• प्रश्न :

    प्रश्न. “भारतीय कृषि अब भी अत्यधिक इनपुट-आधारित है और पर्यावरणीय दबावों से जूझ रही है।” जलवायु-अनुकूल और संधारणीय कृषि प्रणालियों की ओर बदलाव में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये। ( 250 शब्द)

    11 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • भारतीय कृषि में अस्थिर प्रथाओं पर प्रकाश डालते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
    • मुख्य भाग में उन चुनौतियों का उल्लेख कीजिये जो जलवायु-अनुकूल और संधारणीय कृषि की ओर बढ़ने में बाधा डालती हैं।
    • इस संक्रमण को सुगम बनाने हेतु आवश्यक उपायों का सुझाव दीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारतीय कृषि वर्तमान में एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। जबकि हरित क्रांति ने भारत को ‘भिक्षापात्र’ से 'अन्न भंडार' में बदल दिया, लेकिन यह उच्च उपज देने वाली किस्मों (HYVs) की विशेषता है, जो गहन सिंचाई, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की मांग करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय कृषि गंभीर पारिस्थितिक संकट की स्थिति में पहुँच गई है।

    • यद्यपि जलवायु-अनुकूल और संधारणीय कृषि की ओर संक्रमण की आवश्यकता अत्यंत तात्कालिक है, लेकिन यह परिवर्तन गहन रूप से अंतर्निहित संरचनात्मक तथा नीतिगत अवरोधों के कारण बाधित हो रहा है।

    मुख्य भाग: 

    जलवायु-अनुकूल कृषि की ओर संक्रमण में चुनौतियाँ

    प्राकृतिक कृषि या क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर (CSA) जैसी सतत प्रणालियों की ओर संक्रमण, गहन रूप से अंतर्निहित संरचनात्मक और व्यवहारगत बाधाओं के कारण कठिन बना हुआ है।

    • ‘सब्सिडी का जाल’ (Subsidy Lockdown): वर्तमान नीतियाँ रासायनिक आदानों (जैसे यूरिया) और पानी पर भारी सब्सिडी देती हैं। ऐसे में किसानों के लिये उन जैविक विधियों को अपनाना आर्थिक रूप से तर्कहीन लगता है, जहाँ सब्सिडी बहुत कम है या बिल्कुल नहीं है।
    • उपज को लेकर चिंता : छोटे और सीमांत किसान (जो कुल किसानों का लगभग 86% हैं) इस बात से चिंतित रहते हैं कि संधारणीय कृषि की ओर संक्रमण की 3–5 वर्षों की अवधि में प्रारंभिक उपज में गिरावट आ सकती है, जिसे वे किसी सुरक्षा-जाल के बिना वहन नहीं कर सकते।
    • सूचना असमानता: पारंपरिक कृषि विस्तार सेवाएँ (कृषि विज्ञान केंद्र) प्राय: कर्मियों की कमी से जूझती हैं या अब भी हरित क्रांति-कालीन तकनीकों पर केंद्रित हैं, बजाय पुनर्योजी कृषि पद्धतियों के।
    • विखंडित आपूर्ति शृंखलाएँ: हालाँकि ‘गंगा-ब्रांडेड’ जैविक कृषि क्षेत्र उभर रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर जैव-इनपुट संसाधन केंद्रों (BRCs) की कमी के कारण किसानों के लिये मानकीकृत जैविक इनपुट्स बड़े पैमाने पर प्राप्त करना कठिन है।
    • बाज़ार मूल्य अंतर: संधारणीय कृषि उत्पादों को स्थानीय मंडियों में प्राय: कोई ‘उचित’ मूल्य नहीं मिल पाता और प्रमाणन की कमी के कारण छोटे किसानों के लिये उच्च-मूल्य वाले निर्यात बाज़ारों तक पहुँचना भी मुश्किल हो जाता है।

    सुचारु संक्रमण सुनिश्चित करने के उपाय

    वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य तभी साकार हो सकता है, जब कृषि प्रणाली जितनी उत्पादक हो, उतनी ही हरित और पर्यावरण-संवेदनशील भी हो।

    • सब्सिडी का युक्तिकरण (PM-PRANAM): PM-PRANAM योजना का विस्तार किया जाए, ताकि रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी लाने वाले राज्यों को प्रोत्साहित किया जा सके। सब्सिडी से होने वाली बचत को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से सीधे किसानों को प्राकृतिक कृषि अपनाने के लिये दिया जाए।
    • कृषि में ‘iCET’ का विस्तार: कृषि के लिये डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के उपयोग को बढ़ावा दिया जाए, जिससे किसानों को सटीक, समयबद्ध और स्थान-विशिष्ट कृषि परामर्श उपलब्ध हो सके।
    • पुनर्योजी कृषि हब्स को बढ़ावा: गाँव स्तर पर सूक्ष्म उद्यमों (जैव-इनपुट संसाधन केंद्र—BRCs) की स्थापना की जाए, जो जीवामृत जैसे तैयार जैव-इनपुट्स उपलब्ध कराएँ, जिससे व्यक्तिगत किसानों पर श्रम का बोझ कम हो।
    • ‘पोषक अनाजों’ (मोटे अनाज/मिलेट्स) पर फोकस: अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष से उत्पन्न सकारात्मक गति का लाभ उठाते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सरकारी खरीद की प्राथमिकता उन जलवायु-अनुकूल फसलों की ओर स्थानांतरित की जानी चाहिये, जिन्हें धान की तुलना में लगभग 70% कम जल की आवश्यकता होती है।
    • जलवायु-अनुकूल बीज: राष्ट्रीय जलवायु-अनुकूल कृषि नवाचार परियोजना के तहत जीनोम-संपादित और ताप-सहिष्णु किस्मों (जैसे DBW 187 गेहूँ) को तेज़ी से किसानों तक पहुँचाया जाए।

    निष्कर्ष:

    ‘इनपुट-प्रधानता’ से ‘पारिस्थितिक बुद्धिमत्ता’ की ओर परिवर्तन अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व की अनिवार्यता बन चुका है। भारत को पाँच ‘R’— प्रतिरोध (Resistance), पुनर्प्राप्ति (Recovery), पुनः उछाल (Rebounding), पुनरुत्थान (Regeneration) और सुदृढ़ता (Robustness) को अपनाना होगा। पारिस्थितिक स्वास्थ्य के साथ वित्तीय प्रोत्साहनों का समन्वय करके ही भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसके ‘अन्नदाता’ (किसान) बदलते और गर्म होते वैश्विक पर्यावरण की चुनौतियों के बावजूद सुदृढ़ एवं सक्षम बने रहें।