• प्रश्न :

    प्रश्न. “भारतीय संघवाद एक ऐसे परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है जिसमें प्रतिस्पर्द्धी संघवाद का उदय हो रहा है।” इस परिवर्तन की प्रकृति और इसके निहितार्थों पर चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    17 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • अपने उत्तर का परिचय हाल के वर्षों में प्रतिस्पर्द्धी संघवाद के रुझानों पर प्रकाश डालते हुए दीजिये।
    • मुख्य भाग में यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि यह परिवर्तन किस प्रकार हो रहा है (इसकी प्रकृति)।
    • इसके पश्चात यह स्पष्ट कीजिये कि इसके क्या लाभ हैं।
    • साथ ही यह भी बताइये कि इस मॉडल में क्या कमज़ोरियाँ निहित हैं।
    • प्रतिस्पर्द्धी-सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने के लिये उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय:

    भारतीय संघवाद केंद्रीकृत, योजना आयोग के नेतृत्व वाली कमांड प्रणाली से बदलकर प्रतिस्पर्द्धी संघवाद में परिवर्तित हो गया है, जहाँ राज्य केंद्र के साथ ऊर्ध्वाधर रूप से और एक-दूसरे के साथ क्षैतिज रूप से प्रतिस्पर्द्धा करते हैं। यह बदलाव वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण से प्रेरित हुआ तथा हाल के वर्षों में इसमें तीव्रता आई है।

    • इसे नीति आयोग, GST, लाइसेंस राज को समाप्त करने तथा पूंजी के लिये तीव्र वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया है।

    मुख्य भाग: 

    परिवर्तन की प्रकृति: संरक्षण से प्रदर्शन की ओर

    प्रतिस्पर्द्धी संघवाद की ओर यह परिवर्तन बहुआयामी है, जो राज्यों के आर्थिक और प्रशासनिक रूप से कार्य करने के तरीके को पुनर्परिभाषित कर रहा है।

    • उप-राष्ट्रीय अर्द्ध-राजनयिक गतिविधियाँ: राज्य अब केवल केंद्र पर आर्थिक मध्यस्थ के रूप में निर्भर नहीं रह गए हैं।
      • वे हाई-प्रोफाइल शिखर सम्मेलनों (जैसे, वाइब्रेंट गुजरात समिट, इन्वेस्ट राजस्थान और UP ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट) के माध्यम से सीधे वैश्विक निवेशकों से जुड़ रहे हैं।
      • विदेशी कंपनियाँ अब अमूर्त रूप से ‘भारत’ में निवेश नहीं करतीं, बल्कि वे प्रतिस्पर्द्धी लाभों के आधार पर विशिष्ट राज्यों का चयन करती हैं।
    • प्रतिस्पर्द्धा का संस्थागतकरण: नीति आयोग ने शासन मॉडल को 'वन साइज फिट्स ऑल' (one-size-fits-all) से बदलकर एक प्रतिस्पर्द्धी रैंकिंग प्रणाली में परिवर्तित कर दिया है।
      • सतत विकास लक्ष्य (SDG) भारत सूचकांक, वित्तीय स्वास्थ्य सूचकांक और निर्यात तैयारी सूचकांक जैसे सूचकांक राज्यों को अपने प्रदर्शन की अन्य राज्यों के साथ सार्वजनिक रूप से तुलना करने के लिये बाध्य करते हैं।
    • प्रदर्शन-आधारित राजकोषीय विकेंद्रीकरण: संसाधन आवंटन की गतिशीलता विशुद्ध अधिकारिता से बदलकर परिणाम-आधारित पुरस्कारों की ओर स्थानांतरित हो रही है।
      • हाल के वित्त आयोगों (जैसे 15वें वित्त आयोग और 16वें वित्त आयोग के लिये वर्तमान रूपरेखा) ने कर वितरण में प्रदर्शन प्रोत्साहन को एकीकृत किया है, जिससे अनुदानों को बिजली क्षेत्र की दक्षता, व्यापार करने में सुगमता और जनसांख्यिकीय प्रबंधन में मापनीय सुधारों से जोड़ा जा रहा है।
    • उभरते क्षेत्रों में प्रतिद्वंद्विता: अगली पीढ़ी के उद्योगों के लिये एक तीव्र ‘संघीय बाज़ार’ उभर कर सामने आया है। राज्य आक्रामक रूप से विशिष्ट नीतियाँ बना रहे हैं और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) विनिर्माण, सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन और AI डेटा सेंटरों के लिये प्रतिस्पर्द्धा कर रहे हैं (उदाहरण के लिये, गूगल ने 15 अरब डॉलर के AI हब के लिये आंध्र प्रदेश को चुना)।

    परिवर्तन के निहितार्थ: दोहरा प्रभाव

    प्रतिस्पर्द्धी संघवाद का उदय भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लिये गहरे निहितार्थ उत्पन्न करता है, जो एक ओर प्रगति का शक्तिशाली इंजन है तो वहीं दूसरी ओर संरचनात्मक कमज़ोरियाँ भी उत्पन्न करता है।

    रचनात्मक लाभांश

    • नीतिगत नवाचार और 'लोकतंत्र की प्रयोगशालाएँ': प्रतिस्पर्द्धा राज्यों को नवाचार करने और सर्वोत्तम प्रथाओं को विकसित करने के लिये प्रोत्साहित करती है, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सकता है।
      • उदाहरण के लिये, अग्रणी एकल-खिड़की स्वीकृति प्रणाली (जैसे तेलंगाना का TS-iPASS) ने नौकरशाही की लालफीताशाही को कम करने के लिये राष्ट्रीय मानक स्थापित किये हैं।
    • आर्थिक गतिशीलता और रोज़गार सृजन: प्रशासनिक मानसिकता को 'लालफीताशाही से लाल कालीन' (red tape to red carpet) की ओर परिवर्तित करके, राज्य व्यापार सुगमता में व्यापक सुधार कर रहा है।
      • घरेलू और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करने का यह सक्रिय प्रयास बुनियादी ढाँचे के विकास और रोज़गार सृजन को गति प्रदान करता है।
    • परिणाम-उन्मुख शासन: चूँकि राज्यों की रैंकिंग राजनीतिक आख्यानों के बजाय मापने योग्य आँकड़ों पर आधारित होती है, इसलिये स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में ज़मीनी स्तर पर सेवा वितरण में सुधार लाने के लिये एक ठोस प्रयास होता है।

    संरचनात्मक कमज़ोरियाँ

    • बढ़ती क्षेत्रीय विषमताएँ (मैथ्यू प्रभाव): एक विशुद्ध प्रतिस्पर्द्धी मॉडल स्वभावतः उन राज्यों के हित में कार्य करता है, जिनके पास अवसंरचना, तटीय पहुँच तथा कुशल श्रम (जैसे, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक) क्षेत्रों में पूर्व-विद्यमान लाभ है।
      • ऐतिहासिक रूप से पिछड़े या भू-अवरोधित राज्य (जैसे, बिहार, पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से) निजी पूंजी को आकर्षित करने के लिये संघर्ष करते हैं, जिससे उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम आर्थिक विभाजन बढ़ने का जोखिम उत्पन्न होता है।
    • राजकोषीय साहसिकता और 'नीचे की ओर दौड़': मेगा-परियोजनाओं के लिये प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ने के लिये, राज्य अक्सर असंवहनीय कर छूट, अत्यधिक सब्सिडी वाली भूमि और सस्ती बिजली की पेशकश करते हैं।
      • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने पहले भी इसे एक गंभीर राजकोषीय जोखिम बताया है जो राज्य के खजाने पर दबाव डाल सकता है।
      • इसके अतिरिक्त, पूंजी को आकर्षित करने की होड़ में महत्त्वपूर्ण श्रम और पर्यावरण नियमों का उल्लंघन भी हो सकता है।
    • सहकारी भावना का क्षरण: अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धा टकरावपूर्ण संघवाद में बदल सकती है।
      • विभाज्य कर पूल को लेकर घर्षण, GST मुआवज़े में देरी, आगामी परिसीमन को लेकर आशंकाएँ और अंतर-राज्य जल विवाद यह संकेत देते हैं कि अत्यधिक प्रतिद्वंद्विता राष्ट्रीय एकता को कमज़ोर कर सकती है।

    यह सुनिश्चित करने के लिये कि प्रतिस्पर्द्धा 'नीचे की ओर दौड़' में न बदल जाए, भारत को अपने प्रतिस्पर्द्धी ढाँचे में सहकारी सुरक्षा उपायों को एकीकृत करना होगा:

    • अंतर-राज्य परिषद (ISC) को सशक्त बनाना: अंतर-राज्य परिषद को एक सामयिक विचार-विमर्श निकाय से बदलकर विवाद समाधान और नीति समन्वय के लिये एक स्थायी संस्थागत तंत्र में परिवर्तित किया जाना चाहिये।
    • पिछड़े राज्यों के लिये असममित प्रोत्साहन: केंद्र को प्रतिस्पर्द्धा की मंशा को समतल बनाने के लिये विशेष श्रेणी के दर्जे (SCS) वाले या भू-अवरोधित राज्यों को उच्च 'सहयोगात्मक सहायता' और तकनीकी अनुदान प्रदान करना चाहिये।
      • यह सुनिश्चित करता है कि प्रतिस्पर्द्धा केवल 'समान' न होकर 'न्यायसंगत' हो, जिससे बिहार, उत्तर प्रदेश या पूर्वोत्तर राज्यों के स्थायी हाशियाकरण को रोका जा सके।
    • GST 2.0 के माध्यम से 'एक राष्ट्र, एक बाज़ार' को संस्थागत रूप देना: कर प्रशासन में सहयोग आवश्यक है ताकि राज्यों को पड़ोसी राज्यों से निवेश 'छीनने' के लिये हानिकारक राजकोषीय प्रोत्साहनों का उपयोग करने से रोका जा सके।
    • राज्य-से-राज्य (S2S) मेंटरशिप कार्यक्रम: केंद्र को 'अग्रणी राज्यों' को ज्ञान-साझाकरण समझौतों और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से 'पिछड़े राज्यों' का मार्गदर्शन करने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये।
      • यह प्रतिस्पर्द्धा को एक सहयोगात्मक अधिगम प्रक्रिया में बदल देता है, जहाँ एक राज्य की सर्वोत्तम प्रथाओं (जैसे, केरल का स्वास्थ्य मॉडल) को औपचारिक रूप से दूसरे राज्यों द्वारा अपनाया जाता है।

    निष्कर्ष:

    प्रतिस्पर्द्धी संघवाद ने भारत को अधिक गतिशील और निवेश-उन्मुख बनाया है, परंतु केवल प्रतिस्पर्द्धा समावेशी विकास सुनिश्चित नहीं कर सकती। केंद्र को एक रणनीतिक मध्यस्थ के रूप में कार्य करना चाहिये, जो राजकोषीय अनुशासन लागू करते हुए पिछड़े राज्यों का समर्थन करे। आगे की राह प्रतिस्पर्द्धी-सहकारी संघवाद में निहित है, जहाँ समानता और संघीय सद्भाव बनाए रखने के लिये प्रतिद्वंद्विता को सहयोग के साथ समन्वित किया जाए।