• प्रश्न :

    प्रश्न. “लोक सेवा केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रतिबद्धता है।” इस दृष्टि से सिविल सेवाओं के नैतिक आधारों की समीक्षा कीजिये। (150 शब्द)

    19 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • लोक सेवा के बारे में संक्षेप में बताते हुए उत्तर प्रारंभ कीजिये।
    • ‘केवल एक पेशा’ के रूप में सिविल सेवा की सीमाओं पर विस्तार से चर्चा कीजिये।
    • नैतिक प्रतिबद्धता की मांग करने वाले नैतिक आधारों को उजागर कीजिये।
    • तद्नुसार निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय:

    लोक सेवा, अपने नाम के अनुसार, नागरिक समाज (res publica) के प्रति कर्त्तव्य का संकेत देती है। यदि सिविल सेवा को केवल एक पेशा माना जाए तो यह एक लेन-देन आधारित व्यवस्था बन जाती है, जिसमें कौशल और समय का आदान-प्रदान केवल वेतन एवं अधिकार के लिये किया जाता है।

    • हालाँकि, इसे एक नैतिक प्रतिबद्धता के रूप में देखने पर यह राज्य और उसके नागरिकों के बीच एक अनुबंध में बदल जाती है।
    • यह सिविल सेवक को केवल ‘मशीन का एक पुर्जा’ होने से ऊपर उठाकर संवैधानिक नैतिकता और लोक कल्याण का संरक्षक बना देती है।

    मुख्य भाग: 

    ‘केवल एक पेशा’ के रूप में सिविल सेवा की सीमाएँ

    जब कोई प्रशासक अपने पद को केवल 9 से 5 की नौकरी के रूप में देखता है तो वह मैक्स वेबर द्वारा परिभाषित कानूनी-तर्कसंगत ढाँचे के भीतर ही कार्य करता है। हालाँकि यह मानकीकरण सुनिश्चित करता है, यह लोक कल्याण को गंभीर रूप से सीमित कर देता है।

    • नौकरशाही उदासीनता: केवल पेशागत दृष्टिकोण नियमों के कठोर पालन की ओर ले जाता है, जिससे लालफीताशाही और असंवेदनशीलता उत्पन्न होती है।
      • एक नागरिक आवश्यकताओं वाला एक मानव न रहकर केवल ‘फाइल नंबर’ बनकर रह जाता है।
      • न्यूनतम दृष्टिकोण: एक पेशेवर केवल अपने कार्य विवरण में स्पष्ट रूप से निर्धारित कार्य ही करता है।
      • उनमें कर्त्तव्य की सीमा से परे जाकर जटिल, प्रणालीगत सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को हल करने की आंतरिक प्रेरणा का अभाव होता है।

    नैतिक प्रतिबद्धता की मांग करने वाले नैतिक आधार

    सिविल सेवा के मूलभूत मूल्य (जैसा कि नोलन समिति और द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) द्वारा निर्दिष्ट किया है) गहराई से नैतिकता में निहित हैं, यह साबित करते हुए कि यह पद स्वभावतः एक नैतिक उत्तरदायित्व है।

    • कमज़ोर वर्गों के प्रति समानुभूति और करुणा
      • पेशागत दृष्टिकोण: मानक संचालन प्रक्रियाओं के अनुसार, सभी के साथ समान व्यवहार करना।
      • नैतिक प्रतिबद्धता: यह स्वीकार करना कि भारतीय समाज गहराई से असमान है। वास्तविक न्याय समानुभूति की मांग करता है, यानी हाशिये पर पड़े व्यक्ति की स्थिति को समझने की क्षमता। 
        • करुणा अधिकारी को प्रेरित करती है कि वह एक निर्धन विधवा के लिये सक्रिय रूप से समाधान खोजे, जिसके पास पेंशन के लिये आवश्यक सही दस्तावेज़ नहीं हैं, बजाय इसके कि वह केवल उसकी फाइल अस्वीकार कर दे।
    • लोक सेवा के प्रति समर्पण
      • पेशागत दृष्टिकोण: कार्यालय समय के दौरान अपने कर्त्तव्यों का पालन करना।
      • नैतिक प्रतिबद्धता: समाज की सेवा करने के लिये आंतरिक, अडिग प्रेरणा, जो अक्सर व्यक्तिगत सुविधा की कीमत पर होती है।
        • उदाहरण: IAS अधिकारी आर्मस्ट्रांग पामे (मणिपुर के ‘चमत्कार पुरुष’) ने सरकारी निधियों की प्रतीक्षा किये बिना क्राउडफंडिंग के माध्यम से 100 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कराया।
        • यह उनके ‘पेशे’ के अनुसार आवश्यक नहीं था; इसे उनकी नैतिक प्रतिबद्धता ने प्रेरित किया था।
    • शुचिता और न्यासिता का सिद्धांत
      • पेशागत दृष्टिकोण: अपनी नौकरी और पेंशन की सुरक्षा के लिये रिश्वत न लेना।
      • नैतिक प्रतिबद्धता: महात्मा गांधी के न्यासिता के सिद्धांत में विश्वास करना। एक नैतिक सिविल सेवक समझता है कि सार्वजनिक धन, अधिकार और संसाधन उसके अपने नहीं हैं; वह इन्हें जनता के लिये न्यासी के रूप में धारण करता है।
        • शुचिता यह सुनिश्चित करती है कि ईमानदारी के उच्चतम आदर्शों का कठोर पालन हो, तब भी जब कोई देख न रहा हो।
    • विवेकाधीन शक्तियों में वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता
      • पेशागत दृष्टिकोण: केवल मापनीय डेटा के आधार पर निर्णय लेना।
      • नैतिक प्रतिबद्धता: कांट के सार्वभौमिक नियम का पालन करते हुए ऐसे निर्णय लेना जो प्रत्येक मानव की गरिमा का सम्मान करें।
        • जब कोई अधिकारी विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग करता है तो नैतिक प्रतिबद्धता से बंधा अधिकारी राजनीतिक दबाव, भाई-भतीजावाद और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों का विरोध करेगा और केवल समाज के व्यापक हित में कार्य करेगा।

    जब सिविल सेवा नैतिक प्रतिबद्धता पर आधारित होती है तो प्रशासन प्रतिक्रियाशील से सक्रिय की ओर विकसित हो जाता है।

    • केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने के बजाय, प्रशासक सामाजिक परिवर्तन के अभिकर्त्ता बन जाते हैं।
    • यह राज्य और नागरिकों के बीच ‘विश्वास की कमी’ को कम करता है। जब लोग अधिकारियों को नैतिक प्रतिबद्धता के साथ कार्य करते हुए देखते हैं तो उनका लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास मज़बूत होता है।

    निष्कर्ष: 

    जैसा कि स्वामी विवेकानंद ने कहा, "वे ही जीवित रहते हैं, जो दूसरों के लिए जीते हैं।" भारत के इस स्टील फ्रेम को केवल नियमों और विनियमों की लोहे की ताकत से नहीं बांधा जा सकता; इसके लिये समानुभूति, सत्यनिष्ठा और समर्पण की बुनियाद की आवश्यकता है। एक सिविल सेवक जो अपने पद को नैतिक प्रतिबद्धता के रूप में देखता है, यह सुनिश्चित करता है कि राज्य केवल अपने नागरिकों पर शासन न करे, बल्कि वास्तव में उनकी चिंता करे और कल्याणकारी राज्य का परम कर्त्तव्य पूरा करे।