प्रश्न: भारत में संयुक्त परिवार व्यवस्था के कमज़ोर होने से सामाजिक सुरक्षा, देखभाल अर्थव्यवस्था (केयर इकॉनमी) और पीढ़ियों के बीच संबंधों पर क्या प्रभाव पड़े हैं? चर्चा कीजिये। (250 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण
- भारतीय परिवारों में एकल परिवार की बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
- मुख्य भाग में बताएँ कि ये प्रवृत्तियाँ भारत में देखभाल अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और पीढ़ीगत संबंधों को कैसे प्रभावित कर रही हैं।
- साथ ही यह भी तर्क दीजिये कि संयुक्त परिवार के पतन ने व्यक्तिगत विकास और आधुनिकीकरण के लिये किस प्रकार उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय
भारत में परिवारों का धीरे-धीरे एकल परिवारों में बदलना देखा जा रहा है, जो शहरीकरण, प्रवासन, शिक्षा स्तर में वृद्धि और बदलती आकांक्षाओं द्वारा प्रेरित है। 1990 के दशक से ही भारत में एकल परिवारों का वर्चस्व (50% से अधिक) शुरू हो गया था, जबकि संयुक्त परिवार घटकर 16% रह गए। आधुनिक सर्वेक्षणों और शहरी प्रवृत्तियों से पता चलता है कि यह एकलीकरण (Nuclearisation) निरंतर बढ़ रहा है।
- यह परिवर्तन, यद्यपि व्यक्तिगत स्वायत्तता को बढ़ाता है, सामाजिक सुरक्षा, देखभाल अर्थव्यवस्था और पीढ़ीगत संबंधों पर गहरा प्रभाव डालता है।
मुख्य भाग:
संयुक्त परिवार व्यवस्था के पतन का प्रभाव:
- सामाजिक सुरक्षा पर
- अनौपचारिक सामाजिक सुरक्षा का क्षरण: संयुक्त परिवार परंपरागत रूप से बीमारी, बेरोज़गारी या आर्थिक संकट के समय सहारा देने का कार्य करते थे।
- एकल परिवारों में इस तरह का आंतरिक पुनर्वितरण नहीं होता, जिससे औपचारिक कल्याण प्रणालियों पर निर्भरता बढ़ जाती है।
- राज्य और बाज़ार पर अधिक निर्भरता: जब पारिवारिक समर्थन कमज़ोर होता है, विशेष रूप से बच्चों से अलग रहने वाले वृद्धों के लिये, तो वृद्धावस्था पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सहायता योजनाएँ महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।
- वृद्धों की आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा: संयुक्त परिवार के समर्थन के बिना वृद्ध व्यक्तियों को प्राय: वित्तीय समस्याओं और देखभाल में कमी का सामना करना पड़ता है, जिससे अटल पेंशन योजना जैसी राज्य हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
- संपत्ति का विखंडन: परिवार के विभाजन के कारण पूर्वजों की संपत्ति और भूमि का बँटवारा कृषि की आर्थिक व्यवहार्यता को कम करता है, जिससे ग्रामीण परिवार संकट की स्थिति में आ जाते हैं।
- देखभाल अर्थव्यवस्था (केयर इकॉनमी) पर प्रभाव
- भुगतान किये जाने वाले देखभाल सेवाओं पर बढ़ती निर्भरता: संयुक्त परिवारों के पतन से बच्चों, वृद्धों और बीमारों के लिये घर में उपलब्ध देखभालकर्त्ताओं की संख्या कम हो गई है।
- इसके परिणामस्वरूप, परिवार अधिकतर भुगतान किये जाने वाले घरेलू कर्मचारियों, डेकेयर केंद्रों और वृद्ध-देखभाल सुविधाओं पर निर्भर होने लगे हैं, जिससे औपचारिक एवं अनौपचारिक देखभाल अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है।
- महिलाओं पर बढ़ा देखभाल का बोझ: एकल परिवारों में देखभाल की ज़िम्मेदारियाँ कम सदस्यों, विशेष रूप से महिलाओं पर केंद्रित हो जाती हैं।
- विस्तारित परिवार का समर्थन न होने पर कामकाजी महिलाएँ अधिक समय की कमी का सामना करती हैं, जो उनके श्रम बल में भागीदारी और करियर प्रगति को प्रभावित करता है।
- अनौपचारिक देखभाल नेटवर्क का नुकसान: संयुक्त परिवारों में पहले देखभाल का कार्य कई वयस्कों के बीच साझा होता था।
- एकल परिवार बनने से यह अनौपचारिक सुरक्षा जाल समाप्त हो गया है, जिससे देखभाल करने वालों पर शारीरिक और मानसिक दबाव बढ़ गया है।
- गुणवत्ता वाली देखभाल तक असमान पहुँच: जहाँ देखभाल सेवाएँ बढ़ रही हैं, वहीं उच्च लागत और असमान उपलब्धता के कारण गरीब परिवार विश्वसनीय बाल-देखभाल तथा वृद्ध-देखभाल तक पहुँचने में संघर्ष करते हैं, जिससे सामाजिक असमानता और गहराती है।
- वृद्ध देखभाल का संस्थागतरण: वृद्धों की देखभाल अब ‘नैतिक कर्त्तव्य’ से बदलकर ‘भुगतान सेवा’ की ओर जा रही है। वृद्धाश्रम और सहायक जीवन सुविधाओं की मांग बढ़ रही है, जो भारतीय समाज में अभी भी कलंकित मानी जाती हैं तथा कई लोगों के लिये यह महंगी है।
- पीढ़ीगत संबंधों पर प्रभाव
- दैनिक संपर्क और बंधन में कमी: प्रवासन और अलग-अलग आवासों के कारण दादा-दादी, माता-पिता और बच्चों के बीच रोज़मर्रा का संपर्क सीमित हो जाता है, जिससे भावनात्मक संबंध कमज़ोर होते हैं।
- मूल्यों के हस्तांतरण में कमी: संयुक्त परिवारों के माध्यम से हम अपनी परंपराओं और संस्कृति को समझते थे तथा साथ ही यह भी सीखते थे कि आपसी मतभेदों को सुलझाकर साथ कैसे रहा जाता है।
- एकल परिवार इन पीढ़ीगत सीखने के अवसरों को कम कर देते हैं।
- 'एम्प्टी नेस्ट' (Empty Nest) सिंड्रोम: काम के सिलसिले में बच्चों के प्रवास और उनके एकल परिवारों में रहने के कारण, वृद्ध माता-पिता को अत्यधिक सामाजिक अलगाव तथा अकेलेपन का सामना करना पड़ता है, जिससे उनमें वृद्धावस्था से संबंधित मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं (जैसे अवसाद और चिंता) में वृद्धि हो रही है।
- देखभाल और ज़िम्मेदारी के मानदंडों में बदलाव: युवा पीढ़ियाँ अधिकतर गतिशीलता और व्यक्तिगत विकल्प को प्राथमिकता देने लगी हैं, जिससे पीढ़ियों के बीच पारस्परिक देखभाल की अपेक्षाएँ बदल रही हैं।
हालाँकि यह संरचनात्मक परिवर्तन पूरी तरह से हानिकारक नहीं है। संयुक्त परिवार के पतन ने कई तरीकों से व्यक्तिगत विकास और आधुनिकीकरण के लिये उत्प्रेरक की भूमिका भी निभाई है:
- महिलाओं का सशक्तीकरण (पितृसत्तात्मक नियंत्रण में कमी): संयुक्त परिवारों में प्रायः कठोर पदानुक्रम विद्यमान होते थे, जिनमें महिलाओं विशेषकर बहुओं को कम अवसर और सीमित अभिव्यक्ति मिलती थी।
- एकल परिवारों में महिलाओं को घरेलू निर्णय-निर्माण में अधिक स्वायत्तता मिलती है।
- ‘घूंघट’ जैसी प्रथाएँ और आवागमन या रोज़गार पर प्रतिबंध प्रायः एकल परिवारों में कम लागू होते हैं।
- व्यक्तिगत स्वायत्तता और घरेलू सामंजस्य (विकल्प की स्वतंत्रता): व्यक्ति विवाह, करियर और जीवन-शैली से जुड़े निर्णय “पारिवारिक सम्मान” या बुज़ुर्गों की सहमति के दबाव के बिना ले सकते हैं।
- समर्थकों का तर्क है कि भौतिक अलगाव बड़े परिवारों में सामान्य दैनिक टकरावों (जैसे संपत्ति विवाद, सास-बहू संघर्ष) को कम करता है, हालाँकि यह घरेलू हिंसा को छिपाने और उसे अदृश्य बनाने की आशंका भी उत्पन्न कर सकता है।
- आर्थिक दक्षता (श्रम गतिशीलता): एकल परिवार अधिक गतिशील होते हैं, जिससे कार्यबल को शहरों या औद्योगिक केंद्रों की ओर आसानी से पलायन करने में सुविधा मिलती है, जो भूमि से जुड़े बड़े संयुक्त परिवारों के लिये कठिन होता है।
- संयुक्त (विशेषकर कृषि-आधारित) परिवारों में कई सदस्य सीमित योगदान देते हुए भी आय साझा करते थे।
- एकलीकरण व्यक्तियों को बाहर जाकर उत्पादक रोज़गार खोजने के लिये प्रेरित करता है, जिससे निर्भरता कम होती है।
निष्कर्ष
संयुक्त परिवार व्यवस्था का पतन भारत के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को दर्शाता है, जो अधिक स्वायत्तता तो प्रदान करता है, लेकिन पारंपरिक सहारा संरचनाओं को कमज़ोर भी करता है। देखभाल अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और पीढ़ीगत संबंधों पर इसका प्रभाव इस तर्क को रेखांकित करता है कि आधुनिक भारत में बदलते पारिवारिक स्वरूपों के अनुरूप औपचारिक कल्याण प्रणालियों, सामुदायिक सहायता तंत्रों तथा वृद्ध-अनुकूल नीतियों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।