• प्रश्न :

    प्रश्न: “प्रगतिशील कानूनी ढाँचे के बावजूद, भारत में दिव्यांगजन अब भी संरचनात्मक बहिष्करण का सामना कर रहे हैं।” दिव्यांगजनों के सशक्तीकरण हेतु सरकारी नीतियों और संस्थागत तंत्रों की प्रभावशीलता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)

    09 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाज

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत RPwD अधिनियम, 2016 के प्रावधानों को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के लिये कानूनी ढाँचे का विवरण प्रस्तुत कीजिये।
    • इसके पश्चात PwD के कल्याण हेतु संस्थागत तंत्र पर विस्तार से चर्चा कीजिये।
    • अगले चरण में यह स्पष्ट कीजिये कि ये तंत्र और व्यवस्थाएँ क्यों प्रभावी सिद्ध नहीं हो पातीं।
    • अंत में PwD के कल्याण को सुदृढ़ करने हेतु उपयुक्त उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act, 2016) ने भारत में दिव्यांगता के प्रति दृष्टिकोण को दान-आधारित से अधिकार-आधारित ढाँचे में परिवर्तित किया तथा मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की संख्या 7 से बढ़ाकर 21 कर दी।

    • फिर भी जनगणना 2011 के अनुसार दिव्यांग जनसंख्या केवल 2.21% दर्ज की गई है, जो विश्व बैंक के अनुमानों से काफी कम है। यह स्थिति प्रगतिशील कानूनों के बावजूद बनी हुई ‘डेटा अदृश्यता’ और संरचनात्मक बहिष्करण को उजागर करती है।

    मुख्य भाग:

    भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के लिये प्रगतिशील कानूनी ढाँचा:

      • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016): यह अधिनियम भारत द्वारा दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD) (जिसे वर्ष 2007 में अनुमोदित किया गया) के तहत किये गए दायित्वों को प्रभावी रूप से लागू करने हेतु अधिनियमित किया गया।
        • इस अधिनियम ने कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की श्रेणियों को 7 से बढ़ाकर 21 कर दिया।
        • इसके प्रमुख प्रावधानों में समानता और गैर-भेदभाव, सरकारी रोज़गार में 4% आरक्षण, उच्च शिक्षा में 5% आरक्षण तथा परिवहन, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) और निर्मित परिवेश में अनिवार्य सुगम्यता शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में दंडात्मक प्रावधान भी किये गए हैं।
      • मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 (Mental Healthcare Act, 2017): यह अधिनियम मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्तियों के लिये अधिकार-आधारित दृष्टिकोण अपनाता है तथा स्वायत्तता, सूचित सहमति और गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को मान्यता देता है।
      • भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 (Rehabilitation Council of India Act, 1992): यह अधिनियम पुनर्वास पेशेवरों को विनियमित करता है, जिसके अंतर्गत प्रशिक्षण कार्यक्रमों का मानकीकरण, संस्थानों की मान्यता, योग्य पेशेवरों का केंद्रीय पंजीकरण तथा दिव्यांग पुनर्वास में अयोग्य प्रथाओं पर रोक शामिल है।
      • राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 (National Trust Act, 1999): यह अधिनियम ऑटिज़्म, सेरेब्रल पाल्सी, बौद्धिक दिव्यांगता एवं बहुविध दिव्यांगताओं से ग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण, संरक्षकता और सशक्तीकरण पर केंद्रित है।
      • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के क्रियान्वयन की योजना (SIPDA): यह योजना केंद्र सरकार के मंत्रालयों, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करती है, ताकि सुगम्यता, समावेशन, जागरूकता तथा कौशल विकास को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं के माध्यम से RPwD अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

      PwD के कल्याण हेतु संस्थागत तंत्र:

      • केंद्रीय स्तर की संस्थाएँ
        • दिव्यांग व्यक्तियों के सशक्तीकरण विभाग (DEPwD): दिव्यांग व्यक्तियों के लिये राष्ट्रीय नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों के निर्माण तथा विभिन्न मंत्रालयों के बीच इनके क्रियान्वयन के समन्वय की ज़िम्मेदारी निभाता है।
        • दिव्यांग व्यक्तियों के लिये मुख्य आयुक्त (CCPD): कानूनों के क्रियान्वयन की निगरानी तथा अर्ध-न्यायिक अधिकारों के माध्यम से शिकायतों के निवारण द्वारा दिव्यांग अधिकारों के प्रवर्तन को सुनिश्चित करता है।
        • दिव्यांगता पर केंद्रीय सलाहकार बोर्ड: नीतिगत परामर्श प्रदान करता है, अंतर-मंत्रालयी समन्वय को सुगम बनाता है तथा दिव्यांग समावेशन की दिशा में समग्र प्रगति की समीक्षा करता है।
      • राज्य स्तर की संस्थाएँ
        • दिव्यांग व्यक्तियों के लिये राज्य आयुक्त: शिकायतों के निस्तारण और दिव्यांगता संबंधी कानूनों के प्रवर्तन की निगरानी के माध्यम से राज्य स्तर पर दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
        • दिव्यांगता पर राज्य सलाहकार बोर्ड: दिव्यांग कल्याण कार्यक्रमों के लिये नीति निर्माण, योजना निर्माण और निगरानी में राज्य सरकारों की सहायता करते हैं।
        • ज़िला स्तरीय समितियाँ: दिव्यांगता प्रमाण-पत्र जारी करने, योजनाओं के क्रियान्वयन तथा स्थानीय सेवाओं और अधिकारों तक पहुँच को सुगम बनाकर स्थानीय स्तर पर दिव्यांग योजनाओं को क्रियान्वित करती हैं।

      हालाँकि एक उन्नत कानूनी और नीतिगत व्यवस्था मौजूद है, फिर भी उद्देश्य तथा उसके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच अंतर के कारण दिव्यांग व्यक्तियों का संरचनात्मक बहिष्कार जारी है, जिससे उनका वास्तविक सशक्तीकरण बाधित होता है।

      • डेटा की कमी और लक्षितकरण की विफलताएँ: दिव्यांगता नीति अब भी जनगणना 2011 के आँकड़ों पर निर्भर है, जो दिव्यांगता की वास्तविक व्यापकता को काफी कम दर्शाते हैं।
        • UDID परियोजना, जिसका उद्देश्य वास्तविक समय का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना था, अब तक सार्वभौमिक कवरेज हासिल नहीं कर पाई है, जिसके कारण बहिष्करण त्रुटियाँ उत्पन्न हो रही हैं।
        • दिव्यांगता के प्रकार, लैंगिक और स्थान के अनुसार सटीक व विखंडित डेटा के अभाव में कल्याणकारी सेवाओं की आपूर्ति तथा नीति-लक्षितकरण अप्रभावी बना रहता है।
      • अवसंरचनात्मक बाधाएँ: सुगम्य भारत अभियान अपने घोषित लक्ष्यों को पूरा करने में असफल रहा है।
        • सार्वजनिक परिवहन अब भी बड़े पैमाने पर असुगम्य है; अधिकांश रेलवे स्टेशन और राज्य संचालित बसें सार्वभौमिक डिज़ाइन मानकों का पालन नहीं करतीं, जिससे स्वतंत्र आवागमन गंभीर रूप से सीमित होता है।
        • उदाहरण के लिये, एक हालिया CAG रिपोर्ट ने सुगम्य भारत अभियान में बड़े क्रियान्वयन अंतरालों की ओर संकेत किया, जिसमें यह सामने आया कि CPWD ने पुनर्निर्मित 170 सरकारी भवनों में से केवल 34 में ही पूर्व-सुगम्यता ऑडिट किये, जिससे दिव्यांग व्यक्तियों के लिये सार्वभौमिक पहुँच कमज़ोर पड़ी।
      • क्रियान्वयन और प्रवर्तन में अंतराल: कई राज्यों ने RPwD अधिनियम, 2016 के अंतर्गत नियम बनाने में देरी की, जिससे समान प्रवर्तन प्रभावित हुआ।
        • दिव्यांग व्यक्तियों के मुख्य आयुक्त (CCPD) को बाध्यकारी दंडात्मक शक्तियाँ प्राप्त नहीं हैं, जिसके चलते अनुपालन प्राय: प्रभावी आदेशों के बजाय केवल परामर्शात्मक निर्देशों तक ही सीमित रह जाता है।
        • परिणामस्वरूप, कार्यस्थलों पर उचित समायोजन से इनकार जैसे उल्लंघन अक्सर दंडित नहीं हो पाते।
      • आर्थिक बहिष्करण और रोज़गार संबंधी बाधाएँ: 4% आरक्षण के प्रावधान के बावजूद, सरकारी आँकड़ों में लगातार यह सामने आया है कि दिव्यांग व्यक्तियों (PwDs) के लिये आरक्षित पदों पर, विशेषकर समूह A और B सेवाओं में रिक्तियों की दर काफी अधिक बनी हुई है।
        • निजी क्षेत्र में जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी तथा उचित समायोजन की लागत को बढ़ा-चढ़ाकर देखने की प्रवृत्ति के कारण दिव्यांग व्यक्तियों की नियुक्ति में अनिच्छा बनी रहती है, जिससे कार्यबल में उनकी भागीदारी राष्ट्रीय औसत से कम रह जाती है।
        • उदाहरण के लिये, मार्चिंग शीप PwD इन्क्लूज़न इंडेक्स 2025 के अनुसार, भारत में सर्वेक्षण किये गए 876 संगठनों में दिव्यांग व्यक्तियों की भागीदारी कुल कार्यबल के 1% से भी कम पाई गई, जबकि 37.9% कंपनियों ने यह बताया कि उनके यहाँ कोई भी दिव्यांग व्यक्ति स्थायी रूप से नियोजित नहीं है, जो औपचारिक रोज़गार में गहराई से जड़े बहिष्करण को उजागर करता है।

      PwD के कल्याण को सुदृढ़ करने हेतु उपाय

      • योजना चरण में सार्वभौमिक डिज़ाइन: सार्वजनिक अवसंरचना, आवास, परिवहन तथा डिजिटल शासन की सभी परियोजनाओं के डिज़ाइन और निविदा चरण में ही सार्वभौमिक डिज़ाइन के सिद्धांत को अनिवार्य बनाया जाना चाहिये।
        • पुनर्निर्माण (रेट्रोफिटिंग) की तुलना में प्रारंभ से ही सुगम्यता को शामिल करना अधिक लागत-प्रभावी है, जैसा कि दिल्ली जैसे शहरों की समावेशी मेट्रो प्रणालियों से स्पष्ट होता है।
        • परियोजना पूर्ण होने से पूर्व अनिवार्य सुगम्यता ऑडिट और प्रमाणन अनुपालन सुनिश्चित कर सकते हैं।
      • समावेशी डिजिटल शासन एवं सहायक प्रौद्योगिकियाँ: सरकारी वेबसाइटों, ऐप्स और ई-शासन प्लेटफॉर्मों को वेब कंटेंट एक्सेसिबिलिटी गाइडलाइंस (WCAG) के अनुरूप बनाया जाना चाहिये, ताकि डिजिटल समावेशन सुनिश्चित हो सके।
        • सार्वजनिक खरीद नीतियों के माध्यम से स्क्रीन रीडर, स्पीच-टू-टेक्स्ट टूल्स और AI-आधारित शिक्षण सहायक उपकरणों जैसी सहायक प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा दिया जा सकता है, जिससे भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का उपयोग दिव्यांग सशक्तीकरण हेतु किया जा सके।
      • निजी क्षेत्र में रोज़गार हेतु प्रोत्साहन: केवल नैतिक अपील से आगे बढ़ते हुए, राज्य को कर प्रोत्साहन, सरकारी खरीद में वरीयता या PLI-जैसी योजनाएँ प्रदान करनी चाहिये, ताकि वे कंपनियाँ प्रोत्साहित हों जो दिव्यांग व्यक्तियों की भर्ती और उचित समायोजन के मानकों को पूरा करती हैं।
        • अंतर्राष्ट्रीय अनुभव दर्शाते हैं कि वित्तीय प्रोत्साहनों को जागरूकता के साथ जोड़ने से नियोक्ताओं की हिचकिचाहट कम होती है और कार्यस्थलों पर समावेशन को सामान्य बनाया जा सकता है।
      • प्रवर्तन और जवाबदेही को सुदृढ़ करना: दिव्यांग व्यक्तियों के लिये मुख्य आयुक्त (CCPD) के कार्यालय को अर्ध-न्यायिक और दंडात्मक अधिकारों से सशक्त किया जाना चाहिये, ताकि RPwD अधिनियम के अनुपालन को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।
        • समयबद्ध शिकायत निवारण तंत्र और सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा अनिवार्य रिपोर्टिंग दिव्यांग अधिकारों को केवल प्रतीकात्मक मान्यता से लागू होने योग्य दायित्वों में बदल सकती है।
      • सामुदायिक आधारित पुनर्वास (CBR): सामुदायिक आधारित पुनर्वास पर अधिक ध्यान देने से दिव्यांग सहायता का विकेंद्रीकरण संभव हो सकता है और ग्रामीण पहुँच में सुधार हो सकता है।
        • स्वास्थ्यकर्मी, पंचायत संस्थान और स्वयं सहायता समूहों को एकीकृत करके, CBR स्थानीय समुदायों में पुनर्वास, आजीविका समर्थन तथा सामाजिक स्वीकृति सुनिश्चित करता है, जिससे शहरी संस्थाओं पर निर्भरता कम होती है।
      • सामाजिक संवेदनशीलता और व्यावहारिक परिवर्तन: निरंतर चलने वाले सार्वजनिक जागरूकता अभियान, स्कूल पाठ्यक्रम में समावेशन और नियोक्ताओं के लिये संवेदनशीलता कार्यक्रम कलंक को समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण हैं।
        • दीर्घकालिक सशक्तीकरण प्राप्त करने में सामाजिक स्वीकृति कानूनी सुधारों के समान ही महत्त्वपूर्ण है।

      निष्कर्ष

      हालाँकि RPwD अधिनियम, 2016 एक प्रगतिशील कदम है, वास्तविक सशक्तीकरण के लिये केवल ‘कानूनी मान्यता’ से आगे बढ़कर ‘सामाजिक समावेशन’ की दिशा में कार्य करना आवश्यक है। भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के संरचनात्मक बहिष्कार को समाप्त करने के लिये कानून में लिखी व्यवस्थाओं और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच की दूरी को कम करना अनिवार्य है।