प्रश्न. भारत और अमेरिका के बीच सुदृढ़ होता रणनीतिक सहयोग अपनी स्वायत्तता को बनाए रखते हुए आगे बढ़ रहा है। विश्व के बदलते समीकरणों के बीच, इस दोहरी नीति का आपसी संबंधों पर क्या प्रभाव होता है, इसका विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- अमेरिका के साथ हाल ही में हुए अंतरिम समझौते पर प्रकाश डालते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
- मुख्य भाग में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ बढ़ते रणनीतिक सहयोग का विस्तार से वर्णन कीजिये।
- बदलती भू-राजनीति के बीच द्विपक्षीय संबंधों पर इसके प्रभाव का आकलन कीजिये।
- आपसी मतभेदों या तनाव को कम करने के उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच फरवरी 2026 का हालिया 'अंतरिम व्यापार ढाँचा' द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ है। इसका उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे टैरिफ विवादों को सुलझाना और ‘मिशन 500’ (वर्ष 2030 तक 500 बिलियन डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य) की दिशा में आगे बढ़ना है।
- यह विकास इस साझेदारी के एक परिपक्व चरण को दर्शाता है: एक ऐसा चरण जो गहरे रणनीतिक अभिसरण से परिभाषित है, फिर भी भारत की दृढ़ रणनीतिक स्वायत्तता से बँधा हुआ है।
- निकटता से सहयोग करने और साथ ही अपना स्वतंत्र मार्ग प्रशस्त करने की यह दोहरी प्रकृति, बदलती भू-राजनीति के बीच एक जटिल लेकिन अनुकूल संबंध ढाँचा तैयार करती है।
मुख्य भाग:
संवर्द्धित रणनीतिक सहयोग: अभिसरण
- आर्थिक एकीकरण (वर्ष 2026 का बदलाव): हालिया अंतरिम समझौता अतीत के गतिरोध से आगे बढ़ने का संकेत है।
- ‘पारस्परिक टैरिफ’ (Reciprocal Tariffs) और कृषि एवं औद्योगिक वस्तुओं के लिये बाज़ार पहुँच के मुद्दों को सुलझाकर, दोनों राष्ट्र अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को एकीकृत कर रहे हैं।
- रक्षा और प्रौद्योगिकी (‘iCET’ आधार स्तंभ): 'महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर पहल' (iCET) अब इस रिश्ते का केंद्रीय स्तंभ बन गई है, जिसने द्विपक्षीय संबंधों को ‘क्रेता-विक्रेता’ के पुराने ढर्रे से बदलकर ‘सह-उत्पादक’ के रूप में मौलिक रूप से परिवर्तित कर दिया है।
- जेट इंजन: तेजस Mk2 के लिये भारत में F414 इंजन बनाने हेतु GE एयरोस्पेस और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच जून 2023 में हुआ समझौता एक ऐतिहासिक बदलाव है, जिसने पश्चिम द्वारा दशकों से अपनाई गई ‘प्रौद्योगिकी निषेध’ की नीति को समाप्त कर दिया है।
- रक्षा नवाचार: INDUS-X जैसे मंच अमेरिकी तकनीकी स्टार्टअप्स और भारत की रक्षा आवश्यकताओं के बीच सेतु का कार्य कर रहे हैं।
- अंतरिक्ष: आर्टेमिस समझौते (Artemis Accords) पर भारत के हस्ताक्षर इसके अंतरिक्ष अन्वेषण लक्ष्यों को अमेरिका के नेतृत्व वाले समूह के साथ जोड़ते हैं।
- AI और महत्त्वपूर्ण खनिज: भारत ने अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन 'पैक्स सिलिका' (Pax Silica) में शामिल होने के लिये समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं, जिसका उद्देश्य महत्त्वपूर्ण खनिजों एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के लिये एक अनुकूल और सुदृढ़ आपूर्ति शृंखला का निर्माण करना है।
- भू-राजनीतिक संरेखण: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के लिये 'क्वाड' (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) मुख्य माध्यम बना हुआ है, जो चीनी संशोधनवाद के विरुद्ध एक ‘स्वतंत्र और मुक्त’ व्यवस्था सुनिश्चित करता है।
रणनीतिक स्वायत्तता: ‘इंडिया फर्स्ट’ दृष्टिकोण
अमेरिका के साथ इतनी निकटता के बावजूद, भारत पश्चिमी अर्थों में एक औपचारिक ‘सहयोगी’ (Ally) बनने से इनकार करता है और 'बहु-संरेखण' के माध्यम से अपनी स्वायत्तता बनाए रखता है।
- रूस कारक: भले ही भारत रक्षा आयात में विविधता ला रहा है, लेकिन वह रूस के साथ अपने गहरे पुराने संबंधों (जैसे S-400 प्रणाली) को बरकरार रखे हुए है।
- जहाँ अमेरिका 'डिकपलिंग' (संबंध विच्छेद) के लिये दबाव डालता है, वहीं भारत अपनी महाद्वीपीय सुरक्षा और ऊर्जा आवश्यकताओं (रियायती तेल) को प्राथमिकता देता है। भारत इसे ‘पश्चिम-विरोधी’ होने के बजाय ‘राष्ट्रीय हित’ के रूप में प्रस्तुत करता है।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: भारत स्वयं को 'वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ' (जैसे G20 अध्यक्षता, 'वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ' शिखर सम्मेलन) के रूप में स्थापित करता है। वह प्राय: जलवायु न्याय या WTO के नियमों पर ऐसे स्टैंड लेता है जो अमेरिकी रुख से भिन्न होते हैं।
- रणनीतिक हेजिंग: वाशिंगटन पर अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिये भारत अन्य शक्तियों जैसे फ्राँस (रक्षा), जापान (बुनियादी ढाँचा) के साथ संबंध गहरे कर रहा है और मध्य पूर्व (IMEC - भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा) में सक्रिय भागीदारी कर रहा है।
यह द्वैत संबंधों को कैसे प्रभावित करता है
सहयोग और स्वायत्तता का परस्पर संबंध ऐसा रिश्ता निर्मित करता है जो क्षमताओं के स्तर पर उच्च-विश्वासयुक्त है, लेकिन नीतिगत स्तर पर लेन–देनात्मक बना रहता है।
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आयाम
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द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव
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भू-राजनीति (चीन कारक)
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स्थिरक: अमेरिका भारत की स्वायत्तता को स्वीकार करता है (जैसे कि CAATSA प्रतिबंधों से छूट देना), क्योंकि भारत चीन के विरुद्ध एक अपरिहार्य प्रतिसंतुलन है। यहाँ ‘समान खतरा’ (चीन) ‘मतभेद वाली नीतियों’ पर भारी पड़ता है।
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व्यापार एवं अर्थव्यवस्था
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तनाव का बिंदु: स्वायत्तता प्रायः संरक्षणवाद (आत्मनिर्भरता) के रूप में प्रकट होती है। अमेरिका भारत के शुल्क (टैरिफ) और डेटा स्थानीयकरण कानूनों की आलोचना करता है, जिससे लेन–देनात्मक विवाद उत्पन्न होते हैं (जिनका आंशिक समाधान 2026 के समझौते से हुआ)।
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मूल्य एवं लोकतंत्र
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कंटक (Irritant): अमेरिकी नागरिक समाज और विधायकों द्वारा कभी-कभी मानवाधिकारों या प्रेस स्वतंत्रता पर आलोचना की जाती है। स्वायत्तता के मुद्दे पर भारत के सख्त रुख से कूटनीतिक संबंधों में कभी-कभी ठहराव आता है, भले ही कार्यपालिका स्तर पर सहयोग जारी रहता है।
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संकट प्रतिक्रिया
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चयनात्मक संरेखण: वैश्विक संकटों (जैसे—यूक्रेन, गाज़ा) में भारत स्वतः अमेरिका के साथ नहीं जुड़ता, बल्कि संतुलित मध्य मार्ग अपनाता है। इससे एशिया से इतर क्षेत्रों में भारत को ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ के रूप में प्रयोग करने की अमेरिकी क्षमता सीमित रहती है।
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तनाव को नियंत्रित करने के उपाय
- विषयगत सीमांकन: व्यापार विवाद या मानवाधिकार जैसे मुद्दों को मुख्य रणनीतिक स्तंभों (रक्षा एवं प्रौद्योगिकी) से ‘फायरवॉल’ किया जाना चाहिये। वर्ष 2026 का अंतरिम समझौता इसका सफल उदाहरण है।
- भिन्न मतों का संस्थानीकरण: नियमित संवाद मंचों (जैसे—2+2 मंत्रिस्तरीय वार्ता) में असहमतियों (उदाहरण—रूस या ईरान पर दृष्टिकोण) के लिये स्पष्ट स्थान निर्धारित किया जाए, ताकि वे साझेदारी को अचानक प्रभावित न करें और उनकी निरंतरता में व्यवधान न डालें।
- जन संपर्क को गहरा करना: भारतीय प्रवासी समुदाय एक ‘जीवंत सेतु’ के रूप में कार्य करता है। वीज़ा व्यवस्थाओं को सरल बनाना (जैसे—H-1B सुधार) संबंधों को राजनीतिक उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रख सकता है।
- बिक्री के बजाय सह-विकास: हथियार ‘बेचने’ से आगे बढ़कर प्रौद्योगिकी के ‘सह-विकास’ (रक्षा औद्योगिक सहयोग रोडमैप के अनुरूप) पर ज़ोर देने से ऐसी परस्पर निर्भरता बनती है, जो राजनीतिक मतभेदों के बावजूद टिकाऊ रहती है।
निष्कर्ष
भारत का अमेरिका के साथ जुड़ाव अब ‘गुटनिरपेक्षता’ का नहीं, बल्कि ‘रणनीतिक सौदेबाज़ी’ का रूप ले चुका है। हालिया अंतरिम समझौता यह सिद्ध करता है कि जहाँ भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं करेगा, वहीं अपने उदय को सुनिश्चित करने के लिये वह आवश्यक सामरिक समायोजन करने को तैयार है।