प्रश्न: फ्राँसीसी क्रांति एक राजनीतिक और सामाजिक क्रांति, दोनों थी। समालोचनात्मक समीक्षा कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत फ्राँसीसी क्रांति को उजागर करके कीजिये।
- मुख्य भाग में यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि यह एक राजनीतिक और सामाजिक क्रांति कैसे थी।
- इसके बाद क्रांति की सीमाओं का उल्लेख कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय
फ्राँसीसी क्रांति (1789–1799) विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ थी जिसने फ्राँस को बदल दिया और आधुनिक राजनीतिक विचारधारा को पुनर्परिभाषित किया।
- वित्तीय संकट, सामाजिक असमानता और ज्ञानोदय के विचारों से प्रेरित, इसने प्राचीन शासन को चुनौती दी तथा विरासत में मिली सत्ता पर प्रश्न उठाया।
- यह न केवल एक राजनीतिक क्रांति थी, जिसने राज्य और संप्रभुता की व्यवस्था को पुनर्गठित किया, बल्कि एक सामाजिक क्रांति भी थी, जिसने स्वतंत्रता तथा समानता के आदर्शों पर समाज के पुनर्निर्माण का प्रयास किया।
मुख्य भाग:
फ्राँसीसी क्रांति एक राजनीतिक क्रांति के रूप में
- पूर्ण राजशाही का अंत और जन-संप्रभुता का उदय: क्रांति ने निरंकुश राजतंत्र को ध्वस्त किया और यह स्थापित किया कि संप्रभुता राजा के बजाय राष्ट्र में निहित है।
- लुई XVI का निष्पादन दैवी अधिकार पर आधारित शासन के अस्वीकार और जन-इच्छा की विजय का प्रतीक बना।
- संवैधानिकता और विधि का शासन: क्रांति के दौरान एक लिखित संविधान लागू किया गया, जिसने मनमानी शक्ति को सीमित किया और विधि के समक्ष समानता को स्थापित किया।
- कानून को सामान्य इच्छा की अभिव्यक्ति माना गया, जिसने शाही आदेशों का स्थान ले लिया।
- राजनीतिक सहभागिता का विस्तार: राजनीतिक क्लबों, सभाओं और चुनावों ने विशेषकर बुर्जुआ वर्ग के बीच राजनीतिक भागीदारी को व्यापक बनाया।
- राष्ट्रीय सभा जैसी संस्थाओं ने अभिजात वर्ग से प्रतिनिधि राजनीति की ओर परिवर्तन को दर्शाया।
- गणतांत्रिक आदर्शों का उदय: वर्ष 1792 में राजशाही की समाप्ति और गणराज्य की घोषणा ने एक क्रांतिकारी राजनीतिक रूपांतरण को चिह्नित किया।
- नागरिकता, राष्ट्रवाद और नागरिक कर्त्तव्य जैसी अवधारणाएँ शासन के केंद्र में आ गईं।
फ्राँसीसी क्रांति एक सामाजिक क्रांति के रूप में
- सामंती विशेषाधिकारों का उन्मूलन: अगस्त घोषणाओं (1789) के माध्यम से सामंती करों, दशमांश और कुलीन वर्ग के विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया, जिससे सदियों पुरानी पदानुक्रमित सामाजिक व्यवस्था का अंत हुआ।
- इसने जन्म पर आधारित असमानता को कानूनी रूप से समाप्त किया।
- समानता और व्यक्तिगत अधिकारों की उद्घोषणा: मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा ने कानून के समक्ष समानता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की घोषणा की।
- इसने पारंपरिक सामाजिक भेदों को चुनौती दी और सामाजिक गतिशीलता को वैधता प्रदान की।
- चर्च और समाज का रूपांतरण: चर्च की भूमि ज़ब्त कर ली गई और पादरियों को राज्य के नियंत्रण में लाया गया।
- इससे धार्मिक प्रभुत्व कमज़ोर हुआ और सामाजिक जीवन अधिक धर्मनिरपेक्ष बन गया।
- बुर्जुआ वर्ग का उदय: क्रांति ने बुर्जुआ वर्ग को सामाजिक और आर्थिक जीवन में प्रभुत्व स्थापित करने का अवसर दिया, जहाँ कुलीन विशेषाधिकारों के स्थान पर संपत्ति तथा योग्यता को प्रतिष्ठा के मानदंड के रूप में स्वीकार किया गया।
सीमाएँ:
- राजनीतिक क्रांति के संदर्भ में
- राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा: संवैधानिक राजशाही से गणराज्य और फिर तानाशाही तक बार-बार सत्ता परिवर्तन होने से अस्थिरता उत्पन्न हुई।
- आतंक के शासन ने क्रांति की रक्षा के नाम पर राजनीतिक स्वतंत्रताओं को कमज़ोर कर दिया।
- सत्ता का केंद्रीकरण: समानतावादी आदर्शों के बावजूद, सत्ता प्राय: क्रांतिकारी अभिजात वर्ग या समितियों के हाथों में केंद्रित हो गई।
- बाद में नेपोलियन के उदय ने सत्तावादी शासन के माध्यम से गणतंत्रवाद को सीमित कर दिया।
- बड़े वर्गों का बहिष्कार: महिलाओं, किसानों और निर्धन वर्ग को राजनीति में बहुत कम प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ। सार्वभौमिक राजनीतिक समानता व्यवहार में कम और आकांक्षा में अधिक बनी रही।
- सामाजिक क्रांति के संदर्भ में सीमाएँ
- अपूर्ण सामाजिक समानता: यद्यपि कानूनी विशेषाधिकार समाप्त कर दिये गए, लेकिन आर्थिक असमानता बनी रही।
- क्रांति से श्रमिक वर्ग की तुलना में बुर्जुआ वर्ग को अधिक लाभ मिला।
- महिलाओं की सीमित मुक्ति: क्रांतिकारी आंदोलनों में भागीदारी के बावजूद महिलाओं को राजनीतिक अधिकार नहीं दिये गए और नागरिकता से बाहर रखा गया।
- ग्रामीण और औपनिवेशिक बहिष्कार: किसानों की शिकायतों का केवल आंशिक समाधान हुआ और उपनिवेशों में क्रांतिकारी आदर्शों को असंगत रूप से लागू किया गया, जहाँ प्रारंभ में दासता जारी रही।
निष्कर्ष
फ्राँसीसी क्रांति निस्संदेह एक राजनीतिक और सामाजिक दोनों प्रकार की क्रांति थी, जिसने निरंकुशता तथा सामंती पदानुक्रम को तोड़ते हुए समानता एवं नागरिकता को बढ़ावा दिया। फिर भी इसके रूपांतरणकारी आदर्श हिंसा, बहिष्कार और प्रभुत्व के नए रूपों के कारण समान रूप से साकार नहीं हो सके। इसके बावजूद, इसकी स्थायी विरासत पूर्णता में नहीं, बल्कि राज्य, समाज और व्यक्तिगत अधिकारों के आधुनिक संबंध को पुनर्परिभाषित करने में निहित है।