• प्रश्न :

    प्रश्न. धर्म भारतीय प्रदर्शन कलाओं का संरक्षक और संवर्धक दोनों रहा है। विश्लेषण कीजिये कि किस प्रकार धार्मिक संस्थानों और आंदोलनों ने भारत में संगीत, नृत्य तथा रंगमंच के विकास को आकार दिया। (250 शब्द)

    16 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृति

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • अपने उत्तर की शुरुआत धार्मिक संस्थाओं को सांस्कृतिक, आर्थिक और कलात्मक जीवन के मुख्य केंद्र के रूप में स्थापित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में बताइये कि इन संस्थाओं और आंदोलनों ने भारत में संगीत, नृत्य और रंगमंच के विकास में किस प्रकार मदद की।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत में नाट्य कलाओं को कभी केवल मनोरंजन के रूप में नहीं देखा गया, इन्हें आध्यात्मिक मोक्ष (Moksha) की राह माना गया।

    • भरत मुनि के नाट्य शास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों ने कलाओं को ‘पंचम वेद’ का दर्जा प्रदान किया और इसे सभी के लिये उपलब्ध कराया।
    • सदियों के दौरान, धार्मिक संस्थाओं (मंदिर, मठ, दरगाह) और आध्यात्मिक आंदोलनों (भक्ति, सूफी) ने संगीत, नृत्य तथा रंगमंच के विकास एवं टिकाऊ होने के लिये आवश्यक संरचनात्मक संरक्षण, दार्शनिक विषयवस्तु व भौतिक स्थान प्रदान किये।

    मुख्य भाग: 

    भारतीय प्रदर्शन कलाओं के संरक्षक के रूप में धार्मिक संस्थान

    • आर्थिक और सामाजिक संरक्षण: चोल, पल्लव तथा विजयनगर साम्राज्य जैसे वंशों द्वारा बनाए गए विशाल मंदिर परिसर हज़ारों कलाकारों जैसे मूर्तिकार, नर्तक, संगीतकार, कांस्य शिल्पकार, चित्रकार एवं लिपिकार को रोज़गार देते थे, जिससे कलाओं के लिये एक स्थिर, वेतनभोगी पारिस्थितिकी तंत्र तैयार हुआ।
      • देवदासी प्रथा: हालाँकि बाद में इसका अपमान हुआ, यह मूल रूप से उच्च शिक्षित महिलाओं को देवी-देवताओं को समर्पित करने की संस्था थी, इसने उन्हें आर्थिक चिंताओं से मुक्त रहकर जटिल शास्त्रीय नृत्य और संगीत परंपराओं के संरक्षण तथा उनके निरंतर परिमार्जन की सुविधा प्रदान की।
    • पवित्र वास्तुकला कलात्मक संरक्षण के माध्यम के रूप में: जब राजनीतिक अस्थिरता ने मौखिक परंपराओं के अस्तित्व पर संकट पैदा किया, तब धार्मिक संस्थाओं ने कला को शाश्वत बनाने के लिए उन्हें पत्थरों पर उकेर दिया।
      • चिदंबरम नटराज मंदिर में खुदे हुए 108 करण (नृत्य की अवस्थाऍं) एक दृश्य विश्वकोश के रूप में कार्य करते हैं, जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिये प्राचीन भारतीय नृत्य के सटीक व्याकरण को संरक्षित किया है।
    • शैक्षिक केंद्रों के रूप में मंदिर: मंदिर गुरुकुल-सदृश संस्थानों के रूप में कार्य करते थे, जहाँ संगीत (गंधर्व), नाट्य-अभिनय (अभिनय) और सौंदर्यशास्त्र (रस) का ज्ञान अनौपचारिक अनुकरण के बजाय संरचित शिक्षण पद्धति के माध्यम से संप्रेषित किया जाता था।
    • धार्मिक शिक्षण के उपकरण के रूप में रंगमंच: रंगमंच को ‘पंचम वेद’ (नाट्यवेद) माना गया, जिसका उद्देश्य उन लोगों तक भी पवित्र ज्ञान पहुँचाना था जिन्हें वैदिक अध्ययन से वंचित रखा गया था। कूटियाट्टम का प्रदर्शन कूत्तंबलम (मंदिर रंगमंच) में किया जाता था।
      • असम के महापुरुष शंकरदेव द्वारा रचित अंकिया नाट (Ankiya Nat), एक विशिष्ट नाट्य शैली है जिसने वैष्णव धर्म के प्रचार-प्रसार के लिये 'ब्रजावली' भाषा का उपयोग किया।

    धार्मिक आंदोलन प्रदर्शन कलाओं के उत्प्रेरक के रूप में

    सामाजिक और आध्यात्मिक सुधार आंदोलनों ने प्रदर्शन कलाओं के ‘स्वरूप’ और ‘विस्तार’ को मूल रूप से पुनर्परिभाषित किया।

    • भक्ति आंदोलन (लोकतंत्रीकरण): भक्ति आंदोलन के संतों, जैसे त्यागराज, पुरंदर दास और मीराबाई ने संगीत को राजदरबारों की संकीर्णता से मुक्त कर आम जनता के बीच गलियों और मंदिरों तक पहुँचाया।
    • नृत्य-नाट्य: भक्ति प्रभाव के कारण कथक (जो मूलतः मंदिरों में कथावाचन करने वाले थे) और मणिपुरी का विकास हुआ, जो पूरी तरह राधा और कृष्ण की रासलीला पर केंद्रित है।
    • सूफी आंदोलन: सूफीवाद ने 'समा' (अध्यात्मिक संगीत) की अवधारणा को जन्म दिया, जिसे ईश्वर से मिलन का मार्ग माना गया। इसी परंपरा से कव्वाली का जन्म हुआ और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के ख्याल व तराना जैसे रूपों का विकास हुआ, जिन्हें अमीर खुसरो ने लोकप्रिय बनाया।

    यद्यपि धर्म ने कलाओं को संरक्षित किया, किंतु साथ ही ऐसी संरचनात्मक बाधाएँ भी खड़ी कर दीं जिन्होंने कला के निरंतर विकास और उसकी समावेशी प्रकृति को बाधित किया।

    • जाति-आधारित बाधाएँ: कई धार्मिक संस्थानों ने शास्त्रीय कलाओं के अभ्यास को केवल विशिष्ट 'उच्च' जातियों या वंशानुगत समुदायों तक ही सीमित रखा, जिससे कला की व्यापकता बाधित हुई।
      • सदियों तक मंदिर-आधारित कई कलाएँ जनसाधारण की पहुँच से बाहर रहीं, जिसके कारण एक प्रकार का सांस्कृतिक एकाधिकार उत्पन्न हो गया।
    • लैंगिकता और नैतिक निगरानी: देवदासी प्रथा, जिसने सदियों तक नृत्य कला को जीवित रखा, कालांतर में नैतिक पतन और सामाजिक कलंक का शिकार हो गई, जिससे इस परंपरा से जुड़ी महिलाओं को भारी शोषण का सामना करना पड़ा।
      • धार्मिक रूढ़िवादिता ने अक्सर इन नृत्यों के ‘धर्मनिरपेक्षीकरण’ या ‘आधुनिकीकरण’ (जैसे 'सदिर' का 'भरतनाट्यम' में परिवर्तन) को प्रायः विरोध और असहिष्णुता की दृष्टि से देखा।
    • विषयगत सीमाएँ: सदियों तक भारतीय रंगमंच और नृत्य लगभग पूरी तरह पुराणों और महाकाव्यों पर ही केंद्रित रहे।
      • इस 'धार्मिक संतृप्ति' का अर्थ यह था कि 20वीं शताब्दी तक कला के क्षेत्र में समकालीन मानवीय संघर्षों, राजनीतिक आलोचनाओं तथा सामाजिक यथार्थवाद को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया।

    निष्कर्ष: 

    20वीं शताब्दी के शास्त्रीय पुनर्जागरण (रुक्मिणी देवी अरुंडेल जैसी विभूतियों के नेतृत्व में) ने इन कलाओं को धर्मनिरपेक्ष मंचों तक पहुँचाया, किंतु इनकी ‘व्याकरणिक संरचना’ अब भी धर्मशास्त्रीय बनी हुई है। धर्म एक भौतिक संरक्षक से रूपांतरित होकर एक आध्यात्मिक आधार बन गया है, जिससे भारतीय प्रदर्शन कलाएँ केवल भोग (उपभोग) का माध्यम न रहकर योग (एकत्व) का साधन बनी रहती हैं।