• प्रश्न :

    प्रश्न. तीव्र आर्थिक वृद्धि के बावजूद, संरचनात्मक असमानताएँ भारत में समावेशी विकास को सीमित करती रहती हैं। समावेशिता में बाधक प्रमुख अवरोधों पर चर्चा कीजिये तथा उन्हें दूर करने में हाल की नीतिगत पहलों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिये। (250 शब्द)

    04 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत अर्थव्यवस्था में हाल के विकास को उजागर करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में समावेशी विकास प्राप्त करने में प्रमुख बाधाओं का विवरण दीजिये।
    • इस संदर्भ में हाल ही में लागू प्रमुख नीतिगत हस्तक्षेपों का आकलन कीजिये।
    • समावेशी विकास को सुदृढ़ करने हेतु उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    वर्तमान समय में भारत विश्व स्तर पर उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा जा रहा है, जो अब विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और इसकी वृद्धि दर मज़बूत है। हालाँकि, यह समग्र आर्थिक सफलता प्राय: ‘K-आकार की’ वसूली को छिपा देती है, जहाँ संरचनात्मक असमानताएँ संपत्ति सृजन के लाभों को पिरामिड के निचले स्तर तक पहुँचने से रोकती हैं।

    मुख्य भाग: 

    समावेशी विकास में प्रमुख बाधाएँ

    • आय असमानता: विकास के बावजूद आय का वितरण असमान बना हुआ है। शीर्ष 10% कमाने वालों के पास लगभग 58% राष्ट्रीय आय है, जबकि निचले 50% के पास केवल लगभग 15% आय है, जो यह दर्शाता है कि विकास के लाभ किसे मिलते हैं इसमें गहरी आर्थिक असमानताएँ मौजूद हैं।
    • स्थायी जाति और सामाजिक पदानुक्रम: जाति आधारित भेदभाव अब भी अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और गुणवत्तापूर्ण रोज़गार तक पहुँच को सीमित करता है, जिससे संवैधानिक सुरक्षा के बावजूद पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंचना बनी रहती है। सामाजिक बहिष्कार विकास को ऊँची सामाजिक गतिशीलता में बदलने की क्षमता को कमज़ोर करता है।
      • NFHS-5 (2019–21) के अनुसार, जनजातीय बच्चों में 40.9% कुपोषण पाया गया, जो पोषण और स्वास्थ्य असमानता की निरंतरता को दर्शाता है।
    • असमान क्षेत्रीय विकास: सुधारों के बाद का विकास कुछ तटीय और औद्योगिक राज्यों तक केंद्रित रहा है, जबकि पूर्वी एवं मध्य क्षेत्र कम उत्पादकता और कमज़ोर बुनियादी ढाँचे के कारण पीछे छूट गए हैं। यह क्षेत्रीय असंतुलन संकटग्रस्त प्रवासन और शहरी भीड़भाड़ को बढ़ावा देता है।
      • उदाहरण के लिये, बिहार का प्रति व्यक्ति NSDP तमिलनाडु की तुलना में काफी कम है, जो गहरी क्षेत्रीय आय असमानताओं को दर्शाता है।
    • अनौपचारिकरण और बेरोज़गार विकास: भारत की विकास यात्रा पूंजी-प्रधान रही, जिसके परिणामस्वरूप पर्याप्त उच्च गुणवत्ता वाले रोज़गार उपलब्ध नहीं हुए और श्रमिक अनौपचारिक एवं असुरक्षित रोज़गार की ओर प्रवृत्त हुए।
      • भारत में 85% से अधिक श्रमिक अनौपचारिक रूप से कार्यरत हैं, जिसमें संगठित क्षेत्र के भीतर भी बड़ी हिस्सेदारी शामिल है।
    • आर्थिक भागीदारी में लैंगिक असमानता: महिलाओं की आर्थिक भागीदारी अप्रत्याशित देखभाल के बोझ, सामाजिक मानदंडों और सुरक्षा चिंताओं के कारण सीमित रहती है, जिससे घरेलू आय तथा समग्र विकास क्षमता प्रभावित होती है।
      • PLFS 2023-24 के अनुसार, महिला श्रम बल भागीदारी लगभग 41.7% है। हालाँकि इसमें सुधार हुआ है, फिर भी यह पुरुष भागीदारी से कम है।

    हालिया प्रमुख नीतिगत हस्तक्षेपों का मूल्यांकन

    • सामाजिक सुरक्षा: आयुष्मान भारत (प्रधानमंत्री-जन आरोग्य योजना) और वरिष्ठ नागरिकों के लिये विस्तार
      • हस्तक्षेप: निचले 40% नागरिकों को ₹5 लाख का स्वास्थ्य बीमा प्रदान करना तथा हाल ही में इसे 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी नागरिकों तक विस्तारित करना।
      • प्रभावकारिता (उच्च प्रभाव/क्रियान्वयन अंतराल): यह नीति वित्तीय सुरक्षा में अत्यधिक प्रभावी रही है, जिससे व्यक्तिगत व्यय (OOPE) 62.6% (FY15) से घटकर 39.4% (FY22) हो गया है।
      • आलोचना: ‘पहुॅंच’ का अर्थ ‘गुणवत्ता’ नहीं है। आपूर्ति-संबंधी सीमाओं के कारण लाभार्थियों को प्राय: निजी अस्पतालों द्वारा सेवा से इनकार किया जाता है या उन्हें रिश्वत देने के लिये  मजबूर होना पड़ता है।
        • CAG ने इस योजना के कार्यान्वयन में प्रमुख अनियमितताओं को भी उजागर किया है।
    • श्रम सुधार: 4 श्रम संहिताएँ और गिग श्रमिकों के अधिकार
      • हस्तक्षेप: 29 श्रम कानूनों को 4 कोड में समेकित करना और गिग व प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिये सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान (2025 में लागू करने का प्रयास)।
      • प्रभावकारिता (मध्यम/विकसित होती स्थिति): यह एक ऐतिहासिक बदलाव है, जिसने पहली बार कानूनी रूप से ‘गिग अर्थव्यवस्था’ (Uber/Zomato श्रमिक) को मान्यता दी है। यह अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक बनाने का प्रयास करता है।
      • आलोचना: कार्यान्वयन राज्यों में विखंडित है। नियोक्ता स्थायी रोज़गार से बचने के लिये  फिक्स्ड-टर्म कॉन्ट्रैक्ट का अधिक उपयोग कर सकते हैं, जिससे रोज़गार असुरक्षा बढ़ती है।
    • वित्तीय समावेशन: JAM त्रिमूर्ति और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT)
      • हस्तक्षेप: जन धन–आधार–मोबाइल (JAM) इकोसिस्टम के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT)।
      • प्रभावकारिता (अत्यंत उच्च दक्षता): इसने लीकेज को प्रभावी ढंग से रोका, जिससे फर्जी लाभार्थियों को हटाकर खजाने में ₹3 लाख करोड़ से अधिक की बचत हुई। संकट के समय (जैसे COVID-19) में यह जीवन-रक्षा सुनिश्चित करने में सहायक रहा।
      • आलोचना: तकनीकी विफलताओं (बायोमेट्रिक मेल न खाने) के कारण इसमें ‘बहिष्कार त्रुटियाँ’ पाई जाती हैं। 
        • इसके अलावा, वित्तीय समावेशन पूरी तरह से ‘वित्तीय गहराई’ में नहीं बदल पाया; कई खाते निष्क्रिय हैं या केवल सब्सिडी निकालने के लिये इस्तेमाल होते हैं, न कि क्रेडिट एक्सेस के लिये।
    • आवास: प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY)
      • हालिया पहल: जून 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने PMAY-U और PMAY-G योजनाओं के तहत वर्ष 2029 तक 3 करोड़ अतिरिक्त घर बनाने की घोषणा की।
      • प्रभावकारिता (उच्च दृश्यता): यह सबसे बुनियादी संपत्ति की कमी को पूरा करता है। ‘पक्का’ घर का मालिक होना पीढ़ियों तक संपत्ति की स्थिरता और गरिमा को बढ़ाता है।
      • आलोचना: ध्यान मात्रात्मक (यूनिट की संख्या) पर है, गुणात्मक (जीवनोपयोगिता) पर नहीं। कई यूनिट्स जीवनयापन केंद्रों से दूर पेरिफेरी क्षेत्रों में स्थित हैं, जिससे कुछ शहरी क्षेत्रों में अधिभोग कम है।

    समावेशी विकास को सुदृढ़ करने हेतु उपाय

    • निचले स्तर पर मानव पूंजी को सशक्त बनाना: पिछड़े क्षेत्रों में प्रारंभिक बाल पोषण, बुनियादी शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना।
    • गुणवत्तापूर्ण रोज़गार सृजन: औद्योगिक, MSME और कौशल विकास नीतियों को श्रम-प्रधान, औपचारिक रोज़गार उत्पन्न करने के लिये समन्वित करना।
    • लैंगिक-संवेदनशील विकास नीतियाँ: महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिये देखभाल अवसंरचना, सुरक्षा और अनुकूल कार्य विकल्पों में निवेश करना।
    • क्षेत्र-विशिष्ट विकास रणनीतियाँ: समान योजनाओं से आगे बढ़कर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार हस्तक्षेप तैयार करना।
    • राज्य क्षमता और जवाबदेही में सुधार: अंतिम स्तर की संस्थाओं और परिणाम निगरानी को मज़बूत करें ताकि बहिष्कार को कम किया जा सके।

    निष्कर्ष

    सुधारों के बाद भारत की विकास यात्रा ने अवसरों को बढ़ाया है, लेकिन गहरी संरचनात्मक असमानताएँ इसे पूरी तरह समावेशी बनने से रोकती हैं। हाल ही की नीतिगत पहलें प्रगति का संकेत देती हैं, लेकिन असमान राज्य क्षमता और कार्यान्वयन में अंतराल उनके प्रभाव को कम कर देते हैं। सच्चा समावेशी विकास तभी संभव होगा जब रोज़गार-प्रधान, क्षेत्रीय रूप से संतुलित और मानव पूंजी-केंद्रित वृद्धि होगी, जो समृद्धि को सीमित रूप से केंद्रित करने के बजाय व्यापक रूप से फैलाए।