• प्रश्न :

    प्रश्न. भारत की आपदा प्रबंधन प्रणाली ने किस सीमा तक पारंपरिक राहत-केंद्रित दृष्टिकोण को छोड़कर आपदा शमन और अनुकूलन पर आधारित समग्र दृष्टिकोण अपनाया है? उपयुक्त उदाहरणों के साथ इस बदलाव की प्रक्रिया और प्रभाव का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)

    21 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आपदा प्रबंधन

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत हाल के सुधारों को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में शमन और अनुकूलन विकसित करने की दिशा में हो रहे बदलावों का विस्तार से विश्लेषण कीजिये।
    • इसके बाद उन शेष कमियों और बाधाओं का विश्लेषण कीजिये जो वर्तमान ढाँचे की प्रभावशीलता को सीमित करती हैं।
    • अंत में इस ढाँचे को और अधिक सुदृढ़ बनाने हेतु आवश्यक सुधारात्मक उपायों का सुझाव दीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    भारत का आपदा प्रबंधन दृष्टिकोण राहत-केंद्रित मॉडल से जोखिम न्यूनीकरण और अनुकूलन आधारित ढाँचे की ओर बदल गया है, जिसे आपदा प्रबंधन (संशोधन) अधिनियम, 2025 द्वारा सुदृढ़ किया गया है।

    • इस संशोधन में बहु-खतरा जोखिम मूल्यांकन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, शमन और अनुकूल  अवसंरचना को प्राथमिकता दी गई है, साथ ही आपदा प्रबंधन को जलवायु अनुकूलन के साथ एकीकृत किया गया है।
    • हालाँकि, विभिन्न आपदा प्रकारों और क्षेत्रों में असमान कार्यान्वयन स्थानीय क्षमता तथा अंतिम-मील तैयारियों में अंतर को उजागर करता है।

    मुख्य भाग:

    शमन की दिशा में कदम (प्रभाव से पहले आपदा जोखिम कम करना):

    • वर्ष 2005 के बाद कानूनी और संस्थागत बदलाव: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 ने अस्थायी राहत उपायों से स्थायी आपदा जोखिम शासन संस्थाओं की स्थापना के माध्यम से संरचनात्मक बदलाव को चिह्नित किया।
      • राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों (SDMAs) जैसी संस्थाओं ने खतरा मानचित्रण, शमन योजना तथा तैयारियों को संस्थागत रूप दिया।
        • यह आपदा के बाद प्रतिक्रिया से पहले जोखिम कम करने की दिशा में बदलाव का प्रतीक था।
    • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और जोखिम की पूर्वधारणा: भारत ने पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र को काफी मज़बूत किया है, विशेष रूप से जल-मौसम संबंधी आपदाओं के लिये। सटीक पूर्वानुमान प्रतिक्रियाशील राहत के बजाय निवारक कार्रवाई को सक्षम बनाता है।  
      • उदाहरण के लिये, चक्रवात फानी (2019) के दौरान, अग्रिम चेतावनियों के कारण पुरी, खोरधा और कटक ज़िलों से लगभग 1.2 मिलियन लोगों को सुरक्षित रूप से स्थानांतरित किया गया।
    • अवसंरचना-आधारित शमन उपाय: रक्षात्मक अवसंरचना में निवेश आपदा के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से अपनाए गए शमन दृष्टिकोण को दर्शाता है।
      • वर्ष 1999 के बाद निर्मित ओडिशा के बहुउद्देशीय चक्रवात आश्रयों के नेटवर्क ने चक्रवात फाइलिन (2013), फानी (2019) और अम्फान (2020) के दौरान जनहानि सीमित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
      • आपदा-रोधी अवसंरचना के लिये गठबंधन (CDRI) की भारत द्वारा शुरुआत यह दर्शाती है कि देश केवल आपदा के बाद मरम्मत तक सीमित न रहकर ऐसी अवसंरचना विकसित करने के लिये प्रतिबद्ध है जो आपदाओं को सह सके।
    • विकास में आपदा जोखिम न्यूनीकरण को मुख्यधारा में लाना: आपदा शमन को तेज़ी से विकास योजना और अवसंरचना परियोजनाओं में एकीकृत किया जा रहा है, जो आपदा जोखिम न्यूनीकरण हेतु सेंडाई फ्रेमवर्क जैसे वैश्विक ढाँचों के अनुरूप है।
      • जोखिम आकलन धीरे-धीरे सड़क, आवास और तटीय विकास योजनाओं का हिस्सा बन रहे हैं।
      • 15वें वित्त आयोग ने राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर समर्पित शमन कोष स्थापित करने की सिफारिश की, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय आपदा जोखिम प्रबंधन कोष (NDRMF) तथा राज्य आपदा जोखिम प्रबंधन कोष (SDRMF) की स्थापना हुई। इस प्रकार राहत और शमन को एकीकृत आपदा जोखिम-प्रबंधन ढाँचे में समाहित किया गया।

     अनुकूलन की दिशा में उपाय (आघातों को सहने और पुनः उबरने की क्षमता):

    • आपदा प्रतिक्रिया बलों का पेशेवर विकास: राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) के गठन और सुदृढ़ीकरण से भारत की त्वरित प्रतिक्रिया तथा प्रभावी पुनर्प्राप्ति क्षमता में वृद्धि हुई है, जो अनुकूलन का एक प्रमुख घटक है। तैनाती से पहले की तैयारी और नियमित मॉक ड्रिल केवल राहत से आगे की तैयारियों को दर्शाती हैं।
      • उदाहरण के लिये, चक्रवात यास (2021) से पहले ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटों पर NDRF की इकाइयों को अग्रिम रूप से तैनात किया गया था।
    • समुदाय-आधारित आपदा तैयारी: प्रशिक्षण, जागरूकता और स्वयंसेवी नेटवर्क के माध्यम से अनुकूलन को समुदाय स्तर पर सुदृढ़ किया जा रहा है।
      • ओडिशा की चक्रवात तैयारी हेतु ग्राम आपदा प्रबंधन योजनाएँ (VDMPs) प्रशिक्षित स्थानीय स्वयंसेवकों के माध्यम से अंतिम-मील संचार और निकासी सुनिश्चित करती हैं, जिससे चक्रवातों के दौरान समुदाय की त्वरित प्रतिक्रिया संभव होती है।
    • जलवायु अनुकूलन क्षमता: भारत ने अनुकूलन क्षमता विकसित करके धीमी गति से आने वाली और जलवायु से जुड़ी आपदाओं को संबोधित करना शुरू कर दिया है।
      • उदाहरण के लिये, अहमदाबाद के हीट एक्शन प्लान (2013 से) ने प्रारंभिक चेतावनी, सार्वजनिक परामर्श और अस्पतालों की तैयारी की व्यवस्था की, जिसके परिणामस्वरूप गर्मी से होने वाली मृत्यु में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।
    • शहरी और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन प्रयास: आपदाओं से प्राप्त अनुभवों के आधार पर कुछ शहरी अनुकूलन उपाय लागू किये  गए हैं, किंतु अब तक उनके प्रभाव समान रूप से संतोषजनक नहीं रहे हैं।
      • उदाहरण के लिये, वर्ष 2015 की चेन्नई बाढ़ के बाद शहर में तूफानी जल निकासी प्रणाली के विस्तार और जल निकायों के आंशिक पुनर्स्थापन की पहल की गई, ताकि दीर्घकालिक बाढ़-रोधी क्षमता में सुधार हो सके।

    आपदा प्रबंधन में बनी हुई कमियाँ:

    • बाढ़ और शहरी आपदाएँ: आकस्मिक बाढ़ के बावजूद, भूमि-उपयोग नियंत्रण की कमज़ोरी और प्राकृतिक जल निकासी तंत्रों पर अतिक्रमण के कारण शमन तथा अनुकूलन की क्षमता कमज़ोर बनी हुई है।
      • उदाहरण के लिये, बंगलूरू की बाढ़ (2022) ने झील प्रणालियों और तूफानी जल चैनलों की निरंतर उपेक्षा को उजागर किया, जिससे भारी वर्षा बार-बार संकट में बदल जाती है।
    • भूकंप और भूस्खलन: कम आवृत्ति लेकिन गंभीर प्रभाव डालने वाली आपदाओं के लिये भारत की तैयारी भवन संहिताओं के कमज़ोर अनुपालन के कारण अत्यंत सीमित बनी हुई है।
      • जोशीमठ भू-धॅंसाव (2023) ने ज्ञात भूकंपीय जोखिमों के बावजूद संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में अनियमित निर्माण को उजागर किया।
    • हीटवेव और धीरे-धीरे उभरने वाली आपदाएँ: हालाँकि प्रारंभिक चेतावनियों में सुधार हुआ है, लेकिन हीटवेव जैसी धीमी गति से विकसित होने वाली आपदाओं के लिये शमन उपाय असमान बने हुए हैं और कई शहरों में दीर्घकालिक शहरी शीतलन तथा श्रमिक सुरक्षा उपायों का अभाव है।
      • प्रतिक्रिया प्राय: संरचनात्मक अनुकूलन के बजाय आपातकालीन परामर्श तक सीमित रहती है।
      • वर्ष 2024 में उत्तर भारत में पड़ी भीषण हीटवेव के दौरान दिल्ली और जयपुर जैसे शहरों में खुले में कार्य करने वाले श्रमिकों की गर्मी से मृत्यु दर्ज की गईं, जिसने गर्मी-रोधी शहरी डिज़ाइन तथा श्रम संरक्षण में कमियों को उजागर किया।
    • औद्योगिक और तकनीकी आपदाएँ: औद्योगिक और रासायनिक आपदाओं के लिये तैयारी अब भी काफी हद तक प्रतिक्रिया-केंद्रित है, जिसमें रोकथाम, जोखिम ऑडिट और खतरनाक स्थलों के आसपास भूमि-उपयोग ज़ोनिंग पर सीमित ध्यान दिया जाता है।
      • विशाखापत्तनम के LG पॉलिमर्स गैस रिसाव (2020) ने सुरक्षा मानकों के कमज़ोर प्रवर्तन और अपर्याप्त आपातकालीन तैयारी को उजागर किया, जहाँ आपदा से पहले ही शमन में विफलता दिखाई दी।

    आपदा शमन और अनुकूलन सुदृढ़ करने के उपाय:

    • जोखिम-सूचित भूमि उपयोग और शहरी योजना: आपदा जोखिम संबंधी पहलुओं को भूमि-उपयोग योजना, ज़ोनिंग नियमों और अवसंरचना स्वीकृतियों में अनिवार्य रूप से समाहित किया जाना चाहिये, विशेषकर बाढ़-मैदानों, तटीय क्षेत्रों तथा भूकंपीय इलाकों में।
      • विकास अनुमतियाँ खतरा मानचित्रण और वहन-क्षमता अध्ययन के आधार पर प्रदान की जानी चाहिये।
      • चेन्नई एवं गुवाहाटी जैसे शहरों में प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों और आर्द्रभूमियों पर निर्माण रोकने के लिये बाढ़-मैदान ज़ोनिंग तथा GIS-आधारित खतरा मानचित्रण का अनिवार्य उपयोग किया जाना चाहिये।
    • अनुकूलन भवन संहिताओं और मानकों का कठोर प्रवर्तन: भूकंप, चक्रवात और हीटवेव से होने वाली क्षति को कम करने के लिये आपदा-रोधी भवन संहिताओं का सख्ती से पालन आवश्यक है।
      • अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये तृतीय-पक्ष ऑडिट और स्थानीय प्राधिकारों की जवाबदेही तय की जानी चाहिये।
      • उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे भूकंपीय क्षेत्र IV–V वाले राज्यों में भूकंप-रोधी निर्माण मानकों (IS 1893) के प्रवर्तन को व्यापक स्तर पर लागू किया जाना चाहिये।
    • स्थानीय और समुदाय-स्तरीय क्षमता को सुदृढ़ करना: आपदा अनुकूलन को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिये, जिसके लिये पंचायतों, शहरी स्थानीय निकायों और सामुदायिक समूहों को प्रशिक्षण, संसाधन तथा निर्णय-निर्माण की शक्ति प्रदान की जाए। स्थानीय अनुभव और जानकारी अंतिम-मील तैयारियों तथा आपात प्रतिक्रिया को सुदृढ़ बनाते हैं।
      • असम और बिहार के बाढ़-प्रवण ज़िलों में चक्रवात तैयारी कार्यक्रम जैसे स्वयंसेवी नेटवर्क का विस्तार किया जाना चाहिये।
    • आपदा प्रबंधन के साथ जलवायु अनुकूलन का एकीकरण: चरम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति से निपटने के लिये आपदा प्रबंधन को जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के साथ घनिष्ठ रूप से जोड़ा जाना चाहिये।
      • क्षेत्र-विशिष्ट योजना में लू, बाढ़ और सूखा-रोधी उपायों को शामिल किया जाना आवश्यक है।
      • अहमदाबाद जैसे शहरों की हीट एक्शन प्लान को सभी लू-प्रवण शहरी केंद्रों तक विस्तारित किया जाए और उन्हें श्रम सुरक्षा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ एकीकृत किया जाए।

    निष्कर्ष

    भारत ने राहत-केंद्रित आपदा प्रबंधन से शमन और अनुकूलन की ओर स्पष्ट बदलाव किया है, विशेषकर चक्रवातों, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों तथा जलवायु-संबंधी आपदाओं के क्षेत्र में। हालाँकि, विभिन्न आपदा प्रकारों और क्षेत्रों में प्रगति अब भी असमान बनी हुई है, जहाँ बाढ़, भूकंप तथा शहरी जोखिमों में प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण हावी है। जोखिम-सूचित योजना, अनुकूल अवसंरचना और स्थानीय क्षमता निर्माण को और गहराई देने से ही भारत के विकास पथ में अनुकूलन पूरी तरह समाहित किया जा सकता है।