• प्रश्न :

    आप एक ऐसे ज़िले के ज़िला मजिस्ट्रेट (DM) हैं, जहाँ एक प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर स्थित है। प्रतिवर्ष एक निश्चित महीने में ‘महायात्रा’ (महान तीर्थयात्रा) का आयोजन होता है, जिसमें पूरे देश से लगभग 10 लाख श्रद्धालु आते हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था इस एक माह चलने वाले आयोजन पर अत्यधिक निर्भर है, क्योंकि दुकानदारों, होटल संचालकों और परिवहन सेवाओं से जुड़े लोगों की वार्षिक आय का लगभग 70% इसी अवधि में अर्जित होता है।

    यात्रा के आरंभ होने से दो सप्ताह पहले पड़ोसी राज्य में एक नए और अत्यधिक संक्रामक वायरस के प्रकार का प्रकोप फैल जाता है। यद्यपि इसकी मृत्यु दर कम है, लेकिन संक्रमण की गति बहुत तीव्र है और यह बुजुर्गों में गंभीर श्वसन कष्ट उत्पन्न करता है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक सघन जनसमूह संक्रमण के तीव्र प्रसार का कारण बन सकती है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता पर गंभीर दबाव पड़ने की आशंका है।

    आपके ज़िले में स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण और अस्थिर बनी हुई है:

    धार्मिक अभिकर्त्ता: मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि यह यात्रा 200 वर्षों से निरंतर चली आ रही है और इसे रोकना अपशकुन माना जाएगा।

    आर्थिक हितधारक: स्थानीय व्यापारियों के संघ ने चेतावनी दी है कि यदि यात्रा रद्द की जाती है, तो बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन होंगे, क्योंकि उन्होंने इस मौसम की उम्मीद में बड़े ऋण लिये हैं।

    आप विचार-विमर्श कर ही रहे होते हैं कि तभी एक रिपोर्ट आती है, जिसमें बताया जाता है कि आपके ज़िले में वायरस के 5 मामले पहले ही सामने आ चुके हैं। यदि यात्रा पूर्ण पैमाने पर संपन्न होती है, तो आशंका है कि कुछ ही दिनों में ज़िला अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ जाएगा। दूसरी ओर, यदि आप इसे रद्द करते हैं, तो कानून-व्यवस्था बिगड़ने और स्थानीय लोगों के लिये आर्थिक तबाही का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

    प्रश्न:

    1. इस मामले में निहित नैतिक मुद्दों और दुविधाओं की पहचान कीजिये।
    2. दी गई स्थिति में आपके पास कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक विकल्प के गुण और दोषों पर चर्चा कीजिये।
    3. इस स्थिति में आप कौन-सा मार्ग अपनाएँगे? अपने निर्णय को नैतिक सिद्धांतों के आधार पर स्पष्ट कीजिये।

    06 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़

    उत्तर :

    मुख्य हितधारक शामिल हैं:

    • ज़िला मजिस्ट्रेट (DM)
    • श्रद्धालु / तीर्थयात्री (जिसमें वृद्ध एवं कमज़ोर वर्ग शामिल हैं)
    • ज़िले के स्थानीय निवासी
    • राज्य सरकार
    • मंदिर ट्रस्ट एवं धार्मिक अभिकर्त्ता 
    • स्थानीय व्यापारियों का संघ
    • दुकानदार, होटल व्यवसायी, परिवहन संचालक
    • यात्रा पर निर्भर असंगठित क्षेत्र के श्रमिक
    • ज़िला स्वास्थ्य तंत्र (चिकित्सक, नर्स, पैरामेडिक्स एवं प्रशासन)
    • कानून एवं व्यवस्था एजेंसियाँ (पुलिस, होम गार्ड्स)

    परिचय: 

    यह मामला एक अत्यधिक संक्रामक वायरस के प्रकोप के बीच, एक बड़े तीर्थागमन के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार के साथ धार्मिक स्वतंत्रता, आर्थिक आजीविका तथा सामाजिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाने में एक ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा सामना की जाने वाली नैतिक दुविधा को प्रस्तुत करता है।

    मुख्य भाग: 

    1. इस मामले में निहित नैतिक मुद्दों और दुविधाओं की पहचान:

    • सार्वजनिक स्वास्थ्य और जीवन का अधिकार बनाम धार्मिक स्वतंत्रता: मुख्य नैतिक मुद्दा जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा है, विशेषकर कमज़ोर समूहों, जैसे वृद्ध लोगों की।
      • यह धार्मिक स्वतंत्रता और परंपरा के अधिकार से टकराता है, क्योंकि यात्रा का गहरा सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व है तथा इसकी ऐतिहासिक निरंतरता अनवरत है।
      • दुविधा इस तर्क में है कि क्या सामूहिक स्वास्थ्य सुरक्षा धार्मिक प्रथाओं पर नैतिक रूप से प्राथमिकता पा सकती है।
    • आर्थिक आजीविका बनाम स्वास्थ्य सुरक्षा: यात्रा स्थानीय अर्थव्यवस्था को बनाए रखती है, व्यापारियों, परिवहन संचालकों और होटल व्यवसायियों की वार्षिक आय का लगभग 70% हिस्सा प्रदान करती है।
      • इसे रद्द करना कई लोगों को ऋण, बेरोज़गारी और संकट में डाल सकता है, जिससे आर्थिक न्याय का मुद्दा उठता है।
      • साथ ही, (प्रक्रिया में) आगे बढ़ने से स्वास्थ्य व्यवस्था के ध्वस्त होने का जोखिम है, जिससे ऐसी पीड़ा और मृत्यु हो सकती है जिन्हें रोका जा सकता था।
    • प्रशासनिक कर्त्तव्य बनाम सामाजिक और राजनीतिक दबाव: ज़िला मजिस्ट्रेट के रूप में, सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और संभावित आपदा को रोकने का संवैधानिक एवं नैतिक कर्त्तव्य है।
      • हालाँकि, धार्मिक अभिकर्त्ताओं एवं व्यापारियों से अत्यधिक दबाव कानून और व्यवस्था को चुनौती देता है तथा DM की ईमानदारी, साहस व निष्पक्षता की परीक्षा लेता है।
      • दुविधा यह है कि क्या अप्रसन्न लेकिन नैतिक रूप से न्यायसंगत निर्णय लेना चाहिये या अल्पकालिक शांति बनाए रखने के लिये सामाजिक दबाव को मान लेना चाहिये।
    • सावधानी का सिद्धांत बनाम हानि की अनिश्चितता: वायरस की मृत्यु दर कम है, लेकिन उच्च संक्रामकता और स्थानीय मामलों की पुष्टि के कारण तेज़ी से फैलने का जोखिम है।
      • नैतिक शासन वैज्ञानिक पूर्वानुमान पर कार्य करने की मांग करता है, भले ही हानि संभावित हो, निश्चित न हो।
      • दुविधा यह है कि क्या संभावित जोखिमों के आधार पर सख्त प्रतिबंध लगाना नैतिक है, न कि केवल स्पष्ट आपदा के आधार पर।
    • समानता और कमज़ोर समूहों की सुरक्षा: बड़ी सभाओं से विशेष रूप से वृद्ध, प्रतिरक्षा कमज़ोर व्यक्ति और स्वास्थ्यकर्मी अधिक जोखिम में होते हैं।
      • यात्रा को अनुमति देने से जिनके पास विकल्प और सहनशीलता सबसे कम है, उन्हें सबसे अधिक जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।
      • नैतिक मुद्दा न्याय, हानि न करने और निर्णय-निर्माण में समावेशिता सुनिश्चित करने में है।

    2. दी गई स्थिति में आपके पास कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक विकल्प के गुण और दोषों पर चर्चा कीजिये।

    विकल्प 1: महा यात्रा को पारंपरिक पूर्ण रूप में जारी रखने की अनुमति देना

    गुण:

    • स्थानीय अर्थव्यवस्था बनी रहती है, जिससे व्यापारियों, श्रमिकों और सेवा प्रदाताओं की आजीविका सुरक्षित रहती है।
    • तत्काल जनअसंतोष, प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था की समस्याओं का जोखिम कम होता है।

    दोष:

    • उच्च संचरण दर और स्थानीय मामलों की पुष्टि के कारण यह विकल्प सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिये  गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।
    • यात्रा एक सुपर-स्प्रेडर घटना में बदल सकती है, जिससे ज़िले की स्वास्थ्य संरचना पर अत्यधिक दबाव पड़ सकता है।
    • चिकित्सकीय चेतावनियों के बावजूद यात्रा को आगे बढ़ाना प्रशासनिक लापरवाही के समान होगा और जीवन की रक्षा के मेरे नैतिक कर्त्तव्य का उल्लंघन करेगा।
    • किसी भी प्रकार के (बीमारी के) प्रकोप से शासन में जनता का विश्वास कम हो सकता है और इसके परिणामस्वरूप जान-माल की ऐसी हानि हो सकती है जिससे बचा जा सकता था, विशेष रूप से वृद्ध लोगों के बीच।

    विकल्प 2: महा यात्रा को पूरी तरह रद्द करना

    गुण:

    • यह विकल्प संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुरूप जीवन के अधिकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य की सर्वोत्तम सुरक्षा करता है।
    • यह स्वास्थ्य प्रणाली को क्षतिग्रस्त होने से रोकता है और चिकित्सकीय संसाधनों का सावधानीपूर्वक उपयोग सुनिश्चित करता है।
    • यह निर्णय सावधानी के सिद्धांत और वैज्ञानिक परामर्श का पालन दर्शाता है।

    दोष:

    • इससे धार्मिक भावनाओं को गहरा आघात पहुँच सकता है, जिससे सामाजिक असंतोष और भावनात्मक प्रतिक्रिया हो सकती है।
    • व्यापारी एवं श्रमिक गंभीर आर्थिक संकट, ऋण चूक और आय की हानि का सामना कर सकते हैं।
    • बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, कानून-व्यवस्था की चुनौतियाँ और मुद्दे का राजनीतिकरण होने का उच्च जोखिम है।
    • यदि सावधानीपूर्वक नहीं सॅंभाला गया तो यह निर्णय संवेदनाहीन या अधिनायकवादी समझा जा सकता है।

    विकल्प 3: यात्रा को कड़ाई से प्रतिबंध और संशोधनों के साथ अनुमति देना

    (सीमित संख्या में तीर्थयात्री, क्रमबद्ध प्रवेश, अनिवार्य स्वास्थ्य प्रोटोकॉल, कोई सामूहिक सभा नहीं)

    गुण:

    • यह विकल्प सार्वजनिक स्वास्थ्य को धार्मिक और आर्थिक चिंताओं के साथ संतुलित करने का प्रयास करता है।
    • भीड़ के घनत्व में कमी आने से व्यापक स्तर पर संक्रमण फैलने का खतरा कम हो जाता है।
    • धार्मिक निरंतरता प्रतीकात्मक रूप से बनी रहती है, जिससे आस्था और परंपरा सुरक्षित रहती है।
    • कुछ आर्थिक गतिविधियाँ जारी रहती हैं, जिससे स्थानीय आजीविका का आंशिक संरक्षण होता है।

    दोष:

    • बड़ी तीर्थयात्रा में प्रतिबंधों को लागू करना प्रशासनिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
    • सीमित सभाओं में भी वायरस की संक्रामक प्रकृति के कारण फैलने का जोखिम बना रहता है।
    • चयनात्मक प्रवेश के कारण भेदभाव या पक्षपात के आरोप लग सकते हैं।
    • व्यापारी फिर भी आर्थिक लाभ अपर्याप्त मान सकते हैं।

    विकल्प 4: महायात्रा को बाद की, अधिक सुरक्षित अवधि के लिये स्थगित करना

    गुण:

    • यह धार्मिक आस्था के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देता है।
    • स्वास्थ्य तंत्र की तैयारी मज़बूत करने और वायरस के प्रसार की निगरानी करने का समय प्रदान करता है।
    • आर्थिक नुकसान को स्थगित किया जाता है, न कि पूरी तरह समाप्त, जिससे हितधारकों के लिये कुछ उम्मीद बनी रहती है।
    • धार्मिक और आर्थिक समूहों के साथ संवाद के माध्यम से सहमति बनाने की संभावना बनती है।

    दोष:

    • स्थिति कब सामान्य होगी, इस बारे में अनिश्चितता बनी रहती है, जिससे निरंतर चिंता होती है।
    • स्थगन के बावजूद अल्पकालिक विरोध और असंतोष उत्पन्न हो सकता है।
    • निश्चित धार्मिक कैलेंडर के कारण लॉजिस्टिक और अनुष्ठानिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

    विकल्प 5: भौतिक तीर्थयात्रा की जगह प्रतीकात्मक या डिजिटल विकल्प अपनाना

    (लाइव-स्ट्रीम किये गए अनुष्ठान, सीमित पुजारी, स्थानीयकृत पूजा)

    गुण:

    • यह भौतिक सभा को न्यूनतम करता है और यात्रा के आध्यात्मिक सार को सुरक्षित रखता है।
    • कमज़ोर आबादी और स्वास्थ्य प्रणाली की क्षमता की सुरक्षा करता है।
    • संकट की स्थिति में नवाचारी और करुणामय प्रशासनिक दृष्टिकोण का संकेत देता है।

    दोष:

    • कई श्रद्धालु आभासी सहभागिता को आध्यात्मिक रूप से समान स्वीकार नहीं कर सकते।
    • स्थानीय आबादी के लिये आर्थिक लाभ न्यूनतम ही रहते हैं।
    • डिजिटल पहुँच की सीमाओं के कारण समाज के कुछ वर्गों को बाहर रखा जा सकता है।

    मैं विकल्प 3, 4 और 5 का संतुलित संयोजन अपनाऊँगा, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाएगी, धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाएगा तथा आर्थिक संकट को कम करने के प्रयास किये जाएंगे।


    3. इस स्थिति में आप कौन-सा मार्ग अपनाएँगे? अपने निर्णय को नैतिक सिद्धांतों के आधार पर स्पष्ट कीजिये।

    इस स्थिति में, मैं एक संतुलित और मानवीय कार्रवाई अपनाऊँगा, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देती हो तथा साथ ही आस्था एवं आजीविका का सम्मान भी करती हो।

    • मैं इस वर्ष महा यात्रा में बड़े पैमाने पर भौतिक सभा को अस्थायी रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन प्रावधानों के तहत प्रतिबंधित करूँगा।
      • चूँकि पुष्टि किये गए मामले पहले से मौजूद हैं और चिकित्सकीय विशेषज्ञ सुपर-स्प्रेडर घटना की चेतावनी दे रहे हैं, इसलिये बड़ी भीड़ को अनुमति देना गैर-हानिकारकता के मेरे नैतिक कर्त्तव्य और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) की संवैधानिक ज़िम्मेदारी का उल्लंघन होगा। इस चरण में निवारक कदम उठाना सावधानी के सिद्धांत का पालन है।
    • मैं आवश्यक मंदिर अनुष्ठानों को प्रतीकात्मक और प्रतिबंधित तरीके से जारी रखने की अनुमति दूँगा, जिन्हें सीमित संख्या में पुजारियों द्वारा सख्त स्वास्थ्य प्रोटोकॉल के तहत संपन्न किया जाएगा तथा श्रद्धालुओं के लिये लाइव टेलीकास्ट किया जाएगा।
      • इससे अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान सुनिश्चित होता है, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में उचित प्रतिबंध लगाए जाते हैं और अनुपातिकता का पालन होता है।
    • मैं भौतिक यात्रा को बाद की सुरक्षित अवधि के लिये स्थगित करूँगा, जो विशेषज्ञ समीक्षा के अधीन होगी। यह दृष्टिकोण धार्मिक भावनाओं के प्रति सहानुभूति और संवेदनशीलता दर्शाता है, साथ ही प्रशासनिक निर्णयों को साक्ष्य-आधारित तथा नैतिक रूप से ज़िम्मेदार बनाए रखता है।
    • मैं राज्य सरकार के साथ सक्रिय समन्वय करूँगा ताकि यात्रा पर निर्भर व्यापारियों, श्रमिकों और दैनिक वेतनभोगियों को आर्थिक राहत, ऋण स्थगन तथा कल्याण समर्थन प्रदान किया जा सके।
      • यह कदम न्याय और निष्पक्षता के नैतिक सिद्धांतों से प्रेरित है तथा सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य निर्णय का भार कमज़ोर वर्गों पर असमान रूप से न पड़े।
    • मैं धार्मिक अभिकर्त्ताओं और आर्थिक हितधारकों के साथ पारदर्शी संचार तथा निरंतर संवाद सुनिश्चित करूँगा।
      • इससे विश्वास, जवाबदेही और लोकतांत्रिक वैधता मज़बूत होती है तथा आतंक, गलत सूचना एवं कानून-व्यवस्था की समस्याओं को रोकने में सहायता मिलती है।

    निष्कर्ष:

    यह मामला सार्वजनिक अधिकारियों की नैतिक ज़िम्मेदारी को रेखांकित करता है कि वे शासन में मानव जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य को केंद्र में रखें तथा साथ ही धार्मिक भावनाओं एवं आर्थिक चिंताओं के प्रति सहानुभूति, संवाद और आनुपातिकता के साथ प्रतिक्रिया दें। ऐसी परिस्थितियों में नैतिक नेतृत्व में वैज्ञानिक तर्क, नैतिक साहस तथा समावेशी निर्णय-निर्माण की आवश्यकता होती है, ताकि सामाजिक सामंजस्य और जनता का विश्वास दोनों सुरक्षित रह सकें।