस्टेट पर केंद्रित होता है।

    हालाँकि तटरेखा का प्रकार आधारभूत महत्त्व रखता है, लेकिन आधुनिक प्रौद्योगिकी और नीतियाँ प्राय: भौतिक सीमाओं को पार कर देती हैं।

    • भूगोल पर प्रौद्योगिकी की विजय: ड्रेजिंग और ‘भूमि पुनर्निर्माण’ में प्रगति (जैसे मुंद्रा बंदरगाह) ने पहले ‘अनुपयुक्त’ माने जाने वाले दलदली या उथले क्षेत्रों में भी विश्व-स्तरीय बंदरगाहों के निर्माण को संभव बनाया है।
    • कृत्रिम गहरे-जल के केंद्र: गैलाथिया खाड़ी (ग्रेट निकोबार) जैसे ट्रांसशिपमेंट हब का विकास स्थानीय तटरेखा की पारंपरिक ‘उपयुक्तता’ के बजाय वैश्विक शिपिंग लेन पर उनकी रणनीतिक स्थिति से प्रेरित है। आज के समय में भौगोलिक स्थिति से ज्यादा वैश्विक व्यापार मार्गों से जुड़ाव मायने रखता है।
    • हिंटरलैंड कनेक्टिविटी की प्राथमिकता: आज किसी बंदरगाह की सफलता उसकी तटरेखा की प्राकृतिक गहराई से अधिक उसके 'मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी' (जैसे समर्पित फ्रेट कॉरिडोर - DFC) पर निर्भर करती है। बंदरगाह का देश के आंतरिक हिस्सों से जुड़ाव ही उसकी वास्तविक क्षमता निर्धारित करता है।
    • पर्यावरणीय और नियामक सीमाएँ: सख्त तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) मानदंड और ‘नो-गो’ पारिस्थितिक क्षेत्र अब भूवैज्ञानिक रूप से ‘उपयुक्त’ तटरेखाओं पर भी शहरीकरण को सीमित करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य जैव विविधता की रक्षा करना है, भले ही वह क्षेत्र आर्थिक रूप से कितना भी समृद्ध क्यों न हो।
    • डिजिटल और हरित परिवर्तन:  ग्रीन हाइड्रोजन हब और ‘डिजिटल ट्विन’ पोर्ट प्रबंधन की ओर बढ़ते रुझान का अर्थ है कि तटरेखा का भौतिक स्वरूप अब गौण होता जा रहा है। अब किसी भी बंदरगाह की महत्ता उसकी ऊर्जा दक्षता और तकनीकी बुनियादी ढाँचे से तय होती है।

    निष्कर्ष:

    यद्यपि तटरेखा की भौतिक भू-आकृति भारत के प्रमुख समुद्री केंद्रों के लिये ‘मूल वास्तुकार’ (Original Architect) के रूप में कार्य करती थी, लेकिन 21वीं सदी का स्वरूप अब अभियांत्रिक अनुकूलन और रणनीतिक संपर्क की ओर स्थानांतरित हो गया है। भारत में सागरमाला कार्यक्रम और मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047 जैसी आधुनिक पहलें ‘भौगोलिक रूप से वंचित’ तटरेखाओं को सक्रिय रूप से उच्च-तकनीकी औद्योगिक केंद्रों में बदल रही हैं।