• प्रश्न :

    प्रश्न: “पीढ़ियों तक सामूहिक स्मृति को सुरक्षित रखने और सामाजिक मूल्यों के संप्रेषण में लोक परंपराओं की भूमिका का विश्लेषण कीजिये।” (150 शब्द)

    02 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृति

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत भारत की लोक परंपराओं को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में समझाइये कि ये किस प्रकार सामूहिक स्मृति को संरक्षित करती हैं। 
    • इसके बाद विस्तार से बताइये कि ये पीढ़ियों के बीच मूल्यों का संचार कैसे करती हैं।
    • लोक परंपराओं की सीमाओं का उल्लेख कीजिये।
    • इन परंपराओं के संरक्षण हेतु उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    मौखिक आख्यानों, गीतों, अनुष्ठानों, त्योहारों, शिल्पों और प्रदर्शन कलाओं को समेटे हुए भारत की लोक परंपराएँ, सामुदायिक अनुभवों का एक जीवंत भंडार हैं।

    • ये अभिजात ग्रंथों की बजाय दैनिक जीवन में निहित होती हैं और इतिहास, पारिस्थितिकी, नैतिकता तथा पहचान को संहिताबद्ध करती हैं।
    • देश के विभिन्न क्षेत्रों में लोक परंपराओं ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक और प्रदर्शनात्मक माध्यमों से इन्हें संप्रेषित करते हुए सामूहिक स्मृति तथा सामाजिक मूल्यों को बनाए रखा है।

    मुख्य भाग: 

    सामूहिक स्मृति के संरक्षण में लोक परंपराओं की भूमिका

    • मौखिक महाकाव्य और गाथाएँ—ऐतिहासिक अभिलेख के रूप में: लोक महाकाव्य और गाथाएँ स्थानीय नायकों, संघर्षों, प्रवासों एवं प्रतिरोध की स्मृतियों को सुरक्षित रखती हैं, जो प्रायः आधिकारिक इतिहास में स्थान नहीं पातीं। उनकी कथात्मक निरंतरता अतीत की घटनाओं को सामाजिक रूप से अर्थपूर्ण बनाए रखती है।
      • उदाहरण के लिये, राजस्थान की पाबूजी की फड़ मध्यकालीन पशुपालक जीवन, निरंतर  पड़ने वाली सूखे की आवृत्तियाँ और योद्धा नैतिकता का वर्णन करती है तथा गाँव-गाँव घूमकर प्रस्तुत किया जाने वाला एक जीवंत ऐतिहासिक चित्रपट बन जाती है।
    • अनुष्ठान और त्योहार—स्मरण किये गए अतीत के रूप में: वार्षिक अनुष्ठान उत्पत्ति-कथाओं, पारिस्थितिक लयों और सामुदायिक मोड़ों को पुनःअभिनीत करते हैं, जिससे स्मृति चक्रीय समय में अंतर्निहित हो जाती है।
      • भील समुदायों का भगोरिया पर्व कृषि से जुड़ी ऋतु-परिवर्तन प्रक्रियाओं और पैतृक रिश्तेदारी मानदंडों की याद दिलाता है।
    • लोक रंगमंच और प्रदर्शन—सामाजिक स्मरण के माध्यम: प्रदर्शन परंपराएँ नैतिक दुविधाओं, अन्याय और सामूहिक संघर्षों को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करती हैं, जिससे अशिक्षित वर्गों के लिये भी स्मृति सुलभ बनी रहती है।
      • जैसे, बंगाल की जात्रा में औपनिवेशिक दमन और सुधार आंदोलनों के प्रसंग मंचित किये  जाते हैं, जिससे प्रतिरोध की लोकप्रिय स्मृति जीवित रहती है।
    • भौतिक संस्कृति और हस्तशिल्प—स्मृति-वस्तुओं के रूप में: शिल्प-कृतियों के रूपांकन, औज़ार और तकनीकें ऐतिहासिक आजीविकाओं तथा पर्यावरणीय अनुकूलनों को संहिताबद्ध करती हैं।
      • वारली चित्रकला कृषि चक्रों, वन-आश्रित जीवन और कबीलाई संरचनाओं को दृश्य रूप में दर्ज करती है, जिससे पाठ के बजाय प्रतीकों के माध्यम से स्मृति संरक्षित रहती है।

    पीढ़ियों के बीच सामाजिक मूल्यों के संप्रेषण में लोक परंपराओं की भूमिका

    • कथाकथन के माध्यम से नैतिक मानदंड: लोककथाएँ सीधे उपदेश देने के बजाय सरल और प्रभावशाली कथाओं के माध्यम से ईमानदारी, साहस एवं संयम जैसे जीवन-मूल्यों का संचार करती हैं।
      • उदाहरण के लिये, पंचतंत्र से प्रेरित गाँवों की कहानियाँ पशु-रूपकों के माध्यम से बच्चों में विवेक और सहयोग की भावना विकसित करती हैं।
    • सामुदायिक एकजुटता और पारस्परिक सहयोग: गीत और सामूहिक श्रम से जुड़े अनुष्ठान संसाधन-अभाव वाले परिवेश में जीवित रहने के लिये आवश्यक सहयोग और पारस्परिकता को सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाते हैं।
      • असम में बिहू गीत बोआई और कटाई के समय सामुदायिक जुड़ाव को मज़बूत करते हैं तथा साझा श्रम एवं उल्लास को सामान्य बनाते हैं।
    • लैंगिक भूमिकाएँ और अभिकरण का मोलभाव: लोक-रूप न केवल लैंगिक मानदंडों को प्रतिबिंबित करते हैं, बल्कि अभिव्यक्ति और आलोचना के अवसर भी प्रदान करते हैं।
      • पूर्वी उत्तर प्रदेश के कजरी गीत महिलाओं की विरह-व्यथा और धैर्य को स्वर देते हुए सहानुभूति तथा सहनशीलता का संचार करते हैं।
    • पर्यावरणीय नैतिकता और सतत जीवन: वर्जनाओं, मिथकों और अनुष्ठानों के माध्यम से पारिस्थितिक ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता है, जो संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को नियंत्रित करता है।
      • पश्चिमी घाट और राजस्थान के पवित्र उपवन अनुष्ठानिक संरक्षण के ज़रिये प्रकृति-संरक्षण के मूल्यों को आगे बढ़ाते हैं।

    लोक परंपराओं की सीमाएँ

    • औपचारिक शिक्षा और मीडिया में हाशियाकरण: आधुनिक पाठ्यक्रम और जनसंचार माध्यम लिखित तथा वैश्विक रूपों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे पीढ़ियों के बीच लोक-ज्ञान का संपर्क घटता जा रहा है।
      • उदाहरण के लिये, UNESCO ने उल्लेख किया है कि युवाओं के पलायन और विद्यालयी शिक्षा में स्थानीय भाषाओं के अवमूल्यन के कारण मौखिक परंपराओं का संप्रेषण कम हो रहा है।
    • व्यावसायीकरण और संदर्भ का क्षरण: पर्यटन तथा बाज़ार की मांग प्राय: लोक-रूपों को उनके सामाजिक परिवेश से अलग कर देती है, जिससे उनके अर्थ और गहराई में कमी आती है।
      • उत्सव-मंचों पर यक्षगान के संक्षिप्त रूपांतरण कथाओं की नैतिक गंभीरता को कमज़ोर कर देते हैं।
    • शहरीकरण और पलायन से क्षरण: विस्थापन उन सामुदायिक परिवेशों को बाधित कर देता है जो इन परंपराओं के संप्रेषण के लिये आवश्यक होते हैं।

    संरक्षण और संप्रेषण को सुदृढ़ करने के उपाय

    • शिक्षा में लोक-ज्ञान का एकीकरण: स्थानीय विद्यालयी पाठ्यक्रमों एवं शिक्षक-प्रशिक्षण में लोककथाओं, हस्तशिल्प और प्रदर्शन कलाओं को शामिल किया जाए, ताकि इनके संप्रेषण को वैधता और प्रोत्साहन मिले।
    • समुदाय-नेतृत्व वाला प्रलेखन और डिजिटल अभिलेखागार: स्थानीय संरक्षकों को अपनी मातृभाषाओं में परंपराओं को संदर्भात्मक विवरण (मेटाडाटा) सहित दर्ज करने के लिये सहयोग दिया जाए।
    • नैतिक संरक्षण और न्यायसंगत आजीविका: ऐसे अनुदान और मंच तैयार किये जाएँ जिनमें समुदायों का नियंत्रण बना रहे तथा कलाकारों को उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित हो।
    • समावेशी सुधार और आलोचनात्मक सहभागिता: सांस्कृतिक सार को बनाए रखते हुए संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप पुनर्व्याख्या को प्रोत्साहित किया जाए।

    निष्कर्ष

    लोक परंपराएँ किसी निष्क्रिय अवशेष की तरह नहीं, बल्कि सक्रिय और जीवंत प्रणालियों के रूप में कार्य करती हैं, जो दैनिक जीवन की प्रथाओं के ज़रिये सामूहिक स्मृति को सँजोती हैं और सामाजिक मूल्यों को आगे पहुँचाती हैं। उनका सुदृढ़ीकरण बिना उन्हें स्थायी या वस्तुवादी बनाए, सांस्कृतिक निरंतरता, नैतिक शिक्षा और सतत जीवन को समृद्ध कर सकता है। तेज़ी से आधुनिक होती भारत की सामाजिक संरचना में पुनर्जीवित लोक परंपराएँ अतीत की बुद्धिमत्ता और भविष्य की नागरिकता के बीच महत्त्वपूर्ण सेतु बनी रहती हैं।