प्रश्न. शीत युद्ध मात्र सैन्य शक्ति की प्रतिस्पर्द्धा नहीं था, बल्कि विकास के वैकल्पिक मॉडलों के बीच चला एक व्यापक वैचारिक संघर्ष भी था। नवस्वतंत्र राष्ट्रों पर इसके प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- अपने उत्तर की शुरुआत शीत युद्ध की व्याख्या करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में तर्क दीजिये कि यह विकासात्मक मॉडल को लेकर भी एक संघर्ष था।
- इसके बाद यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि यह सैन्य शक्ति के लिये भी एक संघर्ष था।
- आगे नवस्वतंत्र राष्ट्रों पर इसके प्रभाव का परीक्षण कीजिये।
- उपयुक्त निष्कर्ष लिखिये।
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परिचय:
शीत युद्ध (1947-1991) संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट और सोवियत संघ के नेतृत्व वाले पूर्वी गुट के बीच तीव्र भू-राजनीतिक तनाव का काल था।
- यद्यपि इसकी विशेषता परमाणु हथियारों की होड़ और परोक्ष युद्धों से रही, फिर भी मूलरूप से यह सभ्यताओं एवं विकास की परस्पर विरोधी अवधारणाओं का संघर्ष था।
- जैसे-जैसे विश्व में उपनिवेशवाद का अंत हुआ, इन दोनों महाशक्तियों ने अपने-अपने आधुनिकता के मॉडलों को ‘तृतीय विश्व’ के देशों पर स्थापित करने के लिये प्रतिस्पर्द्धा की, जिससे नवस्वतंत्र राष्ट्र वैचारिक प्रयोगों की प्रयोगशालाएँ बन गए।
मुख्य भाग:
विकास मॉडलों पर संघर्ष
- पूंजीवादी आधुनिकीकरण मॉडल (अमेरिका): डब्ल्यू.डब्ल्यू. रोस्टोव के ‘स्टेजेस ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ’ द्वारा मार्गदर्शित, अमेरिका ने स्वतंत्र लोकतंत्र और मुक्त बाज़ार पूंजीवाद को बढ़ावा दिया।
- इसने निजी संपत्ति, विदेशी निवेश और वैश्विक व्यापार प्रणाली में एकीकरण पर ज़ोर दिया।
- कमान अर्थव्यवस्था मॉडल (सोवियत संघ): सोवियत संघ ने राज्य-नेतृत्व वाली केंद्रीकृत योजना के माध्यम से तीव्र औद्योगीकरण का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत किया।
- यह मॉडल उन नेतृत्वकर्त्ताओं के लिये आकर्षक था, जो पूंजीवाद को हाल ही में छोड़े गए उपनिवेशवाद के समकक्ष मानते थे।
- इसमें भारी उद्योग, भूमि सुधार और सामाजिक समानता पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- सहायता की शर्तें: विकासात्मक सहायता कभी ‘निःस्वार्थ’ नहीं होती थी। दोनों गुट तकनीकी सहायता, अवसंरचना परियोजनाओं (जैसे- भारत में इस्पात कारखाने) और शैक्षिक आदान-प्रदान का उपयोग करके ‘निर्भर’ अभिजात वर्ग तैयार करते थे, जो उनके संबंधित मॉडलों के अनुकूल होते थे।
सैन्य शक्ति के लिये संघर्ष
- रणनीतिक भूगोल: सुपरपावर ने शासन प्रणालियों का समर्थन उनके विकासात्मक प्रदर्शन की बजाय उनके स्थान (जैसे- तेल मार्गों या समुद्री मार्गों के पास होने) के आधार पर किया।
- संधियों का जाल: एक-दूसरे को सीमित करने के लिये अमेरिका और सोवियत संघ ने सैन्य संधियाँ कीं, जैसे- NATO और वारसॉ पैक्ट।
- विकासात्मक लक्ष्य अक्सर इन सैन्य गढ़ों को बनाए रखने के लिये बलिदान किये जाते थे।
- हथियार दौड़ और सैन्यीकरण: संसाधन-संकटग्रस्त नए राष्ट्रों को स्वास्थ्य सेवाओं की बजाय रक्षा पर व्यय करने के लिये प्रोत्साहित किया गया।
- ‘मिलिटरी-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स’ वैश्विक स्तर पर निर्यात किया गया, जिससे सैन्य जंटाओं (जैसे- लैटिन अमेरिका और पाकिस्तान में) का उदय हुआ, जिन्होंने सामाजिक कल्याण की तुलना में सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
नए स्वतंत्र राष्ट्रों पर प्रभाव
इन दोनों संघर्षों के प्रतिच्छेदन ने उपनिवेशोत्तर दुनिया पर विरोधाभासी प्रभाव डाला।
- सकारात्मक प्रभाव: प्रतिद्वंद्विता का लाभ प्राप्त करना
- सहायता प्रतिस्पर्द्धा: भारत और मिस्र जैसे देशों ने दोनों गुटों के साथ संतुलित कूटनीतिक संबंध बनाए रखकर लाभ प्राप्त किया, जहाँ उन्होंने भारी उद्योग के लिये सोवियत सहायता हासिल की और खाद्य सुरक्षा तथा शिक्षा के लिये पश्चिमी सहायता प्राप्त की।
- तेज़ औद्योगीकरण: किसी मॉडल की सफलता को प्रमाणित करने के दबाव ने अवसंरचना में व्यापक निवेश को प्रोत्साहित किया, जो अन्यथा दशकों में ही संभव हो पाता।
- नकारात्मक प्रभाव: ‘प्रॉक्सी’ त्रासदी
- संप्रभुता से समझौता: अनेक देश ‘प्रॉक्सी’ (जैसे- वियतनाम, कोरिया, अफगानिस्तान) बन गए, जहाँ स्थानीय शिकायतों को महाशक्तियों के हितों द्वारा प्रभावित किया गया, जिससे दशकों तक गृहयुद्ध चलता रहा।
- ‘संसाधन अभिशाप’ और ऋण: देशों ने वैचारिक परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिये अक्सर बड़े पैमाने पर ऋण लिया, जिसके परिणामस्वरूप 1980 के दशक का वैश्विक ऋण संकट उत्पन्न हुआ।
- लोकतंत्र बनाम स्थिरता: अमेरिका ने प्रायः साम्यवाद-विरोधी तानाशाहों का समर्थन किया, जबकि सोवियत संघ ने समाजवादी निरंकुश शासनों का समर्थन किया।
- दोनों ही स्थितियों में ‘स्थिरता’ के नाम पर ज़मीनी लोकतांत्रिक आंदोलनों को अक्सर दबा दिया गया।
निष्कर्ष:
शीत युद्ध केवल एक सैन्य गतिरोध नहीं था, बल्कि विकास के अर्थ और पद्धति को लेकर एक वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा भी था। नवस्वतंत्र राष्ट्रों के लिये इसने अवसर (जैसे- सहायता, कूटनीतिक स्वायत्तता और रणनीतिक लाभ) प्रदान किये, पर साथ ही निर्भरता, सैन्यीकरण और वैचारिक ध्रुवीकरण जैसी बाधाएँ भी उत्पन्न कीं।