• प्रश्न :

    प्रश्न. भारत में प्रतिस्पर्द्धी संघवाद ने सहकारी संघवाद को किस प्रकार पूरक या विरोधाभासी बना दिया है? अपने उत्तर को हालिया नीतिगत पहलों और अंतर-राज्यीय गतिशीलताओं के उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये। (250 शब्द)

    13 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत प्रतिस्पर्द्धी संघवाद और सहकारी संघवाद की परिभाषा देकर कीजिये।
    • मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिये कि किन परिस्थितियों में दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते हैं।
    • इसके बाद चर्चा कीजिये कि किस प्रकार प्रतिस्पर्द्धी संघवाद कई बार सहकारी संघवाद के साथ संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करता है।
    • अंत में इन संघर्षों को न्यूनतम करने के उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    सहकारी संघवाद का अर्थ है कि केंद्र और राज्य परामर्श तथा साझा संस्थानों (जैसे—GST परिषद) के माध्यम से मिलकर नीतियों का निर्माण तथा क्रियान्वयन करते हैं।

    • प्रतिस्पर्द्धी संघवाद में राज्य सुधारों को अपनाकर, रैंकिंग में बेहतर स्थान प्राप्त करने और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों के माध्यम से निवेश आकर्षित करने व श्रेष्ठ परिणाम हासिल करने के लिये परस्पर प्रतिस्पर्द्धा करते हैं।
    • भारत में ये दोनों प्रायः ‘नियमबद्ध प्रतिस्पर्द्धा’ के रूप में कार्य करते हैं जहाँ प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहन दिया जाता है, लेकिन सहयोग एक साझा ढाँचा प्रदान करता है।

    मुख्य भाग: 

    जब प्रतिस्पर्द्धी संघवाद, सहकारी संघवाद का पूरक बनता है

    • साझा राष्ट्रीय ढाँचे के निर्माण में: GST ने एक सहकारी संस्था (GST परिषद) के माध्यम से एकीकृत राष्ट्रीय बाज़ार का निर्माण किया। इसके भीतर राज्य अनुपालन दक्षता, लॉजिस्टिक्स और व्यापार-अनुकूलता के क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा करते हैं, जबकि कर ढाँचा समान रहता है।
      • यहाँ तक कि दरों के युक्तिकरण और न्यायाधिकरण जैसे विवादास्पद मुद्दों पर भी परिषद में बातचीत के माध्यम से सहमति बनाई जाती है, जिससे स्पष्ट होता है कि सहयोग नियम तय करता है और प्रतिस्पर्द्धा क्रियान्वयन को बेहतर बनाती है।
    • सामाजिक क्षेत्रों में ‘नियमबद्ध प्रतिस्पर्द्धा’: नीति आयोग की राज्य रैंकिंग और सूचकांक (जैसे—SDG इंडेक्स) राज्यों के लिये प्रतिष्ठात्मक प्रोत्साहन पैदा करते हैं। इससे स्वास्थ्य, शिक्षा, SDG आदि क्षेत्रों में प्रदर्शन की तुलना होती है और प्रशासनिक सुधार को बल मिलता है।
      • नीति आयोग के राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक के अंतर्गत राज्यों को राजकोषीय अनुशासन, राजस्व संग्रहण और व्यय की गुणवत्ता के आधार पर रैंक किया जाता है।
        • ओडिशा के मज़बूत प्रदर्शन ने राजकोषीय दबाव झेल रहे राज्यों पर सब्सिडी युक्तिकरण और राजकोषीय सुधार अपनाने का प्रतिष्ठात्मक दबाव डाला है।
      • साथ-साथ संकेतक ढाँचे और समीक्षा तंत्र राज्यों की सहभागिता से विकसित किये जाते हैं, जिससे संरचना के स्तर पर यह सहकारी बना रहता है, जबकि परिणामों के स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी रूप धारण करता है।
    • सहकारी समर्थन के साथ प्रतिस्पर्द्धी बेंचमार्किंग: आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम में डेल्टा-रैंकिंग और डैशबोर्ड के माध्यम से ज़िलों के बीच प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा दिया जाता है, जबकि केंद्र एवं राज्य वास्तविक-समय निगरानी, क्षमता निर्माण तथा योजनाओं के अभिसरण में मिलकर सहयोग करते हैं।
      • वित्त आयोग के माध्यम से क्षैतिज निधि हस्तांतरण, समान स्तर के भीतर बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को केवल अधिकार-आधारित दावों के बजाय परिणामों के आधार पर प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये प्रोत्साहित करता है।
      • इससे अंतिम छोर पर सहकारी समन्वय और प्रतिस्पर्द्धात्मक प्रदर्शन-दबाव का समन्वय होता है।
    • सर्वोत्तम प्रथाओं का प्रसार: प्रतिस्पर्द्धा यह पहचानने में सहायक होती है कि क्या कारगर है (जैसे—त्वरित मंज़ूरियाँ, बेहतर सार्वजनिक सेवा वितरण)।
      • इसके बाद सहकारी मंच बैठकों, सहकर्मी-अधिगम और केंद्रीय समर्थन के माध्यम से इन प्रथाओं का प्रसार करते हैं, जिससे प्रतिस्पर्द्धा सामूहिक सुधार में बदल जाती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ परिणाम केंद्र एवं राज्यों, दोनों के सहयोग पर निर्भर होते हैं (जैसे—स्वास्थ्य, कौशल विकास, अवसंरचना)।

    जब प्रतिस्पर्द्धी संघवाद सहकारी संघवाद के साथ संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करता है

    • राजकोषीय दबाव और विश्वास की कमी: जब राज्यों को राजस्व हानि या अपर्याप्त क्षतिपूर्ति का अनुभव होता है तो सहयोग कमज़ोर पड़ जाता है तथा प्रतिस्पर्द्धा राजनीतिक सौदेबाज़ी में बदल जाती है।
      • GST क्षतिपूर्ति को जारी रखने/बढ़ाने की राज्यों की हालिया मांगें दर्शाती हैं कि किस प्रकार राजकोषीय मतभेद सहकारी भावना पर दबाव डाल सकते हैं।
      • उदाहरण के तौर पर, जून 2022 में GST क्षतिपूर्ति गारंटी समाप्त होने के बाद केरल, तमिलनाडु और पंजाब जैसे राज्यों ने महामारी-उपरांत राजस्व दबाव तथा सीमित राजकोषीय स्वायत्तता का हवाला देते हुए इसके विस्तार की मांग की।
    • संस्थागत संघर्ष: जब संविधान-प्रदत्त सहमति-आधारित संस्थानों के पास बाध्यकारी अधिकार नहीं होते तो सहकारी संघवाद कमज़ोर पड़ता है और सहमति टूटने पर केंद्र–राज्य मतभेद और गहरे हो जाते हैं।
      • वर्ष 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि GST परिषद की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं, बल्कि परामर्शात्मक हैं। यह निर्णय यद्यपि विधिक रूप से उचित है, परंतु इससे केंद्र–राज्य मतभेद तीव्र हो सकते हैं और भारत की राजकोषीय संघीय व्यवस्था में समन्वित निर्णय-निर्माण जटिल बन सकता है।
    • केंद्र प्रायोजित योजनाओं में कठोर एवं अनिवार्य शर्तें: कई केंद्र प्रायोजित योजनाओं (CSS) में राज्यों को धन प्राप्त करने के लिये केंद्र द्वारा निर्धारित ढाँचों और शर्तों का पालन करना अनिवार्य होता है।
      • उदाहरण के लिये, कई राज्यों ने पीएम-पोषण (मिड-डे मील) योजना को लेकर यह चिंता जताई कि खरीद और लागत-साझेदारी से जुड़े केंद्रीय मानदंड उनकी स्वायत्तता को सीमित करते हैं तथा सहयोग को साझेदारी के बजाय केवल अनुपालन में बदल देते हैं।
      • इसी प्रकार नए VB-G RAM G अधिनियम (2025) के अंतर्गत राज्यों को योजना की रूपरेखा और वित्तपोषण पैटर्न से संबंधित केंद्रीय दिशानिर्देश अपनाने होते हैं, जिनमें साझा लागत दायित्व भी शामिल हैं। कई राज्यों ने इसे स्थानीय प्राथमिकताओं और वित्तीय स्पेस को सीमित करने वाला बताते हुए आलोचना की है, जिससे सहयोग साझेदारी की बजाय अनुपालन में परिवर्तित हो जाता है।
    • समवर्ती विषयों में नीतिगत विवाद: यद्यपि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है और इसमें केंद्र–राज्य के सहकारी स्वामित्व की आवश्यकता होती है, फिर भी नीतिगत भिन्नताएँ संघीय संघर्ष उत्पन्न कर सकती हैं।
      • उदाहरण के लिये, तमिलनाडु और केरल ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के कुछ प्रावधानों पर आपत्तियाँ जताते हुए राज्य-विशिष्ट मार्ग अपनाए हैं। यह दर्शाता है कि सहकारी मंशा किस प्रकार राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा और संघीय स्वायत्तता के दावों से टकरा सकती है।

    संघर्ष को न्यूनतम करने के उपाय

    • संस्थागत सहमति-निर्माण तंत्र: नियमित और साक्ष्य-आधारित अंतर-सरकारी मंच प्रतिस्पर्द्धा को वार्ता-आधारित परिणामों में बदल सकते हैं।
      • GST परिषद यह दर्शाती है कि संरचित सौदेबाज़ी और मतदान नियम किस प्रकार दरों, क्षतिपूर्ति तथा अनुपालन से जुड़े विवादों का समाधान करते हैं। इस मॉडल को स्वास्थ्य, कौशल विकास और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी विस्तारित किया जा सकता है।
    • समानता के साथ संतुलित राजकोषीय प्रोत्साहन: राजकोषीय हस्तांतरणों में आवश्यकता-आधारित सहायता और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों का संतुलन होना चाहिये, ताकि विश्वास बना रहे।
      • उदाहरण के लिये, स्वास्थ्य और शिक्षा के परिणामों से जुड़ी वित्त आयोग की अनुदान राशि दक्षता को प्रोत्साहित करती है, साथ ही कमज़ोर राज्यों को राजकोषीय नुकसान से भी बचाती है।
    • केंद्र प्रायोजित योजनाओं की रूपरेखा में अनुकूलन: कठोर ढाँचों से हटकर परिणाम-आधारित रूपरेखाओं को अपनाने से राज्यों की स्वायत्तता बहाल हो सकती है।
      • जल जीवन मिशन इसका उदाहरण है, जहाँ राष्ट्रीय कवरेज लक्ष्यों का पालन करते हुए राज्यों को कार्यान्वयन में पर्याप्त अनुकूलन दिया गया है, जिससे सहकारी उद्देश्यों के साथ प्रतिस्पर्द्धात्मक नवाचार संभव होता है।
    • सहकारी गतिशीलता और कल्याण पोर्टेबिलिटी: श्रमिकों की अंतर-राज्यीय गतिशीलता पर प्रभावी समन्वय, बहिष्करणकारी प्रतिस्पर्द्धा को रोक सकता है।
      • वन नेशन, वन राशन कार्ड एवं ई-श्रम पोर्टल जैसी पहलें कल्याण तथा कौशल की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करती हैं, जिससे प्रवासी श्रमिकों को समर्थन मिलता है और साथ ही राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा भी बनी रहती है।

    निष्कर्ष:

    भारत में प्रतिस्पर्द्धात्मक संघवाद शासन को सशक्त बना सकता है, लेकिन तभी जब वह विश्वास और साझा नियमों का निर्माण करने वाली सहकारी संस्थाओं में निहित हो। जहाँ राजकोषीय दबाव, कठोर शर्तें या नीतिगत क्षेत्रों में संघर्ष बढ़ते हैं, वहाँ प्रतिस्पर्द्धा संघर्ष का रूप ले सकती है। आगे की दिशा यही होनी चाहिये कि साझा नियम तय करने में सहयोग किया जाए और बेहतर परिणाम हासिल करने के लिये प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित किया जाए, जिसे निष्पक्ष वित्तीय व्यवस्था एवं अनुकूल नीति-रूपरेखा का आधार मिले।