• प्रश्न :

    प्रश्न. लोक पदों पर निजी संबंधों के परस्पर आच्छादन से उत्पन्न होने वाली नैतिक चुनौतियों की चर्चा कीजिये। हितों के टकराव को संस्थागत रूप से किस प्रकार संबोधित किया जा सकता है? (150 शब्द)

    22 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत सार्वजनिक तथा निजी मूल्यों की परिभाषा देकर कीजिये।
    • मुख्य भाग में इनके परस्पर आच्छादन अथवा आपसी अंतर्संबंध से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों की विवेचना कीजिये।
    • इसे संस्थागत रूप से कैसे संबोधित किया जा सकता है, इसके उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    लोक पद विश्वास का दायित्व होता है (पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत)। जब किसी सार्वजनिक अधिकारी के निजी संबंध (परिवार, मित्र, व्यापारिक सहयोगी) उसके आधिकारिक कर्त्तव्यों से टकराते या जुड़ते हैं तो उससे ‘हितों का टकराव’ (Conflict of Interest–COI) की स्थिति उत्पन्न होती है।

    • यद्यपि निजी संबंध होना स्वाभाविक है, किंतु नैतिक चुनौती तब उत्पन्न होती है जब ये संबंध पेशेवर निर्णय को प्रभावित करें या प्रभावित करते हुए प्रतीत हों, जिससे वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता जैसे आधारभूत मूल्यों को क्षति पहुँचती है।

    मुख्य भाग: 

    सार्वजनिक और निजी संबंधों के आच्छादन से उत्पन्न नैतिक चुनौतियाँ

    • वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता का क्षरण: जब अधिकारी निजी संबंधों के निर्णयों को प्रभावित करने देते हैं तो निष्पक्ष और तर्कसंगत निर्णय-क्षमता प्रभावित होती है।
      • इससे नियुक्तियों, स्थानांतरणों या सेवाओं की आपूर्ति में पक्षपात होने लगता है, जो विधि के समक्ष समानता के सिद्धांत को कमज़ोर करता है।
      • उदाहरण के लिये, नियुक्तियों या ठेका वितरण में रिश्तेदारों अथवा निकट सहयोगियों को प्राथमिकता देना योग्यता और निष्पक्षता के सिद्धांत को कमज़ोर करता है।
    • गोपनीय जानकारी का दुरुपयोग: घनिष्ठ व्यक्तिगत या पेशेवर संबंध संवेदनशील सूचनाओं के लीक होने या निजी लाभ के लिये उनके दुरुपयोग का कारण बन सकते हैं।
      • निविदाओं या नियामक निर्णयों से जुड़ी अंदरूनी जानकारी परिचितों के साथ साझा करना उन्हें अनुचित लाभ देता है, जिससे विश्वास और पारदर्शिता का उल्लंघन होता है।
    • जवाबदेही और पारदर्शिता से समझौता: निजी संबंधों में उलझे अधिकारी जाँच-पड़ताल से बचने या अपने सहयोगियों को संरक्षण देने का प्रयास कर सकते हैं। इससे आंतरिक नियंत्रण कमज़ोर होते हैं और दंडहीनता की प्रवृत्ति बढ़ती है।
      • उदाहरण के लिये, सहकर्मियों या पूर्व सहयोगियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में हिचकिचाहट संस्थागत जवाबदेही को क्षीण करती है।
    • लोक विश्वास और संस्थागत विश्वसनीयता का क्षरण: प्रशासन में न केवल वास्तविक भ्रष्टाचार, बल्कि हितों के टकराव का संदेह मात्र भी शासन की विश्वसनीयता और जन-विश्वास की नींव को हिला देता है।
      • जब निजी संबंधों के कारण निर्णय प्रभावित होते दिखाई देते हैं तो नागरिक शासन व्यवस्था को पक्षपातपूर्ण या अभिजात वर्ग के नियंत्रण में मानने लगते हैं।
    • अधिकारियों के लिये नैतिक तनाव और दुविधाएँ: जब सार्वजनिक कर्त्तव्य परिवार या सामाजिक अपेक्षाओं से टकराता है, तब अधिकारी प्राय: नैतिक दुविधाओं का सामना करते हैं। परिचितों की सहायता करने का दबाव नैतिक तनाव, गलत आचरण को तर्कसंगत ठहराने की प्रवृत्ति या नैतिक विवेक के क्रमिक क्षरण का कारण बन सकता है।

    हितों के टकराव से निपटने के लिये संस्थागत उपाय

    • हितों और संपत्तियों का अनिवार्य प्रकटीकरण: वित्तीय, पेशेवर तथा संबंधपरक हितों के नियमित खुलासे की अनिवार्यता संभावित टकरावों की शीघ्र पहचान में सहायक होती है।
      • पारदर्शिता दुरुपयोग को रोकती है और सूचित निगरानी को संभव बनाती है।
    • पृथकता और निर्णय-विभाजन तंत्र: जहाँ व्यक्तिगत हित जुड़े हों, वहाँ अधिकारियों को संस्थागत रूप से निर्णय प्रक्रिया से अलग रहने के लिये बाध्य किया जाना चाहिये। स्पष्ट प्रोटोकॉल यह सुनिश्चित करते हैं कि संवेदनशील मामलों का निष्पक्ष रूप से निपटारा हो।
    • प्रवर्तनीय आचार-संहिता और नैतिक नियम: सुव्यवस्थित आचार-संहिताएँ स्वीकार्य व्यवहार और उल्लंघन के परिणाम स्पष्ट करती हैं। नैतिक दिशानिर्देश निजी निष्ठाओं पर सार्वजनिक मूल्यों को संस्थागत रूप देते हैं।
    • स्वतंत्र निगरानी और नैतिक समितियाँ: स्वायत्त नैतिक निकाय बिना पक्षपात के हितों के टकराव की जाँच कर सकते हैं। स्वतंत्र समीक्षा विश्वसनीयता और निवारक प्रभाव को सुदृढ़ करती है।
    • कूलिंग-ऑफ अवधि और सेवाोत्तर प्रतिबंध: सेवानिवृत्ति के बाद रोज़गार और लॉबिंग पर प्रतिबंध लोक पद एवं निजी लाभ के बीच ‘रिवॉल्विंग डोर’ जैसे टकरावों को रोकते हैं।

    निष्कर्ष

    लोक पदों पर निजी संबंधों का परस्पर आच्छादन व्यक्तिगत निष्ठा और सार्वजनिक कर्त्तव्य के बीच की सीमा को अस्पष्ट कर गंभीर नैतिक चुनौतियाँ उत्पन्न करता है। हितों के टकराव से निपटने के लिये संस्थागत सुरक्षा उपाय, पारदर्शिता और नैतिक नेतृत्व अत्यंत आवश्यक हैं। जैसा कि जॉन रॉल्स ने कहा था, “न्याय सामाजिक संस्थाओं का प्रथम गुण है” और इसकी रक्षा के लिये सार्वजनिक निर्णयों को निजी प्रभाव से मुक्त रखना अनिवार्य है।