• प्रश्न :

    निबंध के विषय

    1. प्रकृति उनकी रक्षा करती है, जो उसकी रक्षा करते हैं।
    2. विकास केवल विकल्पों का विस्तार नहीं है, बल्कि विवेक के संवर्द्धन की प्रक्रिया है।

    17 Jan, 2026 निबंध लेखन निबंध

    उत्तर :

    1. प्रकृति उनकी रक्षा करती है, जो उसकी रक्षा करते हैं।

    निबंध को समृद्ध करने हेतु उद्धरण

    • महात्मा गांधी: महात्मा गांधी: “पृथ्वी सभी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पर्याप्त संसाधन देती है, लेकिन सभी के लालच को संतुष्ट करने के लिये नहीं।”
    • रेचल कार्सन: “प्रकृति में कुछ भी अकेले अस्तित्व में नहीं रहता।”
    • एंटोनियो गुटेरेस: “प्रकृति मानवता की सबसे अच्छी मित्र है। प्रकृति ही हमारी जीवन-समर्थन प्रणाली है।

    परिचय: कथन की व्याख्या

    • यह कथन मानव और प्रकृति के बीच पारस्परिक संबंध के मूल भाव को अभिव्यक्त करता है।
    • प्रकृति केवल एक निष्क्रिय संसाधन नहीं है, बल्कि एक जीवंत तंत्र है जो मानव कार्यों पर प्रतिक्रिया करता है।
    • जब समाज पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण करता है, तो वह आपदाओं, रोगों और जलवायु जोखिमों के विरुद्ध अपनी सहनशीलता बढ़ाता है।
    • इसके विपरीत, पर्यावरण की उपेक्षा पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक दुष्परिणामों को आमंत्रित करती है।

    दार्शनिक और नैतिक आधार

    • जीवन की पारस्परिक निर्भरता
      • भारतीय दर्शन प्रकृति को मात्र उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक पोषक शक्ति मानता है।
      • ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य को मान्यता देती है।
    • पर्यावरणीय नैतिकता
      • एल्डो लियोपोल्ड की ‘लैंड एथिक’ यह तर्क देती है कि मनुष्य पारिस्थितिक समुदाय के स्वामी नहीं, बल्कि उसके सदस्य हैं।
      • नैतिक संरक्षकता अल्पकालिक शोषण के बजाय दीर्घकालिक अस्तित्व को सुनिश्चित करती है।
    • जनजातीय ज्ञान
      • जनजातीय समुदाय वनों की रक्षा इसलिये करते हैं क्योंकि आजीविका, संस्कृति और अस्तित्व आपस में गहराई से जुड़े होते हैं।
      • जब प्रकृति को पूँजी नहीं बल्कि अपना परिजन माना जाता है, तब संरक्षण स्वाभाविक रूप से उभरता है।

    पारिस्थितिकी और विज्ञान से प्रमाण

    • प्राकृतिक सुरक्षा के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ
      • मैंग्रोव वन तूफानी लहरों को अवशोषित करके चक्रवातों के प्रभाव को कम करते हैं।
      • वर्ष 2004 की सुनामी के बाद तमिलनाडु के पिचावरम में जिन गाँवों के पास मैंग्रोव सुरक्षित थे, उन्हें उन गाँवों की तुलना में कहीं कम क्षति हुई जहाँ ये नहीं थे।
    • वन और जलवायु विनियमन
      • वन प्रतिवर्ष वैश्विक CO₂ उत्सर्जन का लगभग एक-तिहाई भाग अवशोषित करते हैं।
      • निर्वनीकरण से बाढ़ की आवृत्ति, मृदा अपरदन और ताप-तनाव बढ़ता है।
    • जैव विविधता और स्वास्थ्य
      • स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र पशुजन्य रोगों के प्रसार को कम करते हैं।
      • WHO के अनुसार, उभरने वाले संक्रामक रोगों में से लगभग 60% पशुजन्य रोग होते हैं, जो प्राय: आवास-क्षति से जुड़े होते हैं।

    विकास और आपदा-प्रतिरोधक क्षमता

    • प्रकृति-आधारित समाधान
      • आर्द्रभूमियाँ प्राकृतिक बाढ़-रोधक (पृथ्वी की किडनी) की तरह कार्य करती हैं; उनका विनाश चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में शहरी बाढ़ को और गंभीर बनाता है।
      • नदी के बाढ़-क्षेत्रों को सुरक्षित रखने से आपदाओं के बाद होने वाले पुनर्वास की लागत को कम किया जा सकता है।
    • संरक्षण से आर्थिक लाभ
      • UNEP के आकलन के अनुसार, पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन में निवेश किये गए हर 1 डॉलर से 9 से 30 डॉलर तक का प्रतिफल प्राप्त होता है।
      • सतत मत्स्य-पालन आजीविकाओं की रक्षा करते हुए समुद्री जैव विविधता को बनाए रखता है।
    • कृषि और मृदा स्वास्थ्य
      • रसायनों का अत्यधिक उपयोग मृदा की उर्वरता को घटाता है।
      • जैविक और पुनर्योजी कृषि अपनाने वाले क्षेत्रों में उत्पादन तथा जलवायु-अनुकूलन बेहतर देखा गया है।

    समकालीन चुनौतियाँ

    • जलवायु परिवर्तन बाढ़, सूखा और हीटवेव जैसी घटनाओं को और तीव्र बना रहा है।
    • वर्ष 2024 में भारत ने 366 में से 322 दिनों तक चरम मौसम की घटनाएँ झेलीं, जो वर्ष 2023 के 318 दिनों से अधिक थीं।
    • पर्यावरणीय क्षरण का असमान प्रभाव गरीब वर्गों पर अधिक पड़ता है, जिससे असमानता और बढ़ती है।

    नैतिक समन्वय

    • प्रकृति की रक्षा दान नहीं, बल्कि दूरदर्शी स्वहित है।
    • संरक्षण से खाद्य सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और आपदा-प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत होती है।
    • पारिस्थितिक संतुलन पीढ़ी-दर-पीढ़ी न्याय सुनिश्चित करता है।

    निष्कर्ष

    प्रकृति मानवीय विकल्पों पर भावनाओं से नहीं, बल्कि सटीकता के साथ प्रतिक्रिया करती है। जो समाज पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करते हैं, वे अपनी सुरक्षा, स्वास्थ्य और समृद्धि को सुदृढ़ बनाते हैं। जलवायु अनिश्चितता के इस युग में पर्यावरणीय संरक्षकता अब विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व के लिये अनिवार्य है। प्रकृति की रक्षा करके मानवता अपने ही भविष्य की सुरक्षा करती है।

    2. विकास केवल विकल्पों का विस्तार नहीं है, बल्कि विवेक के संवर्द्धन की प्रक्रिया है।

    निबंध को समृद्ध करने हेतु उद्धरण

    • महात्मा गांधी: “आपने जिस सबसे निर्धन और दुर्बल व्यक्ति को देखा हो, उसके चेहरे को स्मरण करें और स्वयं से विचार करें कि जो कदम आप उठाने वाले हैं, क्या वह उसके लिये उपयोगी सिद्ध होगा।”
    • इमैनुएल कांट: “केवल उसी सिद्धांत के अनुसार कार्य करें, जिसे आप एक ही समय में सार्वभौमिक नियम बनते हुए देख सकें।”

    परिचय: कथन की व्याख्या

    • विकास को प्रायः आय, उपभोग और व्यक्तियों के पास उपलब्ध विकल्पों के आधार पर मापा जाता है।
    • हालाँकि विकल्पों का विस्तार महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यह स्वतः ही नैतिक या सतत परिणामों की ओर नहीं ले जाता।
    • यह कथन इस तर्क पर बल देता है कि वास्तविक विकास के लिये नैतिक चेतना, उत्तरदायित्व और संयम आवश्यक हैं।
    • अंतरात्मा के अभाव में बढ़े हुए विकल्प असमानता, पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक क्षरण उत्पन्न कर सकते हैं।

    दार्शनिक और नैतिक आधार

    • विकल्प बनाम उत्तरदायित्व
      • उत्तरदायित्व के बिना स्वतंत्रता शोषण की ओर ले जाती है।
      • नैतिकता स्वतंत्रता को दिशा देती है और दूसरों को क्षति पहुँचने से रोकती है।
    • भारतीय चिंतन
      • धर्म की अवधारणा अधिकारों को कर्त्तव्यों से जोड़ती है।
      • विकास में अर्थ (भौतिक समृद्धि) और नैतिक दायित्व के बीच संतुलन आवश्यक है।
    • आधुनिक विकास चिंतन
      • अमर्त्य सेन स्वतंत्रता पर बल देते हैं, किंतु स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब उसका प्रयोग नैतिक रूप से किया जाए।
      • अंतरात्मा विकल्पों को उत्तरदायी कर्म में रूपांतरित कर देती है।

    आर्थिक विकास और नैतिक सीमाएँ

    • बढ़ती आय, बढ़ती असमानता
      • वैश्विक GDP में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, फिर भी विश्व की कुल संपत्ति का 76% से अधिक शीर्ष 10% लोगों के पास है।
      • अनियंत्रित उपभोक्तावाद समानता की बजाय विकल्पों को प्राथमिकता देता है।
    • उपभोग और सततता
      • उच्च-आय वाली जीवनशैलियाँ असमान रूप से अधिक कार्बन उत्सर्जन उत्पन्न करती हैं।
      • मानवता के सबसे संपन्न 1% लोग सबसे निर्धन 66% की तुलना में अधिक कार्बन उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार हैं।
    • श्रम और गरिमा
      • गिग अर्थव्यवस्थाएँ विकल्पों का विस्तार तो करती हैं, लेकिन प्राय: रोज़गार-सुरक्षा को कमज़ोर करती हैं।
      • श्रम-नैतिकता के बिना विकास मानवीय गरिमा को क्षीण करता है।

    प्रौद्योगिकी, विकल्प और अंतरात्मा

    • डिजिटल स्वतंत्रता
      • सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का विस्तार करता है, लेकिन यह गलत जानकारी और घृणा को भी बढ़ावा देता है।
      • सामाजिक क्षति से बचने के लिये नैतिक डिजिटल नागरिकता आवश्यक है।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
      • AI कार्यकुशलता बढ़ाती है, लेकिन इसमें पक्षपात, निगरानी और बहिष्कार की चिंताएँ भी हैं।
      • नैतिक निगरानी के बिना, तकनीकी विकल्प अन्याय को और गहरा सकते हैं।
    • उपभोक्ता संस्कृति
      • विज्ञापन-प्रधान विकल्प आवश्यकता की बजाय अति उपभोग को बढ़ावा देते हैं।
      • सतत उपभोग के लिये नैतिक चेतना आवश्यक है।

    शासन और सार्वजनिक नीति

    • उत्तरदायित्व के साथ कल्याण
      • सामाजिक योजनाएँ तभी सफल होती हैं जब उनके साथ जवाबदेही और पारदर्शिता जुड़ी हो।
      • संस्थाएँ नीति निर्माण में नैतिकता को शामिल करके अंतरात्मा को पोषित करती हैं।
    • पर्यावरणीय शासन
      • पारिस्थितिक चेतना के बिना विकास परियोजनाएँ विस्थापन और क्षरण का कारण बनती हैं।
      • सतत विकास मानव आकांक्षा के साथ पर्यावरणीय सीमाओं का संतुलन स्थापित करता है।
    • वैश्विक ढाँचे
      • SDG समावेशी वृद्धि, सततता और नैतिक उत्तरदायित्व पर ज़ोर देते हैं।
      • ये स्वीकार करते हैं कि विकास केवल भौतिक ही नहीं, बल्कि नैतिक भी है।

    नैतिक समन्वय

    • विकल्प क्षमता का विस्तार करते हैं तथा अंतरात्मा उद्देश्य को निर्देशित करती है।
    • अंतरात्मा के बिना विकास न्याय के बिना संपन्नता उत्पन्न करता है।
    • नैतिक संवर्धन दीर्घकालिक सततता और सामाजिक विश्वास सुनिश्चित करता है।
    • हमें सतत विकास के लिये निरंतर प्रयास करना चाहिये, जैसा कि ब्रंटलैंड रिपोर्ट (1987) में वर्णित है, जो ऐसे विकास को संदर्भित करता है जो वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करता है बिना भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता को खतरे में डाले।

    निष्कर्ष

    सच्चा विकास विकल्पों की संख्या बढ़ाने में नहीं, बल्कि उन्हें अंतरात्मा के मार्गदर्शन में संचालित करने में निहित है। जो समाज आर्थिक विकास के साथ-साथ नैतिक चेतना का संवर्धन करता है, वह गरिमा, सततता और सामंजस्य सुनिश्चित करता है। अंतरात्मा के बिना प्रगति केवल सतही विस्तार बन जाती है, जबकि अंतरात्मा के साथ यह सच्ची मानव उन्नति में बदल जाती है।