• प्रश्न :

    प्रश्न. भारत में आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ अब पारंपरिक कानून-व्यवस्था से अधिक गैर-पारंपरिक खतरों से आकार ले रही हैं। आंतरिक सुरक्षा खतरों के बदलते स्वरूप की जाँच कीजिये तथा भारत की सुरक्षा संरचना की तैयारी पर चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    04 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आंतरिक सुरक्षा

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत गैर-पारंपरिक खतरों को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में खतरों के बदलते स्वरूप पर गहराई से चर्चा कीजिये।
    • इसके बाद, इस संदर्भ में भारत की तैयारी (मज़बूतियाँ और चुनौतियाँ) का आकलन कीजिये।
    • तैयारी को सुधारने हेतु उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत की आंतरिक सुरक्षा की रूपरेखा संरचनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, जैसा कि साइबर धोखाधड़ी में वृद्धि, चुनावों के दौरान डीपफेक-संचालित गलत जानकारी, महत्त्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना पर हमले और सीमा-पार के हाइब्रिड तरीकों में देखा जा सकता है।

    • त्वरित डिजिटलीकरण और सोशल मीडिया पहुँच के कारण ये गैर-पारंपरिक खतरे अब पारंपरिक कानून-व्यवस्था की चुनौतियों के बराबर या प्राय: उनसे भी अधिक गंभीर हो गए हैं, जिससे हाल के वर्षों में आंतरिक सुरक्षा की प्रकृति पुन: परिभाषित हुई है।

    मुख्य भाग: 

    आंतरिक सुरक्षा खतरों का बदलता स्वरूप

    • साइबर अपराध और वित्तीय सुरक्षा खतरे: साइबर अपराध आंतरिक सुरक्षा की सबसे तेज़ी से बढ़ती चुनौतियों में से एक बन गया है, जो व्यक्तियों, बैंकों और सरकारी प्रणालियों को प्रभावित करता है।
      • भारत में साइबर सुरक्षा घटनाएँ वर्ष 2022 में 10.29 लाख से बढ़कर 2024 में 22.68 लाख हो गईं, जिसमें ऑनलाइन बैंकिंग और UPI धोखाधड़ी का प्रमुख हिस्सा है।
        • कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में हज़ारों पीड़ितों से जुड़े बड़े पैमाने पर डिजिटल भुगतान धोखाधड़ी की रिपोर्टें आईं।
      • हवाला से क्रिप्टोकरेंसी और NFT की ओर बदलाव ने ED जैसी एजेंसियों के लिये ‘पैसे का पता लगाना’ कठिन बना दिया है।
    • गलत सूचना, सोशल मीडिया और सार्वजनिक व्यवस्था: सोशल मीडिया-प्रेरित गलत सूचना हिंसा, भय और सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा देने लगी है, जिससे आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन जटिल हो गया है।
      • इसे नियंत्रित करने के लिये सरकार इंटरनेट शटडाउन जैसे सख्त उपायों पर अधिक निर्भर होती जा रही है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2023 में भारत में विश्व के सबसे अधिक इंटरनेट शटडाउन हुए।
    • महत्वपूर्ण अवसंरचना पर खतरे: ऊर्जा, परिवहन, स्वास्थ्य तथा दूरसंचार अवसंरचना साइबर घुसपैठ और तोड़फोड़ के प्रति संवेदनशील होती जा रही है, जिससे प्रणालीगत सुरक्षा जोखिम बढ़ रहे हैं।
      • वर्ष 2020 में एक संदिग्ध साइबर घुसपैठ ने मुंबई पावर ग्रिड के संचालन को बाधित किया, जिससे अस्पताल, रेलवे और वित्तीय संस्थान प्रभावित हुए।
      • बाद की रिपोर्टों में पावर वितरण में प्रयुक्त SCADA (सुपरवाइज़री कंट्रोल एंड डेटा अक्विज़िशन) सिस्टम में कमज़ोरियों को उजागर किया गया।
    • हाइब्रिड और प्रौद्योगिकी-सक्षम आतंकवाद: परंपरागत आतंकवाद अब भी मौजूद है, लेकिन इसने नए उपकरणों को अपनाया है जैसे ड्रोन, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग और ऑनलाइन फाइनेंसिंग, जिससे आंतरिक तथा बाहरी सुरक्षा की सीमाएँ धुंधली हो गई हैं।
      • उदाहरण के लिये, वर्ष 2021 में जम्मू एयरफोर्स स्टेशन को दो कम-तीव्रता वाले IEDs के ज़रिये ड्रोन से निशाना बनाया गया।
      • वर्ष 2025-26 की अवधि में संगठित साइबर-कार्टेल्स का उदय देखा गया, जो रैनसमवेयर-एज़-ए-सर्विस (RaaS) प्रदान करते हैं, जिससे अपराध और राज्य-प्रायोजित तोड़फोड़ के बीच की सीमाएँ धुंधली हो गई हैं।
    • जलवायु और आपदा-जनित सुरक्षा दबाव: जलवायु से उत्पन्न आपदाएँ आंतरिक सुरक्षा बलों पर निरंतर दबाव बना रही हैं, क्योंकि इनके कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन, शहरी दबाव और मानवीय संकट पैदा हो रहे हैं।
      • भारत ने विशेष रूप से बांग्लादेश से होने वाले जलवायु-जनित विस्थापन का सबसे अधिक भार उठाया है। भारत में बांग्लादेशी नागरिकों की संख्या का अनुमान व्यापक रूप से भिन्न है, जो लगभग 2-5 मिलियन से लेकर 12-20 मिलियन तक बताया जाता है।

    भारत की सुरक्षा संरचना की तैयारी

    • संस्थागत और प्रौद्योगिकीगत मज़बूतियाँ
      • साइबर सुरक्षा संस्थाओं और प्रतिक्रिया तंत्र को सशक्त बनाना: समर्पित साइबर सुरक्षा संस्थाएँ और घटना-प्रतिक्रिया ढाँचे स्थापित किये गए हैं।
        • भारतीय कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (CERT-In) ने वर्ष 2025 में 30 लाख से अधिक साइबर सुरक्षा घटनाओं को सॅंभाला, जो क्षमता में वृद्धि और खतरे की तीव्रता दोनों को दर्शाता है।
      • कानूनी और नीतिगत तैयारी: भारत ने आतंकवाद वित्तपोषण, साइबर अपराध और डिजिटल दुरुपयोग को संबोधित करने के लिये कानूनों को अपडेट किया है।
        • अवैध गतिविधियों (निवारण) अधिनियम में संशोधन, IT नियम और हालिया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 प्रवर्तन को मज़बूत बनाते हैं।
      • डेटा फ्यूजन: NATGRID (नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड) और CCTNS (क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स) विभिन्न डेटाबेस को इंटरलिंक कर केंद्रीय एजेंसियों को वास्तविक समय की खुफिया जानकारी प्रदान कर रहे हैं।
      • पूर्वानुमान पुलिसिंग और AI: भारतीय पुलिस AI आधारित CCTV कैमरों का उपयोग कानून व्यवस्था बनाए रखने, तोड़फोड़ रोकने, यातायात उल्लंघनों की निगरानी और ANPR व गन डिटेक्शन के लिये कर रही है।
    • संरचनात्मक कमज़ोरियाँ (चुनौतियाँ)
      • लिखित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) का अभाव: भारत में अभी भी कोई औपचारिक और सार्वजनिक रूप से घोषित NSS नहीं है, जो नागरिक तथा सैन्य प्रतिक्रियाओं का समन्वय कर सके।
      • ‘साइलो’ समस्या: राज्य पुलिस (प्रथम प्रतिक्रिया देने वाले) और केंद्रीय एजेंसियों (विश्लेषक) के बीच खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान राजनीतिक तथा क्षेत्राधिकार संबंधी टकराव के कारण विखंडित रहता है।
      • कानूनी पिछड़ापन: IT अधिनियम, 2000 जैसे कानून वर्ष 2026 स्तरीय खतरों जैसे ‘Q-Day’ (क्वांटम-सक्षम डिक्रिप्शन) या AI आधारित सोशल इंजीनियरिंग के लिये  प्राय: अपर्याप्त हैं।
      • मानव संसाधन की कमी: मई 2023 तक भारत में साइबर सुरक्षा पेशेवरों के लिये 40,000 नौकरी के अवसर थे, लेकिन टीमलीज डिजिटल (टीमलीज सर्विसेज की सहायक कंपनी) की रिपोर्ट के अनुसार, इन रिक्तियों का 30% बड़ा कौशल संकट होने के कारण भरा नहीं जा सका।

    तैयारी को सुदृढ़ करने हेतु उपाय

    • विकेंद्रीकृत साइबर पुलिसिंग: ज़िला स्तर पर साइबर अपराध इकाइयाँ और फॉरेंसिक लैब स्थापित करें ताकि साइबर अपराधों में त्वरित जाँच, साक्ष्य संरक्षण तथा पीड़ित सहायता सुनिश्चित की जा सके।
    • महत्त्वपूर्ण अवसंरचना की साइबर सुरक्षा: पावर, दूरसंचार, परिवहन तथा स्वास्थ्य नेटवर्क को साइबर तोड़फोड़ से सुरक्षित रखने के लिये नियमित साइबर ऑडिट, स्ट्रेस टेस्ट और ज़ीरो-ट्रस्ट सिस्टम लागू करना।
    • गलत सूचना के खिलाफ ढाँचा: डीपफेक, गलत जानकारी और सूचना युद्ध का मुकाबला करने के लिये स्थायी रणनीतिक संचार इकाई स्थापित करें, जिसमें फैक्ट-चेकिंग एवं प्लेटफॉर्म समन्वय शामिल हो।
    • केंद्र-राज्य खुफिया समन्वय: इंटरऑपरेबल प्लेटफॉर्म एवं टास्क फोर्स के माध्यम से राज्य पुलिस तथा केंद्रीय एजेंसियों के बीच वास्तविक समय की खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त संचालन सक्षम करें।
    • जलवायु-सुरक्षा समेकन: आपदा-जनित प्रवासन, शहरी तनाव और संघर्ष जोखिम प्रबंधन के लिये  आंतरिक सुरक्षा योजना में जलवायु जोखिम मूल्यांकन को मुख्यधारा में लाएँ।
    • भविष्य-उन्मुख साइबर कानून: AI-संचालित तथा एन्क्रिप्टेड अपराधों से निपटने के लिये कानूनी ढाँचे का आधुनिकीकरण करें और पोस्ट-क्वांटम सुरक्षा व नैतिक AI आधारित निगरानी में निवेश करें।

    निष्कर्ष

    भारत के आंतरिक सुरक्षा खतरे अब अल्पकालिक नहीं बल्कि प्रणालीगत, डिजिटल और हाइब्रिड स्वरूप के हैं। हालाँकि संस्थागत क्षमता में विस्तार हुआ है, भविष्य की तैयारी अनुमानात्मक शासन, तकनीकी रूप से दक्ष पुलिसिंग, संघीय समन्वय और जलवायु-संवेदनशील सुरक्षा योजना पर निर्भर करती है, ताकि सुरक्षा संरचना उन खतरों की गति के साथ विकसित हो सके जिनका सामना करना पड़ता है।