• प्रश्न :

    प्रश्न. जहाँ पारदर्शिता और जवाबदेही नैतिक शासन के आवश्यक स्तंभ हैं, वहीं सत्यनिष्ठा तथा नैतिक साहस के अभाव में इनकी प्रभावशीलता सीमित है। उपयुक्त उदाहरणों के साथ चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    30 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • उत्तर की शुरुआत नैतिक शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की भूमिका को उजागर करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में, सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस के अभाव में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की सीमाओं पर विस्तार से चर्चा कीजिये।
    • सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस को बनाए रखने में आने वाली चुनौतियों का आकलन कीजिये।
    • सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस को सुदृढ़ करने हेतु उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    पारदर्शिता और जवाबदेही को नैतिक शासन का मूल स्तंभ माना जाता है, क्योंकि वे खुलेपन, उत्तरदायित्व तथा सत्ता के दुरुपयोग पर नियंत्रण को बढ़ावा देती हैं।

    • हालाँकि, सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस के अभाव में ये तंत्र नैतिक परिवर्तन के साधन बनने के बजाय मात्र प्रक्रियात्मक औपचारिकताएँ बनकर रह जाने का जोखिम रखते हैं।
    • अंततः नैतिक शासन उतना ही सार्वजनिक अधिकारियों के आंतरिक मूल्यों पर निर्भर करता है, जितना कि बाहरी नियमों पर।

    मुख्य भाग: 

    सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस के अभाव में पारदर्शिता तथा जवाबदेही की सीमाएँ

    • सत्यनिष्ठा के बिना पारदर्शिता केवल दिखावटी अनुपालन बन जाती है: पारदर्शिता सूचना के प्रकटीकरण को सुनिश्चित करती है, किंतु सत्यनिष्ठा के अभाव में यह चयनात्मक या भ्रामक रिपोर्टिंग तक सीमित हो सकती है।
      • अधिकारी तकनीकी रूप से प्रकटीकरण मानकों का पालन करते हुए भी निर्णयों के वास्तविक उद्देश्य या प्रभाव को छिपा सकते हैं।
      • उदाहरण के लिये, सार्वजनिक प्राधिकरण परियोजना विवरण पोर्टलों पर अपलोड कर सकते हैं, लेकिन प्रतिकूल लेखा-परीक्षा निष्कर्षों को दबाकर पारदर्शिता के नैतिक उद्देश्य को विफल कर देते हैं।
    • नैतिक साहस के बिना जवाबदेही तंत्रों से बचा जा सकता है: लेखा-परीक्षा, जाँच और विधायी निगरानी के माध्यम से औपचारिक जवाबदेही मौजूद होती है, किंतु इसे लागू करने के लिये ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता होती है जो सत्ता के समक्ष सत्य बोलने का साहस रखें।
      • नैतिक साहस के अभाव में गलत कार्यों को अनदेखा किया जा सकता है या सामान्य बना दिया जाता है।
      • प्रतिकूल लेखा-परीक्षा रिपोर्टों पर कार्रवाई में देरी के मामले दर्शाते हैं कि प्रतिशोध के भय से जवाबदेही कमज़ोर पड़ जाती है।
    • नियम-आधारित तंत्र नैतिक निर्णय का विकल्प नहीं हो सकते: पारदर्शिता और जवाबदेही नियमों पर आधारित होती हैं, लेकिन नैतिक शासन प्राय: मूल्यों द्वारा निर्देशित विवेकपूर्ण निर्णय की मांग करता है।
      • सत्यनिष्ठा यह सुनिश्चित करती है कि विवेक का प्रयोग अवसरवादिता के बजाय निष्पक्ष तरीके से हो।
      • उदाहरण के लिये, कल्याण वितरण में प्रक्रियाओं का यांत्रिक पालन बिना सहानुभूति के करने से, पारदर्शी नियमों के बावजूद योग्य लाभार्थियों को बाहर रखा जा सकता है।
    • मौन की संस्कृति नैतिक शासन को कमज़ोर करती है: ऐसी संस्थाओं में जहाँ नैतिक साहस की कमी होती है, पारदर्शिता उपकरण मौन की संस्कृति के साथ सह-अस्तित्व रखती हैं।
      • अधिकारी अपने करियर या सहयोगी संबंधों की सुरक्षा के लिये अनैतिक प्रथाओं पर सवाल उठाने से बच सकते हैं।
      • यह उस समय स्पष्ट होता है जब विभागों में अनियमितताएँ सबको पता होती हैं, फिर भी उन्हें आधिकारिक रूप से दर्ज नहीं किया जाता।
    • लोक विश्वास की निर्भरता अनुभव की गई सत्यनिष्ठा पर होती है: नागरिक शासन का मूल्यांकन केवल स्पष्ट प्रक्रियाओं के आधार पर नहीं करते, बल्कि निर्णय लेने वालों के नैतिक चरित्र के आधार पर भी करते हैं। सत्यनिष्ठा के बिना पारदर्शिता विश्वास के बजाय निराशा को बढ़ा सकती है।
      • मज़बूत प्रकटीकरण कानूनों के बावजूद बार-बार भ्रष्टाचार के मामले संस्थाओं में विश्वास को कमज़ोर कर देते हैं।

    सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस को बढ़ावा देने में चुनौतियाँ

    • पारंपरिक दबाव और आज्ञापालन की संस्कृति: कठोर नौकरशाही पदानुक्रम प्राय: अधिकारियों को अनैतिक या अवैध आदेशों पर सवाल उठाने से रोकती है, जिससे विवेक के बजाय आज्ञापालन को प्राथमिकता दी जाती है। नैतिक असहमति को पेशेवरता के बजाय अवज्ञा के रूप में देखा जाता है।
      • उदाहरण के लिये, आपातकाल (1975–77) के दौरान, सिविल सेवा के बड़े हिस्सों ने कथित तौर पर सामूहिक हिरासत और सेंसरशिप आदेशों का पालन किया, यह दर्शाता है कि नैतिक साहस के अभाव में पदानुक्रमीय आज्ञापालन संवैधानिक नैतिकता को हरा सकता है।
    • तबादलों और करियर पर प्रभाव का भय: मनमाने और बार-बार होने वाले तबादले नियंत्रण के उपकरण के रूप में उपयोग किये जाते हैं, जिससे अधिकारी स्वार्थ हितों के खिलाफ कार्य करने से डरते हैं। यह नैतिक निर्णय लेने पर भय उत्पन्न करता है।
      • उदाहरण के लिये, अशोक खेमका (IAS) का 50 से अधिक बार तबादला किया गया, यह दर्शाता है कि नैतिक निर्णय लेने पर करियर अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।
    • व्हिसलब्लोअर्स की कमज़ोर सुरक्षा और प्रतिशोध: व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट के बावजूद, इसके लागू होने में कमज़ोरी बनी हुई है, जिससे नैतिक व्यक्ति उत्पीड़न और हिंसा के प्रति असुरक्षित रहते हैं। यह नैतिक साहस को गंभीर रूप से कमज़ोर करता है।
      • उदाहरण के लिये, सत्येंद्र दुबे ने सरकारी एजेंसियों और ठेकेदारों से जुड़े भ्रष्टाचार तथा  अनैतिक प्रथाओं का खुलासा किया, लेकिन अंततः उनकी हत्या कर दी गई, जो संस्थागत विफलता को दर्शाता है।
    • प्रक्रियावाद बनाम नैतिक निर्णय: नैतिक तर्क के बिना नियमों के पालन पर अत्यधिक ध्यान अन्यायपूर्ण परिणाम ला सकता है, जिससे अधिकारी प्रक्रियाओं के पीछे छिपकर नैतिक ज़िम्मेदारी से बच सकते हैं।

    सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस को सुदृढ़ करने के उपाय

    • नैतिक नेतृत्व और आदर्श प्रस्तुत करना: ऐसे अभिकर्त्ता जो नैतिक विश्वास का प्रदर्शन करते हैं, वे संस्थागत संस्कृति का निर्माण करते हैं जहाँ सत्यनिष्ठा का सम्मान किया जाता है और उसे सुरक्षित रखा जाता है।
    • नैतिक कार्रवाई के लिये सुरक्षा: मज़बूत व्हिसलब्लोअर संरक्षण और सुरक्षित कार्यकाल अधिकारियों को नैतिक साहस के साथ कार्य करने के लिये प्रोत्साहित करते हैं।
    • नैतिकता प्रशिक्षण और चिंतन: नियमित नैतिकता प्रशिक्षण और मामले आधारित चर्चा अधिकारियों को प्रक्रियात्मक अनुपालन से परे मूल्यों को आत्मसात करने में सहायता करती है।
    • नैतिक आचरण को पुरस्कृत करना: सत्यनिष्ठा को मान्यता और पुरस्कार देकर संस्थागत रूप से नैतिक व्यवहार को मज़बूत किया जाता है।

    निष्कर्ष:

    पारदर्शिता और जवाबदेही नैतिक शासन के लिये आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस के बिना, ये औपचारिकताएँ केवल नाममात्र की रह जाती हैं तथा सार्वजनिक भरोसे की रक्षा नहीं कर पातीं। नैतिक शासन तभी फलता-फूलता है जब बाहरी तंत्र आंतरिक मूल्यों द्वारा प्रेरित हों, यह पुष्टि करता है कि नियम आचरण के लिये दिशा निर्देश प्रदान करते हैं, लेकिन उसे बनाए रखना केवल विवेक के माध्यम से ही संभव है।