प्रश्न: भारत की विदेश नीति तेज़ी से वैचारिक जुड़ाव के बजाय व्यावहारिक जुड़ाव द्वारा आकार ले रही है। विश्लेषण कीजिये कि यह दृष्टिकोण प्रमुख शक्तियों और क्षेत्रीय समूहों के साथ भारत के संबंधों को कैसे प्रभावित करता है। (250 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत भारत की विदेश नीति में नैतिक संकोच से हटकर रणनीतिक यथार्थवाद की ओर हुए बदलाव को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिये कि इस बदलाव ने प्रमुख शक्तियों के साथ-साथ क्षेत्रीय और बहुपक्षीय मंचों पर भारत की सहभागिता को किस प्रकार प्रभावित किया है।
- इसके बाद इस नए दृष्टिकोण से जुड़े लाभों और कमज़ोरियों का विश्लेषण कीजिये।
- अंत में, व्यावहारिक सहभागिता को और सुदृढ़ करने के लिये आवश्यक उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय
‘बहु-संकटों’ और खंडित बहुपक्षवाद के इस दौर में भारत की विदेश नीति ने गुटनिरपेक्षता की नैतिक संकोचपूर्ण प्रवृत्ति से आगे बढ़ते हुए बहु-संरेखण के रणनीतिक यथार्थवाद को अपनाया है। भारत ने स्वयं को एक ‘विश्व बंधु’ के रूप में सुदृढ़ रूप से स्थापित किया है।
मुख्य भाग:
प्रभाव:
- प्रमुख शक्तियों के साथ सहभागिता:
- अब भारत के प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध किसी स्थायी सैन्य या वैचारिक गठबंधन पर नहीं, बल्कि मुद्दा-आधारित सामंजस्य पर आधारित हैं, जिससे वह प्रतिस्पर्द्धी गुटों के साथ भी एक साथ संवाद और सहयोग कर सकता है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका (लेन-देन आधारित साझेदारी): वर्ष 2026 वह मोड़ दर्शाता है जब आर्थिक घर्षण को रणनीतिक आवश्यकता के साथ संतुलित किया गया।
- फरवरी 2026 के भारत-अमेरिका व्यापार समझौते, जिसके तहत शुल्क घटाकर 18% किया गया और बदले में 500 अरब डॉलर की ऊर्जा व प्रौद्योगिकी प्रतिबद्धता मिली, यह दिखाता है कि भारत विनिर्माण क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिये ऊर्जा संबंधी रियायतें (रूसी तेल आयात में कमी) देने को तैयार है।
- रूस (महाद्वीपीय स्थिरकर्त्ता): पश्चिमी दबाव के बावजूद भारत रूस के साथ अपनी “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” बनाए हुए है।
- यह एक व्यावहारिक संतुलनकारी रणनीति है, ताकि चीन-रूस के ‘असीमित’ (नो-लिमिट्स) गठबंधन को पूरी तरह आकार लेने से रोका जा सके, जिसे भारत अपनी सबसे बड़ी महाद्वीपीय रणनीतिक चुनौती मानता है।
- चीन (नियंत्रित प्रतिस्पर्द्धा): वर्ष 2024 के बाद तनाव-न्यूनन के पश्चात भारत ‘शीत शांति’ (Cold Peace) की नीति अपना रहा है जिसमें सतर्क आर्थिक पुनर्संपर्क (जैसे 2025 में चीन द्वारा उर्वरकों और टनल-बोरिंग मशीनों पर लगाए गए प्रतिबंधों में ढील) के साथ-साथ चीन की ‘ग्रे ज़ोन’ रणनीतियों का मुकाबला करने हेतु उच्च सैन्य तत्परता बनाए रखना शामिल है।
- क्षेत्रीय और बहुपक्षीय समूहों के साथ सहभागिता
- अनुकूल बहुपक्षवाद और मुद्दा-आधारित भागीदारी: भारत क्षेत्रीय समूहों के साथ गुटीय राजनीति के बजाय अपने व्यावहारिक हितों के आधार पर चयनात्मक रूप से जुड़ता है।
- चतुष्पक्षीय सुरक्षा संवाद (समुद्री सुरक्षा) और BRICS (विकास वित्त) दोनों में सक्रिय भागीदारी व्यावहारिक बहुपक्षवाद को दर्शाती है।
- क्षेत्रीय नेतृत्व की सुदृढ़ भूमिका: व्यावहारिक सहभागिता ने भारत की छवि को अपने पड़ोस और विस्तारित क्षेत्रों में एक विश्वसनीय तथा गैर-बलप्रयोगी भागीदार के रूप में मज़बूत किया है।
- हिंद महासागर क्षेत्र में विकास सहयोग, आपदा प्रबंधन और संस्थागत क्षमता निर्माण के साथ-साथ ‘ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधि’ के रूप में भारत की भूमिका उसके नेतृत्व को वैचारिक दायरों से ऊपर उठाकर मज़बूत करती है।
- वैश्विक नियम-निर्धारण में अधिक प्रभाव: विविध मंचों पर सहभागिता भारत को व्यापार, जलवायु और विकास से जुड़े वैश्विक मानकों को प्रभावित करने का अवसर देती है।
- यूरोपीय संघ और G20 के साथ जुड़ाव से आपूर्ति शृंखलाओं, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और जलवायु वित्त जैसे विषयों पर वैश्विक बहसों को दिशा देने में भारत सक्षम हुआ है।
विश्लेषण: लाभ और कमज़ोरियाँ
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विशेषता
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व्यावहारिक परिणाम
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संबद्ध जोखिम
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रणनीतिक स्वायत्तता
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रूस से S-400 प्रणाली खरीदते हुए अमेरिका के साथ GE-F414 जेट इंजन सौदों पर हस्ताक्षर करने की क्षमता।
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इससे “दोनों पक्षों को नाराज़ करने” का खतरा रहता है—अमेरिका रूसी संबंधों के कारण CAATSA जैसे प्रतिबंध लगा सकता है, जबकि पश्चिम के साथ बढ़ती निकटता के चलते रूस प्रौद्योगिकी हस्तांतरण सीमित कर सकता है।
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आर्थिक कूटनीति
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चीन पर निर्भरता घटाने के लिये मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेज़ी से आगे बढ़ाना (जैसे हालिया EU के साथ समझौते)।
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अत्यधिक तीव्र उदारीकरण से व्यापार घाटा बढ़ सकता है यदि घरेलू विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धी न बन पाए। भारत की FTA उपयोग दर अभी केवल लगभग 25% है।
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ग्लोबल साउथ में नेतृत्व
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वैश्विक विकास समझौते (तीसरा VOGSS, 2025) का समर्थन करते हुए भारत को चीन की ‘ऋण-जाल’ कूटनीति के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना।
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हालाँकि, भारत के पास G7 या चीन जैसी विशाल पूंजीगत क्षमता नहीं है, जिससे कूटनीतिक वक्तव्यों और परियोजना क्रियान्वयन के बीच ‘प्रदर्शन अंतर’ का जोखिम बना रहता है।
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बहुपक्षीय संतुलन
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वर्ष 2026 में BRICS की अध्यक्षता सॅंभालते हुए साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में Quad के समुद्री सुरक्षा अभ्यासों को गहरा करना।
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इससे ‘फेंस-सिटर’ (बीच का रुख अपनाने वाला) कहे जाने और अत्यंत संवेदनशील ‘आंतरिक-घेरा’ खुफिया साझाकरण (जैसे AUKUS) से बाहर रखे जाने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।
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व्यावहारिक सहभागिता को सुदृढ़ करने के उपाय
- स्पष्ट रणनीतिक संप्रेषण: भारत को निरंतर यह स्पष्ट करना चाहिये कि उसका बहु-संरेखण राष्ट्रीय हितों पर आधारित एक सोची-समझी रणनीति है, न कि किसी प्रकार की अस्पष्टता।
- पारदर्शी संवाद विश्वसनीयता बढ़ाता है और साझेदार देशों की अपेक्षाओं को संतुलित करने में सहायता करता है।
- आर्थिक कूटनीति को गहराई देना: व्यापार समझौतों, सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं और निवेश साझेदारियों के माध्यम से आर्थिक जुड़ाव को कूटनीति का आधार बनाया जाना चाहिये।
- आर्थिक परस्परनिर्भरता रणनीतिक संबंधों को मज़बूत करती है। FTA, अवसंरचना सहयोग और प्रौद्योगिकी साझेदारी दीर्घकालिक संबंधों को आधार प्रदान कर सकती हैं।
- मुद्दा-आधारित गठबंधन निर्माण: वैश्विक चुनौतियों पर गठबंधनों का नेतृत्व या सह-नेतृत्व करने से भारत कठोर गुटीयता के बिना परिणामों को दिशा दे सकता है।
- जलवायु कार्रवाई, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य सुरक्षा और आपदा-अनुकूलन जैसे क्षेत्र उच्च सामंजस्य की संभावनाएँ रखते हैं।
- नेबरहुड फर्स्ट और एक्ट ईस्ट पॉलिसी को सशक्त बनाना: दक्षिण एशिया और हिंद-प्रशांत में सतत विकास, संपर्क-विस्तार और क्षमता निर्माण भारत के क्षेत्रीय नेतृत्व को मज़बूत करते हैं। एक स्थिर पड़ोस रणनीतिक स्वायत्तता को और सुदृढ़ करता है।
- संस्थागत क्षमता में वृद्धि: कूटनीतिक सेवा, व्यापार विशेषज्ञता और रणनीतिक योजना संस्थानों को मज़बूत करना आवश्यक है, ताकि विदेश नीति के उद्देश्यों तथा घरेलू क्षमताओं के बीच सामंजस्य बना रहे।
- समेकित नीति-निर्माण व्यावहारिक सहभागिता में निरंतरता और प्रभावशीलता बढ़ाता है।
निष्कर्ष:
भारत की विदेश नीति में व्यावहारिकता एक खंडित, बहुध्रुवीय विश्व में रणनीतिक स्वायत्तता की परिपक्व खोज को दर्शाती है। वैचारिक गुटबंदी के बजाय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देकर भारत अपनी अनुकूलन क्षमता, सहनशीलता और वैश्विक प्रासंगिकता को सुदृढ़ करता है। आगे की प्रमुख चुनौती इस व्यावहारिक सहभागिता को सतत आर्थिक शक्ति, क्षेत्रीय नेतृत्व और दीर्घकालिक रणनीतिक प्रभाव में परिवर्तित करने की होगी।