• प्रश्न :

    प्रश्न. “परिवर्तनशील वैश्विक शक्ति संतुलन के परिप्रेक्ष्य में वैश्विक शासन संस्थाओं के सुधार हेतु भारत की भूमिका का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये।” (150 शब्द)

    17 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • वैश्विक शक्ति संरचना में हाल ही में आए परिवर्तनों को उजागर करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
    • मुख्य भाग में भारत द्वारा वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार के लिये किये गए योगदान का विस्तार से वर्णन कीजिये।
    • इसके बाद, यह बताइये कि आगे किन प्रयासों की आवश्यकता है।
    • अंत में तद्नुसार निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय:

    आधुनिक वैश्विक शक्ति संरचना तेज़ी से पश्चिमी प्रभुत्व वाली एकध्रुवीयता से बहुध्रुवीय विश्व क्रम में परिवर्तित हो रही है, जिसका मुख्य कारण ग्लोबल साउथ की आर्थिक प्रगति और बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धाएँ हैं।

    • इस बदलते परिदृश्य में भारत एक महत्त्वपूर्ण सेतु-निर्माता और सुधारकारी समर्थक के रूप में उभरा है, जो वैश्विक शासन में लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित करने के लिये गहन स्थापित प्रणालीगत विशेषाधिकारों को चुनौती देता है।

    मुख्य भाग:

    वैश्विक शासन संस्थाओं के सुधार में भारत का योगदान:

    • ग्लोबल साउथ की आवाज़/voice को दृढ़ता देना: भारत ने विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को समेकित करने के लिये वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन जैसे मंचों को सक्रिय रूप से संस्थागत किया है।
      • इसके तहत 2023 में G20 अध्यक्षता के दौरान भारत की सबसे प्रमुख उपलब्धि अफ्रीकी संघ (African Union) के लिये स्थायी सदस्यता सुनिश्चित करना रही, जिसने दुनिया के प्रमुख आर्थिक मंच में जनसांख्यिकीय और भौगोलिक प्रतिनिधित्व को मूल रूप से बदल दिया।
    • बहुपक्षीय संस्थागत सुधारों का नेतृत्व: G4 समूह में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से भारत निरंतर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के विस्तार के लिये प्रयास करता रहा है, ताकि यह आधुनिक भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप हो सके।
      • साथ ही भारत IMF के भीतर कोटा पुनर्वितरण में समानता की मांग करता है, ताकि मतदान अधिकार उभरते बाज़ारों के वर्तमान आर्थिक भार के अनुरूप हों।
    • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) कूटनीति में अग्रणी भूमिका: पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़ते हुए, भारत ने अपने सफल DPI मॉडलों (जैसे UPI और Aadhaar) को वैश्वीकृत किया है।
      • ग्लोबल डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर रिपॉजिटरी लॉन्च करके, भारत विकासशील देशों को स्केलेबल, पारदर्शी और लोकतांत्रिक शासन समाधान प्रदान करता है और एकाधिकारवादी तकनीकी परिदृश्यों को चुनौती देता है।
    • जलवायु कार्रवाई और सतत वित्त को बढ़ावा देना: भारत ने वैश्विक जलवायु कार्रवाई के शासन को पश्चिमी निर्देशों से विकासशील राष्ट्रों द्वारा संचालित साझेदारी की ओर स्थानांतरित किया है।
      • अंतर्राष्ट्रीय सोलर अलायंस (ISA) और कोलिशन फॉर डिजास्टर रेसिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) की सह-स्थापना के माध्यम से भारत ने जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाया है।
    • समान बहुपक्षीय व्यापार का समर्थन: विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत लगातार ‘विशेष और भिन्न व्यवहार’ (Special and Differential Treatment) सिद्धांत का बचाव करता है।
      • यह ग्लोबल नॉर्थ की संरक्षणवादी नीतियों के विरुद्ध एक ढाल के रूप में कार्य करता है, खाद्य सुरक्षा के लिये कृषि सब्सिडी की सुरक्षा हेतु सक्रिय रूप से वार्ता करता है और वैश्विक स्वास्थ्य आपात स्थितियों में बौद्धिक संपदा (IP) छूट का समर्थन करता है।
    • वैकल्पिक वित्तीय संरचनाओं को बढ़ावा देना: भारी शर्तों वाले ब्रेटन वुड्स संस्थानों पर निर्भरता को कम करने के लिये भारत ने BRICS ढाँचे के तहत न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना में नींव की भूमिका निभाई।
      • इस योगदान से एक अधिक बहुलवादी वैश्विक वित्तीय संरचना विकसित होती है, जो ऋण-जाल वाली शर्तों के बिना रियायती वित्त प्रदान करती है।

    महत्त्वाकांक्षा से क्रियान्वयन की ओर: सुधार का ब्लूप्रिंट 

    • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में ‘टेक्स्ट-आधारित वार्ताओं’ को आगे बढ़ाना: भारत को सामान्य वक्तव्यों से आगे बढ़कर सुरक्षा परिषद सुधार के लिये एक विशिष्ट, लिखित प्रारूप (ड्राफ्ट) की मांग करते रहना चाहिये, ताकि ‘इंटर-गवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स (IGN)’ एक अंतहीन विचार-विमर्श मंच बनकर न रह जाए।
      • यह कदम P5 देशों को अपनी आपत्तियाँ लिखित रूप में प्रस्तुत करने के लिये बाध्य करेगा, जिससे ‘वीटो-जनित गतिरोध’ विश्व के सामने पारदर्शी हो सके।
    • WTO के विवाद निपटान तंत्र के सुधार में नेतृत्व: महाशक्ति राजनीति के चलते WTO के अपीलीय निकाय के निष्क्रिय होने की पृष्ठभूमि में, भारत को विवाद निपटान तंत्र की पुनर्स्थापना हेतु सक्रिय भूमिका निभाते हुए सहमति-आधारित संस्थागत ढाँचे प्रस्तावित करने चाहिये, जिससे बढ़ती वैश्विक संरक्षणवादी प्रवृत्तियों का प्रभावी सामना किया जा सके।
    • उभरती प्रौद्योगिकियों के लिये वैश्विक मानदंडों का निर्माण: भारत को ‘नियमों का पालन करने वाले’ से पूर्णतः ‘नियमों का निर्माण करने वाले’ देश के रूप में रूपांतरित होना होगा। इसके लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर स्पेस शासन और बाह्य अंतरिक्ष अन्वेषण हेतु वैश्विक नियामक मानकों के निर्माण में उसे दृढ़, आधारभूत और नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिये।
    • वैश्विक विकास समझौते का विस्तार: प्रतिद्वंद्वी शक्तियों की दबावपूर्ण और अपारदर्शी आर्थिक कूटनीति का सामना करने के लिये भारत को अपनी विकास वित्त पहलों का व्यापक विस्तार करना होगा, विशेषकर अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थानीय आवश्यकताओं पर आधारित तथा मांग-प्रेरित क्षमता-निर्माण के माध्यम से।
    • एजाइल/त्वरित बहुपक्षीय सहभागिताओं को सुदृढ़ करना: ऐसी विश्व व्यवस्था में जहाँ सार्वभौमिक सहमति प्राप्त करना लगातार कठिन होता जा रहा है, भारत को मध्यम शक्तियों के गठबंधनों (जैसे- क्वाड, I2U2 और विस्तारित ब्रिक्स) को मज़बूत कर अनुकूलनशील ‘मिनी-लेटरल’ समस्या-समाधान मंच विकसित करने चाहिये, जो गतिरोधग्रस्त वैश्विक नौकरशाही तंत्रों को दरकिनार कर प्रभावी समाधान प्रस्तुत कर सकें।

    निष्कर्ष:

    वैश्विक शासन में सुधार हेतु भारत का प्रयास केवल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि विकासशील विश्व के लिये न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की एक संरचनात्मक आवश्यकता है। मानव-केंद्रित बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के अपने दृष्टिकोण को पूर्ण रूप से साकार करने के लिये भारत को आंतरिक क्षमता-निर्माण को निरंतर आगे बढ़ाते हुए महान शक्तियों की प्रतिद्वंद्विताओं के बीच रणनीतिक स्वायत्तता के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा।